फल
पेड़ पर लगे एक फल को देखते हुए अचानक लगा कि परिपक्वता का अर्थ शायद ऊँचा उठना नहीं, झुकना है।
जब वह कच्चा था, शाख़ से कसकर जुड़ा हुआ था। धीरे-धीरे धूप, हवा और समय ने उसे पकाया। और जैसे-जैसे वह परिपक्व हुआ, उसका भार बढ़ता गया। अंततः एक दिन वह शाख़ से अलग हो जाएगा।
प्रकृति में परिपक्वता का अंतिम परिणाम अलगाव है, अधिकार नहीं।
फल पककर पेड़ का नहीं रहता। वह किसी और की भूख का अन्न बन जाता है, किसी बीज का भविष्य बन जाता है।
मनुष्य अक्सर अपनी उपलब्धियों को जमा करता है। फल अपनी परिपक्वता बाँट देता है।
शायद इसी में उसका सौंदर्य है।
वह अपने लिए नहीं पकता।
और जब वह सबसे अधिक पूर्ण होता है, तभी स्वयं को छोड़ देता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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