क्या वास्तव में कुछ घट रहा है?
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि जीवन को हम जितना घटित मानते हैं, शायद वह उतना घटित है नहीं।
सुबह होती है, शाम होती है।
लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं।
घर बनते हैं, उजड़ते हैं।
शरीर जन्म लेते हैं और एक दिन मिट्टी में लौट जाते हैं।
सब कुछ बदलता हुआ दिखाई देता है।
लेकिन इस बदलते हुए दृश्य के पीछे क्या कोई ऐसी जगह भी है जहाँ कुछ नहीं बदलता?
यही प्रश्न मुझे बार-बार अपनी ओर खींचता है।
समुद्र को देखिए।
उसकी सतह पर अनगिनत लहरें उठती हैं।
कोई बड़ी है, कोई छोटी।
कोई अभी जन्मी है, कोई अभी मिट गई।
यदि कोई लहर स्वयं को केवल लहर माने, तो उसका पूरा जीवन भय से भरा होगा।
उसे जन्म का भय होगा।
मृत्यु का भय होगा।
दूसरी लहरों से तुलना होगी।
अपने आकार का अहंकार होगा।
अपने टूट जाने की चिंता होगी।
लेकिन यदि वही लहर एक क्षण के लिए देख सके कि वह जल भी है, तब?
तब उसका दृष्टिकोण बदल जाएगा।
लहर उठेगी भी, गिरेगी भी।
पर जल न पैदा हुआ था, न नष्ट होगा।
शायद मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह स्वयं को केवल अपनी लहर मान लेता है।
अपना नाम।
अपना इतिहास।
अपनी उपलब्धियाँ।
अपनी असफलताएँ।
और फिर उन्हीं की रक्षा में पूरी उम्र लगा देता है।
जबकि भीतर कुछ ऐसा है जिसे किसी रक्षा की आवश्यकता ही नहीं।
जिसे कोई चोट नहीं पहुँचा सकता।
जिसे समय छू नहीं सकता।
मैंने देखा है कि अधिकांश लोग जीवन के प्रश्नों का उत्तर खोज रहे हैं।
लेकिन कुछ विरले ऐसे होते हैं जो प्रश्न पूछने वाले को खोजने लगते हैं।
और वहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है।
क्योंकि तब समस्या का केंद्र बदल जाता है।
पहले प्रश्न था—"मुझे शांति कैसे मिले?"
अब प्रश्न होता है—"यह 'मुझे' कौन है जो शांति चाहता है?"
पहले प्रश्न था—"मैं दुखी क्यों हूँ?"
अब प्रश्न होता है—"यह कौन है जो स्वयं को दुखी कह रहा है?"
और कभी-कभी, यदि यह जिज्ञासा पर्याप्त गहरी हो जाए, तो प्रश्न उत्तर में नहीं बदलता।
प्रश्न स्वयं विलीन होने लगता है।
शायद सत्य कोई विचार नहीं है।
कोई दर्शन नहीं।
कोई मत या विश्वास भी नहीं।
वह तो उस मौन की तरह है जो सभी शब्दों के पीछे उपस्थित रहता है।
शब्द आते हैं, चले जाते हैं।
मौन बना रहता है।
विचार आते हैं, चले जाते हैं।
साक्षी बना रहता है।
जीवन आता है, चला जाता है।
और शायद उसी तरह मृत्यु भी।
लेकिन जो इन दोनों को देख रहा है, उसके बारे में हम बहुत कम सोचते हैं।
कभी-कभी देर रात, जब सब कुछ शांत हो जाता है, मैं केवल बैठा रहता हूँ।
न किसी निष्कर्ष की तलाश में।
न किसी अनुभव की।
बस इस रहस्य के सामने।
कि यह सब जो दिखाई दे रहा है—विचार, स्मृतियाँ, शरीर, संसार
इन सबको जानने वाला कौन है?
और जितना इस प्रश्न के साथ बैठता हूँ,
उतना ही लगता है कि उत्तर किसी नए ज्ञान में नहीं छिपा।
बल्कि उस व्यक्ति के धीरे-धीरे विलीन हो जाने में छिपा है,
जो उत्तर पाना चाहता है।
मुकेश ,,,,,,,
No comments:
Post a Comment