आत्मपूजोपनिषद् : आत्मा की पूजा का अद्भुत उपनिषद्
भारतीय
आध्यात्मिक परम्परा में पूजा का
अत्यन्त महत्त्व है। सामान्यतः हम
पूजा को मन्दिर, मूर्ति,
दीपक, धूप, पुष्प और
नैवेद्य आदि से जोड़कर
देखते हैं। किन्तु आत्मपूजोपनिषद्
हमें एक बिल्कुल नई
दृष्टि प्रदान करता है। यह
उपनिषद् बताता है कि पूजा
केवल बाहरी वस्तुओं से नहीं होती,
बल्कि अपने भीतर स्थित
आत्मा के प्रति जागरूक
होकर भी की जा
सकती है। इस उपनिषद्
में पूजा की प्रत्येक
सामग्री और प्रत्येक क्रिया
का आन्तरिक एवं आध्यात्मिक अर्थ
बताया गया है। यहाँ
साधक को यह शिक्षा
दी जाती है कि
आत्मा ही पूज्य है,
आत्मा ही पूजा है
और अन्ततः आत्मा ही परमात्मा है।
१.
तस्य निश्चिन्तनं ध्यानम् ।
अर्थ
— आत्मा का निरन्तर चिन्तन
करना ही ध्यान है।
हम
सामान्यतः ध्यान का अर्थ आँखें
बन्द करके बैठना समझते
हैं। किन्तु इस उपनिषद् के
अनुसार ध्यान का अर्थ है
अपने वास्तविक स्वरूप को याद रखना।
जैसे कोई व्यक्ति दिन-रात अपने प्रिय
व्यक्ति को याद करता
है, वैसे ही साधक
को अपने भीतर स्थित
आत्मा का स्मरण करना
चाहिए। आत्मा का निरन्तर चिन्तन
ही सच्चा ध्यान है।
२.
सर्वकर्मनिराकरणमावाहनम्
।
अर्थ
— सभी कर्मों के कर्तापन का
त्याग ही आवाहन है।
पूजा
में हम देवता का
आवाहन करते हैं अर्थात्
उन्हें बुलाते हैं। परन्तु जो
ईश्वर हर जगह मौजूद
है, उसे बुलाने की
आवश्यकता ही क्या है?
उपनिषद् कहता है कि
जब मनुष्य यह अहंकार छोड़
देता है कि "सब
कुछ मैं ही कर
रहा हूँ", तभी ईश्वर का
वास्तविक आवाहन होता है।
३.
निश्चलज्ञानमासनम्
।
अर्थ
— स्थिर ज्ञान ही आसन है।
सिर्फ
शरीर को स्थिर करके
बैठ जाना पर्याप्त नहीं
है। मन और बुद्धि
भी स्थिर होनी चाहिए। जब
हमारा मन संसार की
उलझनों से हटकर आत्मा
में टिक जाता है,
तभी सच्चे आसन की प्राप्ति
होती है।
४.
समुन्मनीभावः पाद्यम् ।
अर्थ
— मन के शान्त और
ऊर्ध्वगामी हो जाने की
अवस्था ही पाद्य है।
जिस
प्रकार पूजा में देवता
के चरण धोए जाते
हैं, उसी प्रकार साधक
को अपने मन को
विकारों से धोना चाहिए।
जब मन शान्त होकर
आत्मा की ओर मुड़ता
है, तब वही वास्तविक
पाद्य है।
५.
सदामनस्कमर्घ्यम्
।
अर्थ
— सदा आत्मा में स्थित रहने
वाला मन ही अर्घ्य
है।
अर्घ्य
सम्मान का प्रतीक है।
आत्मा को सबसे बड़ा
सम्मान यही है कि
हमारा मन बार-बार
संसार में भटकने के
बजाय आत्मा में स्थिर रहे।
६.
सदादीप्तिराचमनीयम्
।
अर्थ
— आत्मा की नित्य प्रकाशित
चेतना ही आचमन है।
आचमन
शुद्धि का प्रतीक है।
उपनिषद् कहता है कि
वास्तविक शुद्धि जल से नहीं,
बल्कि आत्मा के प्रकाश को
पहचानने से होती है।
७.
वराकृतप्राप्तिः
स्नानम् ।
अर्थ
— श्रेष्ठतम स्वरूप अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति ही
स्नान है।
शरीर
को पानी से धोने
से बाहरी स्वच्छता आती है। लेकिन
आत्मज्ञान से भीतर की
अशुद्धियाँ दूर होती हैं।
इसलिए आत्मा का ज्ञान ही
वास्तविक स्नान है।
८.
सर्वात्मकत्वं दृश्यविलयो गन्धः ।
अर्थ
— सबमें एक ही आत्मा
का दर्शन करना ही गन्ध
है।
जब
हमें हर व्यक्ति, हर
जीव और हर वस्तु
में उसी परमात्मा का
दर्शन होने लगे, तब
यही आध्यात्मिक सुगन्ध है। यही इस
मन्त्र का सन्देश है।
९.
दृगविशिष्टात्मानः
अक्षताः ।
अर्थ
— साक्षीस्वरूप आत्मा का ज्ञान ही
अक्षत है।
अक्षत
अर्थात् जो टूटता नहीं।
आत्मा कभी नष्ट नहीं
होती। अपने भीतर उस
अमर आत्मा को पहचान लेना
ही सच्चा अक्षत अर्पण करना है।
१०.
चिदादीप्तिः पुष्पम् ।
अर्थ
— चेतना का प्रकाश ही
पुष्प है।
फूल
कुछ समय बाद मुरझा
जाते हैं, लेकिन आत्मा
का प्रकाश कभी नष्ट नहीं
होता। इसलिए ज्ञान और चेतना का
प्रकाश ही सबसे सुन्दर
पुष्प है।
११.
चिदाग्निस्वरूपं
धूपः ।
अर्थ
— ज्ञानरूपी अग्नि ही धूप है।
धूप
वातावरण को सुगन्धित करती
है। उसी प्रकार ज्ञान
हमारे जीवन से अज्ञान
और भ्रम को दूर
कर देता है। इसलिए
ज्ञान की अग्नि ही
वास्तविक धूप है।
१२.
चिदादित्यस्वरूपं
दीपः ।
अर्थ
— चेतना का सूर्यस्वरूप प्रकाश
ही दीप है।
दीपक
अन्धकार दूर करता है।
उसी प्रकार आत्मज्ञान जीवन के अज्ञानरूपी
अन्धकार को मिटा देता
है। इसलिए आत्मा ही सच्चा दीपक
है।
१३.
परिपूर्णचन्द्रामृतरसैकीकरणं
नैवेद्यम् ।
अर्थ
— पूर्ण आनन्द में एक हो
जाना ही नैवेद्य है।
सामान्य
पूजा में भोजन अर्पित
किया जाता है। परन्तु
आत्मपूजा में अपने आपको
परम आनन्द में समर्पित कर
देना ही नैवेद्य है।
१४.
निश्चलत्वं प्रदक्षिणम् ।
अर्थ
— आत्मा में अटल बने
रहना ही प्रदक्षिणा है।
जो
परमात्मा हर जगह है,
उसकी परिक्रमा कैसे की जा
सकती है? इसलिए आत्मा
में स्थिर रहना ही वास्तविक
प्रदक्षिणा है।
१५.
सोऽहंभावो नमस्कारः ।
अर्थ
— “वह परमात्मा मैं हूँ” — यह
भाव ही नमस्कार है।
यह
आत्मपूजोपनिषद् का सबसे महत्त्वपूर्ण
मन्त्र है। जब साधक
यह अनुभव कर लेता है
कि आत्मा और परमात्मा अलग
नहीं हैं, तभी सच्चा
नमस्कार होता है।
१६.
मौनं स्तुतिः ।
अर्थ
— मौन ही स्तुति है।
कुछ
सत्य ऐसे होते हैं
जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं
किया जा सकता। परमात्मा
भी ऐसा ही सत्य
है। इसलिए उसके प्रति सबसे
बड़ी स्तुति मौन है।
१७.
सन्तोषो विसर्जनम् ।
अर्थ
— पूर्ण सन्तोष ही विसर्जन है।
जब
आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है,
तब मनुष्य की सभी खोज
समाप्त हो जाती हैं।
उसे भीतर से पूर्ण
शान्ति और तृप्ति मिलती
है। यही पूजा का
वास्तविक समापन है।
आत्मपूजोपनिषद्
हमें एक अत्यन्त सुन्दर
और गहरी शिक्षा देता
है। यह बताता है
कि पूजा केवल मन्दिरों
में नहीं होती, बल्कि
अपने भीतर भी की
जा सकती है। यहाँ
पुष्प का अर्थ ज्ञान
है, दीप का अर्थ
आत्मचेतना है, धूप का
अर्थ विवेक है और नमस्कार
का अर्थ आत्मा और
परमात्मा की एकता का
अनुभव है। इस प्रकार
यह उपनिषद् हमें बाहरी साधनों
से आगे बढ़कर अपने
भीतर झाँकने की प्रेरणा देता
है। उसका सन्देश अत्यन्त
सरल है—यदि आत्मा को जान लिया, तो पूजा पूर्ण हो गई; यदि आत्मा को पहचान लिया, तो परमात्मा को पा लिया।
मुकेश ,,,,,,,,,
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