पत्तियाँ
आज एक सूखी पत्ती मेरे कंधे पर आ गिरी।
मैंने उसे हथेली पर रखकर देखा। कुछ दिन पहले तक वह किसी शाख़ का हिस्सा रही होगी। हवा के साथ झूमी होगी, धूप में चमकी होगी, बारिश में भीगी होगी। अब वह पेड़ से अलग थी।
अजीब बात है, उसमें कोई प्रतिरोध नहीं था।
वह चुपचाप टूट गई थी, जैसे उसे पता हो कि बिछड़ना भी जीवन का एक स्वाभाविक क्रम है।
मैंने सोचा, प्रकृति में कहीं शिकायत नहीं है। पत्तियाँ टूटती हैं, नदियाँ बहती हैं, ऋतुएँ बदलती हैं। केवल मनुष्य है जो हर परिवर्तन को हानि की तरह याद रखता है।
पत्ती मेरी हथेली पर बहुत हल्की थी।
उसे देखते हुए लगा—शायद मुक्ति उड़ने में नहीं, बल्कि इतना हल्का हो जाने में है कि समय तुम्हें जहाँ ले जाए, वहाँ जाने में कोई भय न बचे।
मुकेश ,,,,,,,,,
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