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Thursday, 14 May 2026

चौथा तमाशा

 चौथा तमाशा


अब

सबसे बड़ा तमाशा

मनुष्य का अकेलापन है।


भीड़ पहले भी थी,

मगर इतना सन्नाटा

शायद पहले कभी नहीं था।


हर आदमी

किसी-न-किसी स्क्रीन पर मौजूद है,

पर अपने भीतर से

धीरे-धीरे ग़ायब होता जा रहा है।


लोग घंटों बात करते हैं,

मगर संवाद कहीं नहीं होता।

हज़ारों “फॉलोअर्स” हैं,

मगर

रात के दो बजे

किसे फ़ोन किया जाए

यह सवाल अब भी अनाथ पड़ा है।


एक लड़का

रोज़ अपनी मुस्कुराती तस्वीरें डालता है,

और हर रात

नींद की गोलियों के बीच

अपनी चुप्पी गिनता है।


एक लड़की

हर पोस्ट पर लिखती है

“Living my best life…”

मगर

उसकी आँखों के नीचे

थकान का एक पुराना दरिया बहता है।


हमने

अपने दुखों को

फ़िल्टर लगाना सिखा दिया है।


अब आँसू भी

पोस्ट होने के बाद ही

सच्चे माने जाते हैं।


कोई ध्यान नहीं देता

कि इस समय

सबसे ज़्यादा मर रही चीज़

मनुष्य की भीतर की शांति है।


हर कोई

कुछ बनना चाहता है,

कुछ दिखना चाहता है,

कुछ साबित करना चाहता है।


और इस भागमभाग में

आदमी

अपने ही भीतर पीछे छूटता जा रहा है।


ध्यान से देखो—

मेट्रो में बैठे लोग

यात्रा नहीं कर रहे,

वे

अपने-अपने डिजिटल कुओं में झाँक रहे हैं।


किसी के कानों में संगीत है,

किसी की उँगलियों में स्क्रॉलिंग,

किसी की आँखों में थकान।


मगर

बहुत कम लोग हैं

जो सचमुच इस क्षण में मौजूद हैं।


शायद

इसीलिए ऋषि

जंगलों में चले जाते थे।


उन्हें पेड़ों से प्रेम कम,

मनुष्य के शोर से थकान ज़्यादा रही होगी।


और मैं

जब यह सब देखता हूँ

तो लगता है

सभ्यता जितनी आगे बढ़ी है,

मनुष्य उतना ही

अपने हृदय से दूर होता गया है।


हमने

दुनिया से जुड़ने के

हज़ार तरीक़े खोज लिए,

मगर

अपने आप से मिलने का रास्ता

धीरे-धीरे भूल गए।


यही चौथा तमाशा है


कि इस पूरी दुनिया में

सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं,

फिर भी

हर आदमी

अपने भीतर

अकेला बैठा है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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