अध्यात्मोपनिषद् : अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से एक शोधपूर्ण ग्रन्थ
मुक्तिकोपनिषद्
में वर्णित 108 उपनिषदों की सूची में
अध्यात्मोपनिषद् का स्थान उत्तरार्द्ध
में आता है। इससे
स्पष्ट है कि यह
उपनिषद् साधना की प्रारम्भिक अवस्था
के लिए नहीं, बल्कि
उस साधक के लिए
रचा गया है जिसने
वैराग्य, विवेक और आत्मचिन्तन के
मार्ग को स्वीकार कर
लिया है। इसका उद्देश्य
कर्मकाण्ड या उपासना का
प्रतिपादन नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की प्रत्यक्ष अनुभूति
कराना है।
अध्यात्मोपनिषद्
का परिचय
‘अध्यात्म’
शब्द दो पदों से
बना है—
- अधि = सम्बन्धित
- आत्म = आत्मा
अर्थात्
जो आत्मा से सम्बन्धित ज्ञान
प्रदान करे, वह अध्यात्म
है। इस दृष्टि से अध्यात्मोपनिषद् का
उद्देश्य बाह्य जगत् का वर्णन
नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक
स्वरूप का बोध कराना
है।
अध्यात्मोपनिषद्
अथर्ववेद से सम्बद्ध मानी
जाती है।
अथर्ववेद
के अनेक उपनिषद् योग,
संन्यास और आत्मज्ञान से
सम्बन्धित हैं। अध्यात्मोपनिषद् भी
इसी परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थ है।
यह
उपनिषद् मुख्यतः निम्न विषयों पर केन्द्रित है—आत्मा का स्वरूप ,जीव
और ब्रह्म की एकता ,अविद्या
की प्रकृति मन का निग्रह
,वैराग्य ,संन्यास ,जीवन्मुक्ति ,ब्रह्मस्थिति
अध्यात्मोपनिषद्
की भाषा और शैली
से ज्ञात होता है कि
इसकी रचना उत्तरवर्ती वेदान्त-काल में हुई।
इसमें अद्वैत वेदान्त का प्रभाव अत्यन्त
स्पष्ट दिखाई देता है।,
विशेषतः
निम्न सिद्धान्त प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित
हैं— ब्रह्म सत्य है ,जगत्
मिथ्या है ,जीव और
ब्रह्म अभिन्न हैं ,अविद्या ही
बन्धन का कारण है
,ज्ञान ही मोक्ष का
साधन है .ये सभी
सिद्धान्त आदि शंकराचार्य द्वारा
प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त के मूल सिद्धान्त
हैं।
अतः
अनेक विद्वान् इसे उत्तर-शांकर
वेदान्त की परम्परा से
सम्बद्ध मानते हैं।
अध्यात्मोपनिषद्
का मूल प्रतिपाद्य आत्मा
है।उपनिषद् के अनुसार—आत्मा
न जन्म लेती है,
न मरती है, न
बदलती है। वह—नित्य है ,शुद्ध है
,बुद्ध है ,मुक्त है
.
शरीर,
इन्द्रिय, मन और बुद्धि
आत्मा नहीं हैं। आत्मा इन
सबकी साक्षी है।
जैसे
सूर्य बादलों से प्रभावित नहीं
होता, वैसे ही आत्मा
शरीर और मन के
विकारों से प्रभावित नहीं
होती।
अध्यात्मोपनिषद्
का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्त ‘साक्षीभाव’ है।मनुष्य सामान्यतः स्वयं को शरीर मानता
है।
वह
कहता है— मैं दुखी
हूँ ,मैं बूढ़ा हो
गया हूँ ,मैं असफल
हूँ
उपनिषद्
कहता है— यह सब
शरीर और मन की
अवस्थाएँ हैं।,आत्मा इन सबकी केवल
साक्षी है।जब साधक इस सत्य
को समझ लेता है
तब बन्धन शिथिल होने लगता है।
अध्यात्मोपनिषद्
के अनुसार बन्धन का कारण संसार
नहीं है।बन्धन का कारण अविद्या
है।
अविद्या
क्या है?
अनात्म
वस्तु को आत्मा समझ
लेना।
शरीर
को ‘मैं’ मानना, मन
को ‘मैं’ मानना, अहंकार
को ‘मैं’ मानना—यही
अविद्या है।
अविद्या
से— राग उत्पन्न होता
है ,द्वेष उत्पन्न होता है ,कामना
उत्पन्न होती है ,भय
उत्पन्न होता है ,और
यही सब पुनर्जन्म का
कारण बनते हैं।
उपनिषद्
बार-बार मन की
ओर संकेत करता है।मन ही
बन्धन है।मन ही मोक्ष का
साधन है।जब मन विषयों में
आसक्त होता है तब
बन्धन उत्पन्न होता है।जब मन
आत्मा में स्थित होता
है तब मुक्ति प्राप्त
होती है।
यह विचार अमृतबिन्दूपनिषद् के प्रसिद्ध वाक्य—“मन एव मनुष्याणां
कारणं बन्धमोक्षयोः”से पूर्णतः मेल
खाता है।
अध्यात्मोपनिषद्
में वैराग्य को ज्ञान की
अनिवार्य भूमिका माना गया है।वैराग्य
का अर्थ संसार का
त्याग नहीं है।
वैराग्य
का अर्थ है— वस्तुओं
की सीमाओं को समझ लेना।
जब
मनुष्य जान लेता है
कि— धन नित्य नहीं
है, यश स्थायी नहीं
है, शरीर अमर नहीं
है, तब उसके भीतर
वैराग्य उत्पन्न होता है।
यह उपनिषद् केवल मृत्यु के
बाद मोक्ष की बात नहीं
करता। यह जीवन्मुक्ति की शिक्षा देता
है।
जीवन्मुक्त
वह है—
जो शरीर में रहते
हुए भी स्वयं को
शरीर नहीं मानता।
जो संसार में रहते हुए
भी संसार से बँधा नहीं
होता।
जो सुख-दुःख में
सम रहता है।
जो आत्मा में स्थित रहता
है।
अध्यात्मोपनिषद्
के अनुसार मोक्ष का साधन केवल
ज्ञान है।
न कर्म अकेले पर्याप्त
हैं।न उपासना अकेली पर्याप्त है।ज्ञान के बिना मोक्ष
सम्भव नहीं।
यह ज्ञान क्या है?
“मैं
शरीर नहीं हूँ।”
“मैं
मन नहीं हूँ।”
“मैं
ब्रह्म हूँ।”
यही
आत्मज्ञान है।
जब यह अनुभूति स्थिर
हो जाती है तब
मोक्ष प्राप्त होता है।
अन्य
उपनिषदों से तुलना
अध्यात्मोपनिषद्
का सम्बन्ध अनेक उपनिषदों से
दिखाई देता है।
ईशावास्योपनिषद्
- दोनों आत्मा की सर्वव्यापकता स्वीकार
करते हैं।
कठोपनिषद्
-दोनों आत्मा की नित्यता का
प्रतिपादन करते हैं।
माण्डूक्योपनिषद्
-दोनों अद्वैत ब्रह्म की स्थापना करते
हैं।
अमृतबिन्दूपनिषद्
-दोनों मनोनिग्रह को मुक्ति का
साधन मानते हैं।
आत्मोपनिषद्
-दोनों आत्मस्वरूप के प्रत्यक्ष ज्ञान
पर बल देते हैं।
शंकराचार्यीय
वेदान्त के सन्दर्भ में अध्यात्मोपनिषद्
यद्यपि
इस उपनिषद् पर शंकराचार्य का
भाष्य उपलब्ध नहीं है, तथापि
इसकी विचारधारा पूर्णतः अद्वैतमयी है।
इसमें
निम्न शांकर सिद्धान्त स्पष्ट रूप से दिखाई
देते हैं— अध्यास ,अविद्या
आत्मा-ब्रह्म की अभिन्नताज्ञान द्वारा
मोक्ष ,जीवन्मुक्ति इस कारण अध्यात्मोपनिषद्
को शांकर वेदान्त का एक महत्त्वपूर्ण
उपनिषद् माना जाता है।
अध्यात्मोपनिषद्
आकार में लघु किन्तु
विचार में अत्यन्त विशाल
ग्रन्थ है। यह मनुष्य
को बाह्य जगत् की जटिलताओं
से हटाकर उसके वास्तविक स्वरूप
की ओर ले जाता
है। इसमें आत्मा को नित्य, शुद्ध,
बुद्ध और मुक्त बताया
गया है तथा अविद्या
को समस्त बन्धनों का मूल कारण
माना गया है। यह
उपनिषद् सिखाता है कि मोक्ष
किसी दूरस्थ लोक की प्राप्ति
नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप
की पहचान है। जब साधक
शरीर, मन और अहंकार
से परे स्थित साक्षी
आत्मा का अनुभव कर
लेता है, तब वही
जीवन्मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार अध्यात्मोपनिषद् अद्वैत वेदान्त, आत्मज्ञान और मोक्षमार्ग का
एक अनुपम, गहन तथा कालजयी
ग्रन्थ है, जो आज
भी आत्मबोध के साधकों के
लिए उतना ही प्रासंगिक
है जितना अपने रचनाकाल में
था।
Mukesh
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