शायद संसार कभी बना ही नहीं
यह विचार पहली बार सुनने में लगभग असंभव लगता है।
हम इस मेज़ को छू सकते हैं।
इस शरीर को महसूस कर सकते हैं।
दुख, सुख, भूख, प्यास—सबका अनुभव कर सकते हैं।
फिर कोई कैसे कह सकता है कि संसार वास्तव में उत्पन्न ही नहीं हुआ?
लेकिन अद्वैत की सबसे साहसी घोषणाओं में से एक यही है।
"न निरोधो न चोत्पत्तिः..."
न कुछ नष्ट होता है, न कुछ उत्पन्न होता है।
गौड़पाद इसे अजातिवाद कहते हैं।
अर्थात्—जन्म कभी हुआ ही नहीं।
एक रात मैंने स्वप्न देखा।
उस स्वप्न में एक पूरा नगर था।
लोग थे।
रास्ते थे।
मिलन था।
वियोग था।
आशाएँ थीं।
भय थे।
और स्वप्न के भीतर यह सब बिल्कुल वास्तविक था।
स्वप्न का सूर्य भी उग रहा था।
स्वप्न की रात भी उतर रही थी।
स्वप्न के लोग भी अपने-अपने दुख लेकर जी रहे थे।
लेकिन आँख खुलते ही क्या हुआ?
क्या वह नगर नष्ट हो गया?
या यह कहना अधिक ठीक होगा कि वह कभी बना ही नहीं था?
अद्वैत यहीं एक विस्फोटक बात कहता है।
जिस प्रकार स्वप्न जागरण की दृष्टि से असत्य है, उसी प्रकार यह जाग्रत जगत भी किसी और स्तर की जागृति से देखा जाए तो वैसा नहीं रह जाता जैसा अभी दिखाई देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि संसार का अनुभव झूठा है।
अनुभव हो रहा है।
लेकिन उसकी व्याख्या अधूरी है।
हम लहरों को देखते हैं और कहते हैं—"लहर पैदा हुई।"
समुद्र कहता है—"जल के अतिरिक्त कुछ भी पैदा नहीं हुआ।"
हम कहते हैं—"यह आभूषण बना।"
सोना कहता है—"मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं बना।"
हम कहते हैं—"यह संसार उत्पन्न हुआ।"
ब्रह्म शायद मुस्कुराकर कहता होगा—
"मेरे अतिरिक्त कब कुछ था?"
शायद इसी कारण ऋषियों ने सृष्टि के रहस्य से अधिक चेतना के रहस्य में रुचि ली।
उन्हें यह जानना नहीं था कि संसार कब बना।
उन्हें यह देखना था कि जो इसे बना हुआ देख रहा है, वह कौन है।
क्योंकि यदि द्रष्टा का रहस्य खुल जाए, तो दृश्य का रहस्य अपने-आप खुलने लगता है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जीवन को बहुत गंभीरता से लेते हैं।
इतनी गंभीरता से कि खेल को भी युद्ध बना देते हैं।
भूमिकाओं को पहचान बना लेते हैं।
क्षणों को अनंत समझ बैठते हैं।
जबकि अस्तित्व शायद उतना गंभीर नहीं है।
एक बालक समुद्र किनारे रेत का घर बनाता है।
थोड़ी देर बाद स्वयं ही उसे गिरा देता है।
न बनाते समय दुखी होता है।
न मिटाते समय।
क्योंकि उसे पता है कि वह घर नहीं है।
वह केवल खेल रहा है।
शायद ज्ञानी और अज्ञानी के बीच सबसे बड़ा अंतर ज्ञान का नहीं, गंभीरता का है।
अज्ञानी अपने स्वप्न को अंतिम सत्य मान बैठता है।
ज्ञानी स्वप्न को नकारता नहीं, लेकिन उसकी प्रकृति जानता है।
वह प्रेम करता है, मगर चिपकता नहीं।
वह कार्य करता है, मगर बँधता नहीं।
वह जीता है, मगर हर क्षण जानता है कि जो दिखाई दे रहा है, उसकी वास्तविकता वैसी नहीं है जैसी प्रतीत होती है।
और तब एक दिन एक अजीब संभावना जन्म लेती है।
क्या हो यदि मैं इस संसार में एक व्यक्ति की तरह नहीं, एक स्वप्नद्रष्टा की तरह जीना शुरू करूँ?
क्या हो यदि मैं हर घटना के पीछे यह स्मरण बनाए रखूँ कि दृश्य बदलते रहते हैं, पर देखने वाली चेतना नहीं?
क्या हो यदि जन्म और मृत्यु भी उसी महान स्वप्न के दृश्य हों?
तब शायद पहली बार भय थोड़ा ढीला पड़े।
और जहाँ भय ढीला पड़ता है,
वहीं से अद्वैत अपनी सबसे सूक्ष्म फुसफुसाहट शुरू करता है
"तुम संसार में नहीं हो।
संसार तुममें प्रकट हो रहा है।"
मुकेश ,,,,,,,
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