आत्मपूजोपनिषद् और ईशावास्योपनिषद् : एक विवेचनात्मक अध्ययन
उपनिषद्-साहित्य भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन की वह धारा है जिसमें मनुष्य, जगत् और परमात्मा के सम्बन्ध को अत्यन्त गम्भीरता और सूक्ष्मता के साथ समझने का प्रयास किया गया है। प्रत्येक उपनिषद् अपने ढंग से ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करता है, किन्तु सभी का अन्तिम लक्ष्य आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति है। ईशावास्योपनिषद् और आत्मपूजोपनिषद् दो ऐसे उपनिषद् हैं जो आकार और शैली में भिन्न होने पर भी अपने मूल उद्देश्य में एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं। ईशावास्योपनिषद् जहाँ सम्पूर्ण जगत् में ईश्वर की उपस्थिति का उद्घोष करता है, वहीं आत्मपूजोपनिषद् उसी ईश्वर को साधक के अन्तःकरण में प्रतिष्ठित करके उसकी उपासना की आन्तरिक पद्धति प्रस्तुत करता है।
यदि ईशावास्योपनिषद् हमें यह सिखाता है कि “सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है”, तो आत्मपूजोपनिषद् हमें यह अनुभव कराता है कि “वह ईश्वर मेरे अपने आत्मस्वरूप में ही विद्यमान है।” इस दृष्टि से दोनों उपनिषद् एक ही सत्य के दो परस्पर सम्बद्ध आयाम प्रस्तुत करते हैं।
ईशावास्योपनिषद् का मूल प्रतिपाद्य
ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र सम्पूर्ण उपनिषद् का सार माना जाता है—
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
अर्थात् इस जगत् में जो कुछ भी गतिशील अथवा स्थिर है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।
यह मन्त्र मनुष्य को यह दृष्टि प्रदान करता है कि संसार कोई ईश्वर-विहीन वस्तु नहीं है। प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव और प्रत्येक अनुभव के भीतर वही परम सत्ता विद्यमान है। इसलिए संसार के प्रति आसक्ति नहीं, बल्कि ईश्वर-दृष्टि विकसित करनी चाहिए। यही कारण है कि उपनिषद् आगे त्यागपूर्वक भोग करने तथा लोभ से दूर रहने का उपदेश देता है।
ईशावास्योपनिषद् का सम्पूर्ण चिन्तन इस बात पर केन्द्रित है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे बँधे नहीं। कर्म करे, किन्तु कर्मफल में आसक्त न हो। भोग करे, किन्तु स्वामित्व का अहंकार न रखे। यही उपनिषद् का कर्म और ज्ञान का समन्वित मार्ग है।
आत्मपूजोपनिषद् का मूल प्रतिपाद्य
आत्मपूजोपनिषद् का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अधिक अन्तर्मुखी है। यहाँ जगत् की चर्चा कम और साधक की आन्तरिक साधना की चर्चा अधिक मिलती है। यह उपनिषद् बाह्य पूजा की समस्त सामग्रियों और विधियों को आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करता है।
उदाहरणार्थ—
- आत्मचिन्तन को ध्यान कहा गया है।
- कर्तृत्वभाव के त्याग को आवाहन कहा गया है।
- स्थिर ज्ञान को आसन कहा गया है।
- आत्मचैतन्य को दीप कहा गया है।
- “सोऽहम्” भाव को नमस्कार कहा गया है।
- सन्तोष को विसर्जन कहा गया है।
इस प्रकार आत्मपूजोपनिषद् का उद्देश्य साधक को यह समझाना है कि वास्तविक पूजा बाहर नहीं, भीतर घटित होती है। आत्मा का साक्षात्कार ही पूजा की चरम परिणति है।
दोनों उपनिषदों में ईश्वर की अवधारणा
ईशावास्योपनिषद् और आत्मपूजोपनिषद् दोनों ईश्वर को सर्वव्यापक मानते हैं, किन्तु उनकी प्रस्तुति में भिन्नता दिखाई देती है।
ईशावास्योपनिषद् का आरम्भ विश्व-दृष्टि से होता है। वह कहता है कि सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से आच्छादित है। उसकी दृष्टि बाहर से भीतर की ओर चलती है। साधक पहले जगत् में ईश्वर को देखता है और फिर आत्मा में।
इसके विपरीत आत्मपूजोपनिषद् भीतर से बाहर की ओर चलता है। वह आत्मा को ही पूजा का केन्द्र बनाता है और साधक को अपने अन्तःकरण में स्थित चैतन्य का बोध कराता है।
अर्थात् ईशावास्योपनिषद् का मार्ग “विश्व से आत्मा” की ओर है, जबकि आत्मपूजोपनिषद् का मार्ग “आत्मा से विश्व” की ओर है।
त्याग और वैराग्य की भावना
ईशावास्योपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य है—
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा।
अर्थात् त्याग की भावना के साथ जीवन का उपभोग करो।
यहाँ त्याग का अर्थ संसार का परित्याग नहीं, बल्कि स्वामित्व-बुद्धि का त्याग है। मनुष्य वस्तुओं का उपयोग करे, किन्तु उन्हें अपना न माने।
आत्मपूजोपनिषद् में भी यही भाव एक भिन्न रूप में दिखाई देता है। वहाँ “सर्वकर्मनिराकरणम् आवाहनम्” कहकर कर्तृत्वाभिमान के त्याग पर बल दिया गया है। जब तक मनुष्य अपने को कर्ता मानता है, तब तक वह बन्धन में रहता है। अतः दोनों उपनिषद् अहंकार और आसक्ति के त्याग को आध्यात्मिक जीवन का आधार मानते हैं।
ज्ञान की भूमिका
दोनों उपनिषदों में ज्ञान का अत्यन्त महत्त्व है।
ईशावास्योपनिषद् विद्या और अविद्या के समन्वय की चर्चा करते हुए बताता है कि केवल कर्म या केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को ऐसा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जो उसे मृत्यु से पार ले जाए और अमृतत्व की ओर अग्रसर करे।
आत्मपूजोपनिषद् में भी ज्ञान को पूजा का मूल तत्त्व माना गया है। वहाँ ज्ञान ही पुष्प है, ज्ञान ही धूप है और ज्ञान ही दीप है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मज्ञान के बिना पूजा केवल बाह्य क्रिया बनकर रह जाती है।
अद्वैत की स्थापना
दोनों उपनिषदों का अन्तिम निष्कर्ष अद्वैत की स्थापना है।
ईशावास्योपनिषद् कहता है—
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।
अर्थात् ज्ञानी पुरुष के लिए सभी प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं।
जब सबमें एक ही आत्मा दिखाई देने लगती है, तब द्वेष, भय और शोक समाप्त हो जाते हैं।
आत्मपूजोपनिषद् इसी सत्य को “सोऽहंभावो नमस्कारः” के रूप में व्यक्त करता है। जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप है, तब उपासक और उपास्य का भेद समाप्त हो जाता है।
इस प्रकार दोनों उपनिषद् अद्वैत वेदान्त की उसी महान् अनुभूति की ओर संकेत करते हैं जहाँ केवल एक ही सत्य शेष रह जाता है।
व्यावहारिक दृष्टि से दोनों उपनिषदों का महत्त्व
आधुनिक जीवन में ईशावास्योपनिषद् हमें यह सिखाता है कि संसार को केवल उपभोग की वस्तु न मानकर ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखें। इससे पर्यावरण, समाज और मानवता के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।
दूसरी ओर आत्मपूजोपनिषद् हमें आत्मनिरीक्षण, अन्तर्मुखता और आत्मबोध की प्रेरणा देता है। यह बताता है कि शान्ति और आनन्द बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित आत्मा की पहचान में निहित हैं।
इस प्रकार एक उपनिषद् जीवन-दृष्टि प्रदान करता है और दूसरा साधना-दृष्टि।
ईशावास्योपनिषद् और आत्मपूजोपनिषद् दोनों मिलकर उपनिषद्-दर्शन की एक पूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। ईशावास्योपनिषद् हमें जगत् में ईश्वर का दर्शन कराता है, जबकि आत्मपूजोपनिषद् हमें अपने भीतर उसी ईश्वर का अनुभव कराता है। एक बाह्य जगत् को ईश्वरमय बनाता है, दूसरा अन्तःकरण को ब्रह्ममय बनाता है। एक त्याग, समत्व और कर्मयोग की शिक्षा देता है, तो दूसरा आत्मनिष्ठा, आत्मोपासना और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है।
अन्ततः दोनों उपनिषद् एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं—ईश्वर और आत्मा में कोई भेद नहीं है। जो सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है, वही प्रत्येक मनुष्य के हृदय में आत्मरूप से विद्यमान है। उस सत्य का साक्षात्कार ही उपनिषदों का लक्ष्य, साधना का सार और जीवन की परम सिद्धि है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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