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Monday, 1 June 2026

श्री उपनिषद् चालीसा (श्रीराम-हनुमान संवाद आधारित मोक्षमार्ग स्तुति)

 श्री उपनिषद् चालीसा (श्रीराम-हनुमान संवाद आधारित मोक्षमार्ग स्तुति)


भारतीय ज्ञान-परम्परा में उपनिषदों को वेदों का परम सार और आत्मविद्या का सर्वोच्च प्रकाश माना गया है। ये केवल दार्शनिक ग्रन्थ नहीं, बल्कि मनुष्य को बन्धन से मुक्ति और आत्मस्वरूप की पहचान कराने वाले दिव्य मार्गदर्शक हैं। मुक्तिकोपनिषद् में भगवान् श्रीराम और भक्त हनुमान के पवित्र संवाद के माध्यम से 108 उपनिषदों का वेदानुसार वर्गीकरण तथा मोक्षमार्ग का उपदेश प्राप्त होता है।

इसी दार्शनिक सत्य को सरल, भक्तिपूर्ण और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने हेतु यहश्री उपनिषद् चालीसारची गई है। इसमें यह भाव निहित है कि उपनिषदों का श्रवण, मनन और नित्य चिन्तन आत्मज्ञान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यदि कोई साधक सम्पूर्ण उपनिषदों का अध्ययन कर सके, तो दश प्रमुख उपनिषदों का अध्ययन करे; यदि वह भी कठिन हो, तो माण्डूक्योपनिषद् का आश्रय ले; और यदि वह भी सम्भव हो, तो श्रीराम-नाम का जप ही परम कल्याणकारी है।

श्री उपनिषद् चालीसा

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार।
उपनिषद् सार कहौं सदा, रामकृपा आधार॥

हनुमत पूछे कर जुड़ि, प्रभु मोक्ष उपाय बताइये।
कौन साधन से जीव यह, भवसागर तर जाइये॥

 

चौपाई

राम कृपालु वचन तब बोले, सुनो मारुति ध्यान लगाय।
उपनिषद् वेदों का सार है, आत्मज्ञान बताय॥

ऋग्वेदादि से उपजे ज्ञान, ऐतरेय कौषीतकि नाम।
नादबिन्दु आत्मप्रबोध कहें, ब्रह्मस्वरूप अभिराम॥

ईश बृहदारण्यक दीपक, जाबालादि प्रकाश।
हंस परमहंस सुबाल कहें, ज्ञान अमृत निवास॥

कठ तैत्तिरीय कैवल्य गान, श्वेताश्वतर विचार।
योगतत्त्व ब्रह्मविद्या संग, हरें अज्ञान अंधकार॥

केन छान्दोग्य अरुणि ज्ञान, योगचूडामणि सार।
मैत्रायणी वज्रसूचिका कहें, तत्त्व विवेक अपार॥

मुण्डक प्रश्न माण्डूक्य ज्ञान, तुरीय तत्त्व महान।
रामतापिनी गोपाल कहें, आत्मा ब्रह्म समान॥

अष्टोत्तरशत उपनिषद् ये, वेदों का विस्तार।
जो श्रद्धा से इन्हें पढ़े, पावे ब्रह्म साकार॥

 

दोहा

दश उपनिषद् जो पढ़ सके, करे नाम विचार।
ईशादि माण्डूक्य संग, मोक्ष का आधार॥

जो यह भी कर सके साधक, हो मन दुर्बल जान।
माण्डूक्य एकहि पढ़ ले, मिटे भव का भान॥

 

चौपाई

और यदि यह भी हो सके, हो साधन से दूर।
राम नाम जप कर ले, मिट जाए सब धूर॥

राम राम रटता रहे, मन हो निर्मल धाम।
नाम और नामी अभिन्न हैं, यही वेदान्त प्रमाण॥

जो मुझमें मन लगाकर जपे, तजे माया विकार।
वही जीव पावे मुझको, होवे भव से पार॥

रामचन्द्र कृपालु कहें, सुन हनुमत बलवान।
उपनिषद् और राम नाम में, एक ही ब्रह्मज्ञान॥

जो यह चालीसा प्रेम से, जपे सुने दिन-रात।
मुकेश ईश्वर के दास यह, कहे मिले शुभ साथ॥

मुकेश ईश्वर के दास कृत यह चालीसा, जप-श्रवण से इसका जो करे, उसका निश्चय ही कल्याण होवे॥

 

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