एक पेड़ के पास
मैं कई दिनों से देख रहा हूँ कि शाम होते-होते मेरे कदम अनायास उस पेड़ की ओर मुड़ जाते हैं जो सड़क के किनारे, लगभग उपेक्षित-सा खड़ा है। न वह बहुत विशाल है, न दुर्लभ, न ही उसके आसपास कोई विशेष आकर्षण है। लोग उसके पास से गुज़र जाते हैं जैसे वह वहाँ है ही नहीं। लेकिन न जाने क्यों मुझे उसके पास कुछ देर खड़े रहना अच्छा लगता है।
मैं वहाँ जाकर कुछ करता भी नहीं। न उसे देखता हूँ, न उसके बारे में सोचता हूँ। बस खड़ा रहता हूँ। कभी-कभी लगता है कि मनुष्य के जीवन में कुछ संबंध ऐसे भी होने चाहिए जिनमें परिचय की कोई आवश्यकता न हो। वह पेड़ मुझे नहीं जानता। उसे मेरे नाम, मेरे काम, मेरी सफलताओं या असफलताओं से कोई सरोकार नहीं। और शायद इसी कारण उसके पास खड़े होकर एक अजीब तरह की राहत महसूस होती है।
मनुष्यों के बीच रहते हुए हम लगातार परिभाषित होते रहते हैं। कोई हमें किसी रिश्ते से पहचानता है, कोई किसी पेशे से, कोई किसी विचार से। धीरे-धीरे हम स्वयं भी उन परिभाषाओं पर विश्वास करने लगते हैं। फिर एक दिन लगता है कि हमारे और हमारे वास्तविक अस्तित्व के बीच शब्दों की एक मोटी दीवार खड़ी हो गई है।
पेड़ों के साथ ऐसा नहीं होता।
वे कुछ बनने की कोशिश नहीं करते।
वे अपने बारे में कोई घोषणा नहीं करते।
वे केवल होते हैं।
और शायद "होना" संसार की सबसे कठिन कला है।
उस दिन हवा कुछ तेज़ थी। सूखे पत्ते बार-बार टूटकर नीचे गिर रहे थे। मैं उन्हें देखता रहा। एक पत्ता मेरी तरफ़ उड़ता हुआ आया और मेरे पैरों के पास ठहर गया। मैंने उसे उठाया। वह कभी इसी पेड़ का हिस्सा रहा होगा। कभी उसमें भी रस दौड़ता होगा, धूप चमकती होगी, वर्षा की बूँदें ठहरती होंगी। अब वह पेड़ से अलग था।
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उसमें कोई शिकायत नहीं थी।
प्रकृति में कहीं शिकायत दिखाई नहीं देती। नदी समुद्र तक पहुँचकर शिकायत नहीं करती कि उसका नाम खो गया। बादल वर्षा बनकर धरती पर गिरते हैं और यह दुःख नहीं मनाते कि उनका आकार बदल गया। पत्ते टूटकर गिरते हैं और धरती में मिल जाते हैं। केवल मनुष्य है जो हर परिवर्तन को व्यक्तिगत हानि की तरह जीता है।
शायद इसलिए वह सबसे अधिक दुखी भी है।
मैंने उस पत्ते को वापस मिट्टी पर रख दिया। सांझ गहराने लगी थी। पक्षियों की आवाज़ें कम हो रही थीं। पेड़ उसी तरह खड़ा था—निस्पृह, शांत, अपने भीतर पूर्ण।
लौटते समय एक विचित्र विचार मन में आया।
संभव है कि हम प्रकृति के पास उत्तर खोजने नहीं जाते।
हम वहाँ इसलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ कोई प्रश्न नहीं होते।
और शायद जीवन की सबसे गहरी शांति उत्तरों से नहीं, प्रश्नों के शांत हो जाने से जन्म लेती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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