भारतीय दार्शनिक परम्परा में उपनिषदों को वेदों का परम सार तथा ब्रह्मविद्या का सर्वोच्च स्रोत माना गया है। उपनिषद-साहित्य का विकास अनेक शताब्दियों में हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उनकी संख्या के विषय में विभिन्न मत प्रचलित हुए। तथापि उपनिषदों की जो सूची सर्वाधिक प्रामाणिक और व्यापक रूप से स्वीकृत मानी जाती है, वह मुक्तिकोपनिषद् में वर्णित 108 उपनिषदों की सूची है। इस उपनिषद् में भगवान् श्रीराम हनुमान को मोक्ष का उपाय बताते हुए 108 उपनिषदों का निर्देश करते हैं और उन्हें वेदान्त-साहित्य का प्रतिनिधि संग्रह घोषित करते हैं।
मुक्तिकोपनिषद् में उल्लिखित 108 उपनिषद हैं— ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ब्रह्म, कैवल्य, जाबाल, श्वेताश्वतर, हंस, अरुणि, गर्भ, नारायण, परमहंस, अमृतबिन्दु, अमृतनाद, अथर्वशिरस्, अथर्वशिखा, मैत्रायणी, कौषीतकि, बृहज्जाबाल, नृसिंहतापिनी, कालाग्निरुद्र, मैत्रेयी, सुबाल, क्षुरिका, मन्त्रिका, सर्वसार, निरालम्ब, रहस्य, वज्रसूचिका, तेजोबिन्दु, नादबिन्दु, ध्यानबिन्दु, ब्रह्मविद्या, योगतत्त्व, आत्मबोध, परिब्राजक, त्रिशिखिब्राह्मण, सीता, योगचूडामणि, निर्वाण, मण्डलब्राह्मण, दक्षिणामूर्ति, शरभ, स्कन्द, महानारायण, अद्वयतारक, रामरहस्य, रामतापिनी, वासुदेव, मुद्गल, शाण्डिल्य, पैंगल, भिक्षुक, महत्, शारीरक, योगशिखा, तुर्यातीत, संन्यास, परमहंसपरिव्राजक, अक्षमालिका, अव्यक्त, एकाक्षर, पूर्ण, सूर्य, अक्षि, अध्यात्म, कुण्डिका, सावित्री, आत्मा, पाशुपत, परब्रह्म, अवधूत, त्रिपुरातापिनी, देवी, त्रिपुरा, कठभावना, हृदय, कुण्डलिनी, भस्म, रुद्राक्ष, गणपति, दर्शन, तारसार, महावाक्य, पंचब्रह्म, प्राणाग्निहोत्र, गोपालतापिनी, कृष्ण, याज्ञवल्क्य, वराह, शाट्यायनी, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गरुड़ तथा कलिसन्तरण।
इन उपनिषदों की सूची का सूक्ष्म अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि इसका क्रम किसी संयोग का परिणाम नहीं है। मुक्तिकोपनिषद् में उपनिषदों को उनके वैदिक सम्बन्ध के अनुसार व्यवस्थित किया गया है। पहले ऋग्वेद, फिर शुक्ल यजुर्वेद, उसके बाद कृष्ण यजुर्वेद, तत्पश्चात् सामवेद और अन्त में अथर्ववेद से सम्बद्ध उपनिषदों का उल्लेख किया गया है। यह व्यवस्था प्राचीन वैदिक परम्परा में ज्ञान के संरक्षण और वर्गीकरण की पद्धति के अनुरूप है। परन्तु केवल वैदिक आधार ही इसका उद्देश्य नहीं प्रतीत होता। इस क्रम में एक गहन आध्यात्मिक संकेत भी निहित दिखाई देता है।
सूची के प्रारम्भ में वे उपनिषद हैं जो आत्मा, ब्रह्म और जगत् के मूलभूत प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करते हैं। ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक जैसे उपनिषद साधक के भीतर आत्मज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात् अमृतबिन्दु, नादबिन्दु, ध्यानबिन्दु, योगतत्त्व, योगचूडामणि और योगशिखा जैसे ग्रन्थ साधना और योग की ओर अग्रसर करते हैं। आगे चलकर जाबाल, परमहंस, परिब्राजक, भिक्षुक, संन्यास, अवधूत और तुर्यातीत उपनिषद वैराग्य और त्याग की भावना को पुष्ट करते हैं। इसी क्रम में नारायण, रामतापिनी, गोपालतापिनी, कृष्ण, वासुदेव, नृसिंहतापिनी और हयग्रीव जैसे उपनिषद भक्ति और उपासना का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वहीं कालाग्निरुद्र, पाशुपत, पंचब्रह्म, रुद्राक्ष, भस्म और दक्षिणामूर्ति जैसे ग्रन्थ शैव परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि देवी, त्रिपुरा और त्रिपुरातापिनी उपनिषद शाक्त साधना के प्रमुख स्रोत हैं। अन्ततः कैवल्य, अद्वयतारक, ब्रह्मविद्या, परब्रह्म और महावाक्य जैसे उपनिषद साधक को अद्वैत-ब्रह्म की अनुभूति की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण सूची ज्ञान, योग, संन्यास, भक्ति और मोक्ष की क्रमिक आध्यात्मिक यात्रा का संकेत देती है।
मुक्तिकोपनिषद् में 108 उपनिषदों की संख्या भी अत्यन्त अर्थपूर्ण है। भारतीय परम्परा में 108 को पूर्णता, समग्रता और आध्यात्मिक सिद्धि का प्रतीक माना गया है। जपमाला के 108 मनके, 27 नक्षत्रों के 108 चरण, 12 आदित्यों और 9 ग्रहों का गुणनफल 108 तथा योग-तन्त्र परम्परा में 108 पवित्र केन्द्रों की अवधारणा इसी प्रतीकवाद को पुष्ट करती है। अतः सम्भवतः मुक्तिकोपनिषद् का उद्देश्य यह संकेत करना था कि इन 108 उपनिषदों में सम्पूर्ण वेदान्त का सार निहित है। यहाँ 108 कोई मात्र गणितीय संख्या नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पूर्णता का प्रतीक है।
उपनिषदों की संख्या के विषय में एक अन्य परम्परा 1180 उपनिषदों का उल्लेख करती है। इस मत का आधार प्राचीन वैदिक शाखाओं की संख्या है। परम्परानुसार ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 109, सामवेद की 1000 तथा अथर्ववेद की 50 शाखाएँ मानी गई हैं, जिनका योग 1180 होता है। कुछ विद्वानों ने यह अनुमान व्यक्त किया कि प्रत्येक शाखा का अपना एक उपनिषद रहा होगा, इसलिए उपनिषदों की कुल संख्या 1180 मानी जा सकती है। किन्तु यह एक सैद्धान्तिक परिकल्पना है, क्योंकि न तो 1180 उपनिषद आज उपलब्ध हैं और न ही किसी प्राचीन ग्रन्थ में उनके नामों की सम्पूर्ण सूची प्राप्त होती है। अतः यह संख्या ऐतिहासिक तथ्य से अधिक वैदिक शाखाओं पर आधारित एक परम्परागत अवधारणा प्रतीत होती है।
वास्तव में मुक्तिकोपनिषद् का उद्देश्य उपनिषदों की कुल संख्या निर्धारित करना नहीं, बल्कि मोक्षोपयोगी उपनिषदों का एक मानक संग्रह प्रस्तुत करना था। इसी कारण भगवान् राम हनुमान को पहले माण्डूक्योपनिषद्, फिर प्रमुख उपनिषदों और अन्ततः समस्त 108 उपनिषदों के अध्ययन का निर्देश देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मुक्तिकोपनिषद् संख्या की नहीं, साधना और ज्ञान की प्रामाणिक परम्परा की स्थापना करना चाहता है।
अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मुक्तिकोपनिषद् में उल्लिखित 108 उपनिषदों की सूची भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का एक सुविचारित, प्रतिनिधि और प्रतीकात्मक संकलन है। इसका क्रम वैदिक वर्गीकरण के साथ-साथ साधक की आध्यात्मिक उन्नति का भी द्योतक है। ज्ञान से योग, योग से वैराग्य, वैराग्य से उपासना और उपासना से अद्वैत-ब्रह्म की अनुभूति तक की सम्पूर्ण यात्रा इन 108 उपनिषदों में समाहित है। इसी कारण मुक्तिकोपनिषद् द्वारा स्वीकृत यह सूची आज भी वेदान्त परम्परा में सर्वाधिक प्रमाणिक और मान्य मानी जाती है तथा भारतीय अध्यात्म के एक संक्षिप्त किन्तु समग्र विश्वकोश के रूप में प्रतिष्ठित है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment