समय शायद बहता नहीं
कभी-कभी मुझे लगता है कि समय के बारे में हमारी सारी धारणाएँ अधूरी हैं।
हम कहते हैं कि समय बीत रहा है।
मगर क्या सचमुच?
या हम ही बीत रहे हैं?
नदी किनारे खड़े होकर हमें लगता है कि पानी बह रहा है।
लेकिन यदि नदी चेतन होती, तो शायद वह कहती—"मैं तो यहीं हूँ, बह तो तुम रहे हो।"
शायद समय भी ऐसा ही है।
वह कहीं नहीं जाता।
वह एक विराट उपस्थिति की तरह स्थिर है।
उसके भीतर जन्म हैं, मृत्यु हैं, मिलन हैं, वियोग हैं।
और हम उन्हें एक-एक करके अनुभव करते हुए गुज़रते जाते हैं।
इसलिए स्मृति कभी-कभी इतनी जीवित लगती है।
वह अतीत नहीं होती।
वह समय के किसी कोने में अब भी घट रही होती है।
हमारी चेतना बस कुछ क्षणों के लिए वहाँ पहुँच जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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