“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
ये कैसा दौर है, हर शख़्स आईना लिए फिरता है,
मगर किसी को भी अपना चेहरा दिखाई नहीं देता।
मुकेश ,,,,,
No comments:
Post a Comment