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Monday, 1 June 2026

मुक्ति शायद किसी और लोक में नहीं

 मुक्ति शायद किसी और लोक में नहीं

एक समय था जब मैं सोचता था कि मुक्ति कोई उपलब्धि होगी।

किसी पर्वत की चोटी की तरह।

जहाँ पहुँचकर सारे प्रश्न समाप्त हो जाएँगे।

अब लगता है, मुक्ति शायद उत्तर मिलने में नहीं, प्रश्न के विलीन हो जाने में है।

जब मन यह पूछना छोड़ दे कि "मुझे क्या मिलेगा?"

और यह देखना शुरू करे कि "मैं वास्तव में हूँ कौन?"

तभी एक दूसरी यात्रा शुरू होती है।

बहुत शांत।

बहुत सूक्ष्म।

उसमें कोई दर्शक नहीं होता।

कोई पुरस्कार नहीं होता।

सिर्फ़ एक-एक परत उतरती जाती है।

और अंत में जो बचता है, उसे शायद शब्द कभी व्यक्त नहीं कर सकते।

उपनिषद् इसलिए कहते हैं

"यतो वाचो निवर्तन्ते..."

जहाँ से वाणी लौट आती है।

क्योंकि कुछ सत्य समझे नहीं जाते।

केवल जिए जाते हैं।

और शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य भी यही है

कि जिसे हम खोज रहे हैं,

वह खोजने वाले से कभी अलग था ही नहीं।

मुकेश ,,,,,,,

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