आज सुबह एक फूल को देर तक देखता रहा।
वह पूरी तरह खिला हुआ था, मानो उसे अपने अल्प जीवन का पूरा बोध हो। उसमें कोई हड़बड़ी नहीं थी, कोई भय नहीं कि शाम तक उसकी पंखुड़ियाँ मुरझाने लगेंगी।
मनुष्य अक्सर स्थायित्व चाहता है। फूल ऐसा नहीं करता। वह खिलता है, अपनी सुगंध बिखेरता है और फिर चुपचाप झर जाता है।
शायद इसी कारण वह सुंदर है।
जो हमेशा बना रहे, वह आदत बन जाता है। जो क्षणभर ठहरे और फिर चला जाए, वही स्मृति बनता है।
फूल को देखते हुए लगा कि जीवन का मूल्य उसकी लंबाई में नहीं, उसकी खिलने की क्षमता में छिपा है।
कुछ लोग वर्षों जीते हैं और कभी नहीं खिलते।
कुछ लोग एक फूल की तरह आते हैं और अपने पीछे एक पूरी ऋतु छोड़ जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,
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