द्रष्टा कौन है?
कभी-कभी रात के बहुत शांत क्षणों में एक विचित्र प्रश्न उठता है।
मैं कौन हूँ जो यह सब देख रहा है?
विचार आते हैं, मैं उन्हें देखता हूँ।
भावनाएँ उठती हैं, मैं उन्हें भी देखता हूँ।
शरीर बदलता है, उम्र बदलती है, इच्छाएँ बदलती हैं, विश्वास बदलते हैं—और मैं इन सब परिवर्तनों का साक्षी बना रहता हूँ।
तो फिर मैं कौन हूँ?
क्या मैं अपने विचार हूँ?
लेकिन विचार तो सुबह कुछ और होते हैं, शाम को कुछ और।
क्या मैं अपनी स्मृतियाँ हूँ?
मगर स्मृतियाँ भी अधूरी हैं। बहुत कुछ भूल चुका हूँ, फिर भी मैं हूँ।
क्या मैं यह शरीर हूँ?
यह शरीर भी हर क्षण बदल रहा है।
बचपन का शरीर कहाँ है?
युवावस्था का शरीर कहाँ है?
फिर भी एक अनुभव है कि "मैं" वही हूँ।
यहीं से दर्शन आरम्भ होता है।
न पुस्तकों में।
न शास्त्रों में।
अपने अस्तित्व के प्रति एक गहरी जिज्ञासा में।
हम जीवन भर संसार को देखते रहते हैं।
पेड़, नदी, आकाश, लोग, घटनाएँ।
कुछ लोग विज्ञान की ओर जाते हैं और पूछते हैं—यह जगत कैसे बना?
कुछ लोग धर्म की ओर जाते हैं और पूछते हैं—इसे किसने बनाया?
लेकिन बहुत कम लोग रुककर यह पूछते हैं
जो यह सब देख रहा है, वह कौन है?
और आश्चर्य यह है कि शायद यही सबसे मूल प्रश्न है।
क्योंकि जब तक द्रष्टा अज्ञात है, तब तक दृश्य का सारा ज्ञान भी अधूरा है।
एक दिन मैंने महसूस किया कि मेरा अधिकांश जीवन वस्तुओं को पकड़ने में बीता है।
ज्ञान को।
रिश्तों को।
सम्मान को।
अनुभवों को।
यहाँ तक कि आध्यात्मिकता को भी।
लेकिन जो पकड़ रहा था, उसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं गया।
मानो कोई व्यक्ति पूरी उम्र आईने में दिखाई देने वाली दुनिया का अध्ययन करता रहे, पर एक बार भी अपनी आँखों की ओर न देखे।
शायद इसी कारण उपनिषदों के ऋषि बाहर से भीतर की ओर मुड़े थे।
उन्हें संसार में कोई कमी नहीं मिली थी।
कमी केवल एक थी
द्रष्टा स्वयं अपने लिए अदृश्य था।
और जब दृष्टि उसी की ओर मुड़ी, तो सारी खोज का स्वरूप बदल गया।
तब प्रश्न यह नहीं रहा कि ईश्वर कहाँ है।
प्रश्न यह हुआ कि वह कौन है जो ईश्वर को खोज रहा है।
तब प्रश्न यह नहीं रहा कि सत्य क्या है।
प्रश्न यह हुआ कि सत्य को जानने वाला कौन है।
और शायद आध्यात्मिक यात्रा का सबसे सूक्ष्म क्षण वही होता है—
जब खोजने वाला पहली बार स्वयं को खोज का विषय बना लेता है।
उस क्षण संसार नहीं बदलता।
पेड़ वैसे ही रहते हैं।
आकाश वैसा ही रहता है।
दिन और रात आते-जाते रहते हैं।
लेकिन देखने वाले की दिशा बदल जाती है।
और कभी-कभी केवल दिशा का बदल जाना ही मुक्ति की शुरुआत होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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