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Monday, 1 June 2026

जो हम समझते हैं कि हम हैं

 जो हम समझते हैं कि हम हैं

उम्र के साथ एक अजीब बात होती है।

हम दुनिया को कम और स्वयं को अधिक देखने लगते हैं।

युवावस्था में हमें लगता है कि हमारी समस्याएँ बाहर हैं—लोगों में, परिस्थितियों में, भाग्य में, समय में। फिर धीरे-धीरे एक दिन पता चलता है कि संसार से हमारा संघर्ष उतना नहीं था, जितना अपनी ही बनाई हुई छवि से था।

हम जीवन भर एक व्यक्ति बने रहने की कोशिश करते हैं।

एक नाम।

एक परिचय।

एक कहानी।

मगर भीतर कुछ ऐसा है जो हर परिचय से बड़ा है।

जिसे सफलता नहीं बदलती, असफलता नहीं तोड़ती।

जिसे प्रशंसा से कोई लाभ नहीं और अपमान से कोई हानि नहीं।

वेदांत उसे आत्मा कहता है।

बुद्ध उसे शून्यता के द्वार तक ले जाते हैं।

और जीवन उसे बार-बार खोकर पहचानने की प्रक्रिया बना देता है।

मैंने देखा है, आदमी का अधिकांश दुख घटनाओं से नहीं, पहचान से जुड़ा होता है।

"मेरे साथ ऐसा कैसे हुआ?"

"मुझे यह क्यों नहीं मिला?"

"मुझे वह क्यों छोड़ गया?"

इन सब प्रश्नों के केंद्र में एक "मैं" बैठा होता है, जिसे हम बिना जाँचे-परखे सच मान लेते हैं।

लेकिन यदि वही "मैं" थोड़ा-सा ढीला पड़ जाए, तो दुख का स्वरूप भी बदलने लगता है।

तब जीवन युद्धभूमि नहीं रह जाता।

एक रहस्य बन जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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