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Monday, 1 June 2026

अयमात्मा ब्रह्म" — यदि जागना ही पर्याप्त न हो तो?

 

अयमात्मा ब्रह्म" — यदि जागना ही पर्याप्त न हो तो?

कभी-कभी मुझे लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह नहीं कि वह संसार को सत्य मानता है।

उसका सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को जागा हुआ मानता है।

सुबह आँख खुलती है।

हम बिस्तर से उठते हैं।

अपने नाम को पहचानते हैं।

अपने संबंधों को याद करते हैं।

और तुरंत मान लेते हैं कि अब हम जाग गए हैं।

लेकिन माण्डूक्य उपनिषद् एक असहज प्रश्न पूछता है—

क्या सचमुच?


रात को स्वप्न में भी तो यही होता है।

वहाँ भी एक "मैं" होता है।

एक संसार होता है।

सुख-दुःख होते हैं।

भय और आशाएँ होती हैं।

और स्वप्न के भीतर हमें कभी संदेह नहीं होता कि यह सब वास्तविक है।

फिर एक दूसरी जागृति आती है और पूरा स्वप्न विलीन हो जाता है।

अब प्रश्न यह है—

क्या यह जाग्रत संसार भी किसी और जागृति की प्रतीक्षा में है?


माण्डूक्य उपनिषद् मनुष्य के अनुभव को तीन भागों में नहीं, चार भागों में देखता है।

जाग्रत।

स्वप्न।

सुषुप्ति।

और फिर...

तुरीय।

यहीं से दर्शन कविता बन जाता है।

और कविता मौन।


जाग्रत अवस्था में मैं संसार देखता हूँ।

स्वप्न में मैं अपना संसार रचता हूँ।

सुषुप्ति में दोनों लुप्त हो जाते हैं।

लेकिन इन तीनों में एक चीज़ समान रहती है।

कोई है जो इन तीनों का साक्षी है।

जिसने बचपन भी देखा।

युवावस्था भी देखी।

स्वप्न भी देखे।

गहरी नींद भी जानी।

और अब यह सब पढ़ भी रहा है।

वह कौन है?


माण्डूक्य का सारा रहस्य इसी प्रश्न में छिपा है।

उपनिषद् कहता है—

तुम जाग्रत व्यक्ति नहीं हो।

तुम स्वप्न देखने वाले भी नहीं हो।

तुम वह अंधकार भी नहीं हो जिसमें सब कुछ डूब जाता है।

तुम वह हो जिसके कारण ये तीनों संभव हैं।

जैसे परदे के कारण चलचित्र दिखाई देता है।

परदा किसी दृश्य का हिस्सा नहीं होता।

न युद्ध उसका है।

न प्रेम उसका।

न जन्म उसका।

न मृत्यु उसकी।

फिर भी उसके बिना कोई दृश्य संभव नहीं।


तुरीय कोई चौथी अवस्था नहीं है।

क्योंकि चौथी अवस्था भी आएगी और जाएगी।

तुरीय तो वह है जो तीनों अवस्थाओं में सदैव उपस्थित है।

जैसे आकाश।

बादल बदलते रहते हैं।

आकाश नहीं।

दिन आता है।

रात आती है।

आकाश नहीं बदलता।

जाग्रत आता है।

स्वप्न आता है।

सुषुप्ति आती है।

साक्षी नहीं बदलता।


और तब माण्डूक्य की महान उद्घोषणा सुनाई देती है—

"अयमात्मा ब्रह्म।"

यह आत्मा ही ब्रह्म है।

कोई दूरी नहीं।

कोई यात्रा नहीं।

कोई पुल नहीं।

जिसे खोज रहे हो, वही खोज रहा है।

जिसे पाना चाहते हो, वही पाने की इच्छा कर रहा है।

जिसे ब्रह्म कहते हो, वही अभी इस क्षण "मैं" कहकर स्वयं को सीमित समझ रहा है।


कितना विचित्र है।

समुद्र स्वयं को एक लहर समझकर भयभीत है।

आकाश स्वयं को एक बादल समझकर रो रहा है।

प्रकाश स्वयं को एक किरण समझकर अकेला महसूस कर रहा है।

और माण्डूक्य उपनिषद् धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहता है—

"तुम्हारी समस्या संसार नहीं है।

तुम्हारी समस्या विस्मृति है।"


शायद आध्यात्मिकता का अंतिम क्षण किसी दिव्य अनुभव में नहीं आता।

वह तब आता है जब पहली बार यह स्पष्ट हो जाता है कि मैं कभी बंधा ही नहीं था।

जिस मुक्ति की खोज थी, वह स्वप्न के पात्र की खोज थी।

साक्षी तो सदैव मुक्त था।

सदैव पूर्ण।

सदैव शांत।

और तब शब्द धीरे-धीरे रुक जाते हैं।

विचार भी।

केवल एक असीम, अनाम उपस्थिति रह जाती है।

माण्डूक्य उसे तुरीय कहता है।

ऋषि उसे आत्मा कहते हैं।

वेदांत उसे ब्रह्म कहता है।

और मौन...

वह उसे कोई नाम नहीं देता।

मुकेश ,,,,,,,

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