मुक्तिकोपनिषद् में 108 उपनिषदों की सूची
मुक्तिकोपनिषद् के अन्तिम (108वें) खण्ड में भगवान् श्रीराम हनुमानजी को 108 उपनिषदों की सूची प्रदान करते हैं। यह सूची वेदों के आधार पर वर्गीकृत है और उपनिषद्-साहित्य के अध्ययन की मानक सूची मानी जाती है। मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार 108 उपनिषदों का विभाजन इस प्रकार है—
ऋग्वेदीय उपनिषद् (10) — ऐतरेय, कौषीतकि, नादबिन्दु, आत्मप्रबोध, निर्वाण, मुद्गल, अक्षमालिका, त्रिपुरा, सौभाग्य, बह्वृच।
शुक्लयजुर्वेदीय उपनिषद् (19) — ईशावास्य, बृहदारण्यक, जाबाल, हंस, परमहंस, सुबाल, मन्त्रिका, निरालम्ब, त्रिशिखिब्राह्मण, मण्डलब्राह्मण, अद्वयतारक, पैंगल, भिक्षु, तुरीयातीत, अध्यात्म, तारसार, याज्ञवल्क्य, शाट्यायनीय, मुक्तिका।
कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषद् (32) — कठ, तैत्तिरीय, ब्रह्म, कैवल्य, श्वेताश्वतर, गर्भ, नारायण, अमृतबिन्दु, अमृतनाद, कालाग्निरुद्र, क्षुरिका, सर्वसार, शुकरहस्य, तेजोबिन्दु, ध्यानबिन्दु, ब्रह्मविद्या, योगतत्त्व, दक्षिणामूर्ति, स्कन्द, शारीरक, योगशिखा, एकाक्षर, अक्षि, अवधूत, कठरुद्र, रुद्रहृदय, योगकुण्डलिनी, पञ्चब्रह्म, प्राणाग्निहोत्र, वराह, कलिसन्तरण, सरस्वतीरहस्य।
सामवेदीय उपनिषद् (16) — केन, छान्दोग्य, अरुणि, मैत्रायणी, मैत्रेयी, वज्रसूचिका, योगचूडामणि, वासुदेव, महत्, संन्यास, अव्यक्त, कुण्डिका, सावित्री, रुद्राक्षजाबाल, दर्शन, जाबालदर्शन।
अथर्ववेदीय उपनिषद् (31) — प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, अथर्वशिरस्, अथर्वशिखा, बृहज्जाबाल, नृसिंहतापनीय, नारदपरिव्राजक, सीता, शरभ, महानारायण, रामरहस्य, रामतापनीय, शाण्डिल्य, परमहंसपरिव्राजक, अन्नपूर्णा, सूर्य, आत्मा, पाशुपत, परब्रह्म, त्रिपुरातापिनी, देवी, भावना, भस्मजाबाल, गणपति, महावाक्य, गोपालतापिनी, कृष्ण, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गरुड।
इस प्रकार मुक्तिकोपनिषद् में उल्लिखित 108 उपनिषद् सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान-परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें प्राचीन प्रमुख उपनिषदों से लेकर योग, संन्यास, वैष्णव, शैव, शाक्त तथा अद्वैत-वेदान्त सम्बन्धी अनेक उपनिषद् सम्मिलित हैं। मुक्तिकोपनिषद् का विशेष महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि यही ग्रन्थ पहली बार इन उपनिषदों को व्यवस्थित रूप से वेदवार वर्गीकृत कर प्रस्तुत करता है और उन्हें मोक्षविद्या की समग्र परम्परा के रूप में स्थापित करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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