त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् : एक शोधनिष्ठ अध्ययन
यह उपनिषद् विशेष रूप से ऋग्वेद
के पुरुषसूक्त में प्रतिपादित “त्रिपादस्यामृतं
दिवि” सिद्धान्त को आधार बनाकर
यह प्रतिपादित करता है कि
सम्पूर्ण दृश्य जगत् भगवान् की
केवल एक विभूति है,
जबकि उनका वास्तविक स्वरूप
उससे कहीं अधिक व्यापक,
अनन्त तथा दिव्य है।
इस प्रकार यह उपनिषद् ब्रह्माण्ड,
जीव, ईश्वर और मोक्ष के
सम्बन्ध में वैष्णव वेदान्त
का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक
दस्तावेज प्रस्तुत करता है।
उपनिषद्
का परिचय
|
विषय |
विवरण |
|
नाम |
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् |
|
वर्ग |
वैष्णव
उपनिषद् |
|
सम्बद्ध
वेद |
सामान्यतः
कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध माना
जाता है |
|
प्रमुख
देवता |
भगवान्
नारायण |
|
विषय |
ब्रह्मविद्या,
नारायण-तत्त्व, सृष्टिविज्ञान, मोक्ष |
|
उपनिषद्
संख्या |
मुक्तिकोपनिषद्
की 108 उपनिषद् सूची में सम्मिलित |
इस उपनिषद् का उद्देश्य केवल
ईश्वर-स्तुति नहीं है, बल्कि
नारायण को ही परब्रह्म
सिद्ध करते हुए उनकी
विभूतियों और उनके परमधाम
का दार्शनिक विवेचन करना है।
नाम
का अर्थ एवं दार्शनिक संकेत
1. त्रिपाद
‘त्रिपाद’
का अर्थ है – तीन
चरण अथवा तीन भाग।
पुरुषसूक्त
में कहा गया है
– पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।
अर्थात्
सम्पूर्ण दृश्य जगत् भगवान् का
केवल एक पाद (चतुर्थांश)
है, जबकि उनके तीन
पाद अमृतस्वरूप दिव्य क्षेत्र में स्थित हैं।
2. विभूति
विभूति
का अर्थ है – ऐश्वर्य,
शक्ति, वैभव या अभिव्यक्ति।
3. महानारायण
महानारायण
वह परम पुरुष हैं
जो समस्त कारणों के कारण, समस्त
देवताओं के आधार और
समस्त जगत् के अधिष्ठाता
हैं।
इस प्रकार “त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद्” का तात्पर्य है
–
“उस
महान् नारायण का उपनिषद् जिसमें उनकी त्रिपाद दिव्य विभूति का वर्णन किया गया है।”
उपनिषद्
का मुख्य प्रतिपाद्य
इस उपनिषद् का मूल सिद्धान्त
है – नारायण ही परब्रह्म हैं।
उन्हीं
से – सृष्टि उत्पन्न होती है, उन्हीं
में स्थित रहती है, उन्हीं
में लीन हो जाती
है।
यह विचार उपनिषद् के अनेक स्थलों
पर प्रतिपादित हुआ है।
नारायण
: परब्रह्म का स्वरूप
उपनिषद्
के अनुसार नारायण – अजन्मा हैं, अविनाशी हैं,
सर्वव्यापक हैं, सर्वकारण हैं,
सर्वाधार हैं।
वे केवल विष्णु के
किसी सीमित पौराणिक रूप का नाम
नहीं हैं, बल्कि वे
ही परब्रह्म हैं।
उपनिषद्
कहता है कि –ब्रह्मा
उन्हीं से उत्पन्न होते
हैं, रुद्र उन्हीं से प्रकट होते
हैं, इन्द्र उन्हीं से शक्ति प्राप्त
करते हैं, समस्त लोक
उन्हीं में स्थित हैं।
इस प्रकार यहाँ नारायण को
सम्पूर्ण देवमण्डल के आधारभूत तत्त्व
के रूप में प्रस्तुत
किया गया है।
त्रिपाद-विभूति का सिद्धान्त
यह उपनिषद् का सर्वाधिक महत्वपूर्ण
दार्शनिक विषय है।
पुरुषसूक्त
के अनुसार – पादोऽस्य विश्वा भूतानि। संपूर्ण दृश्य ब्रह्माण्ड भगवान् का केवल एक
पाद है।
एक-पाद विभूति
इसमें
सम्मिलित हैं – चौदह लोक, ब्रह्माण्ड,
देवगण, जीवसमुदाय, प्रकृति, काल, कर्म। यह
सम्पूर्ण क्षेत्र परिवर्तनशील है।
त्रिपाद
विभूति -इसके विपरीत भगवान्
का तीन-चौथाई स्वरूप
–
- नित्य है, अविनाशी है, दिव्य है, मायातीत है। यही वैकुण्ठ अथवा परमधाम है।
इस सिद्धान्त का उद्देश्य यह
बताना है कि दृश्य
जगत् ही सम्पूर्ण सत्य
नहीं है; उससे परे
एक अनन्त आध्यात्मिक सत्ता विद्यमान है।
सृष्टि-विज्ञान
उपनिषद्
के अनुसार सृष्टि का क्रम निम्न
प्रकार है –
- परम नारायण ,महत्तत्त्व ,अहंकार ,तन्मात्राएँ ,पंचमहाभूत ,स्थूल जगत्
यह वर्णन सांख्य दर्शन से प्रभावित प्रतीत
होता है, किन्तु यहाँ
प्रकृति स्वतन्त्र नहीं है; वह
नारायण की शक्ति है।
इस प्रकार उपनिषद् सांख्य और वेदान्त का
समन्वय प्रस्तुत करता है।
जीव
और ईश्वर का सम्बन्ध
उपनिषद्
के अनुसार जीव – चेतन है, शाश्वत
है,ज्ञानस्वरूप है।
किन्तु
अज्ञान के कारण वह
अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता
है।
जीव
का अस्तित्व ईश्वर पर आश्रित है।
जिस प्रकार –सूर्य से किरणें, समुद्र
से तरंगें,
उत्पन्न
होती हैं, उसी प्रकार
जीव परमात्मा पर आश्रित सत्ता
है।
माया
और बन्धन
जीव
संसार में बन्धन क्यों
अनुभव करता है?
उपनिषद्
इसका उत्तर देता है – अविद्या
के कारण।
जब जीव शरीर, मन
और इन्द्रियों को अपना स्वरूप
मान लेता है तब
–जन्म, मृत्यु, शोक, मोह, भय
उत्पन्न होते हैं।
यही
संसार-बन्धन है।
मोक्ष
का स्वरूप
उपनिषद्
के अनुसार मोक्ष केवल दुःखों की
निवृत्ति नहीं है।
मोक्ष
है – नारायण की प्राप्ति, परमधाम
की प्राप्ति, आत्मस्वरूप का साक्षात्कार।
मोक्ष
की अवस्था में –पुनर्जन्म नहीं
होता, कर्मबन्धन समाप्त हो जाता है,
जीव दिव्य आनन्द का अनुभव करता
है।
उपासना
और साधना
उपनिषद्
ज्ञान तथा भक्ति दोनों
का समन्वय करता है।
साधना
के प्रमुख अंग हैं –
1. नारायण-ध्यान- साधक को निरन्तर
भगवान् का स्मरण करना
चाहिए।
2. प्रणवोपासना
-“ॐ” को नारायण का
प्रतीक माना गया है।
3. मन्त्र-जप -नारायण सम्बन्धी मन्त्रों का जप मोक्षदायक
कहा गया है।
4. आत्मचिन्तन
-जीव को अपने वास्तविक
स्वरूप का अनुसन्धान करना
चाहिए।
वैष्णव
वेदान्त पर प्रभाव
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् के सिद्धान्तों का
प्रभाव बाद के वैष्णव
सम्प्रदायों पर स्पष्ट रूप
से दिखाई देता है।
विशेषतः
–
- रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत,
- मध्वाचार्य के द्वैत,
- निम्बार्काचार्य के सिद्धान्तों में
नारायण
की सर्वोच्चता तथा दिव्य धाम
की अवधारणा इसी प्रकार विकसित
रूप में दिखाई देती
है।
उपनिषद्
की दार्शनिक विशेषताएँ
1. ब्रह्म
और भगवान् का समन्वय -निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान्
के बीच विरोध नहीं
माना गया है।
2. पुरुषसूक्त
का विस्तार -त्रिपाद सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन
प्रस्तुत किया गया है।
3. वैष्णव
अद्वैत की प्रवृत्ति -नारायण को ही ब्रह्म
मानकर समस्त अस्तित्व का आधार सिद्ध
किया गया है।
4. भक्ति
और ज्ञान का समन्वय -यह उपनिषद् केवल
ज्ञानमार्ग या केवल भक्तिमार्ग
का समर्थन नहीं करता, बल्कि
दोनों का समन्वय करता
है।
अन्य
उपनिषदों से तुलना
|
उपनिषद् |
प्रमुख
विषय |
|
ईशावास्योपनिषद् |
सर्वात्मभाव |
|
केनोपनिषद् |
ब्रह्म
की अगम्यता |
|
कठोपनिषद् |
आत्मा
और मृत्यु |
|
माण्डूक्योपनिषद् |
ओंकार
और तुरीय |
|
महानारायणोपनिषद् |
नारायण-तत्त्व |
|
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् |
नारायण
की दिव्य त्रिपाद विभूति |
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् वैष्णव वेदान्त का एक महत्त्वपूर्ण
दार्शनिक ग्रन्थ है। इसका मूल
संदेश यह है कि
यह दृश्य जगत् परम सत्य
का केवल एक अंश
है; वास्तविक सत्य उस दिव्य,
अमृतमय और अनन्त त्रिपाद-विभूति में निहित है
जो परम नारायण का
स्वरूप है। उपनिषद् जीव
को जगत् की सीमाओं
से ऊपर उठकर उस
परात्पर सत्ता की ओर उन्मुख
होने का आह्वान करता
है।
ज्ञान,
भक्ति, ध्यान तथा आत्मसाक्षात्कार के
माध्यम से साधक उस
परम नारायण को प्राप्त कर
सकता है जो समस्त
सृष्टि के मूल, आधार
और अन्तिम लक्ष्य हैं। इसी कारण
यह उपनिषद् केवल वैष्णव साधना
का ग्रन्थ नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या का एक उत्कृष्ट
दार्शनिक स्रोत भी है।
शोध-दृष्टि से निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् पुरुषसूक्तीय ब्रह्माण्ड-विज्ञान, वैष्णव ईश्वरवाद और उपनिषद्-प्रदत्त ब्रह्मविद्या का एक अद्वितीय समन्वित ग्रन्थ है, जो भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन की समृद्ध परम्परा में विशेष स्थान रखता है।
त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद् के संबंध में विभिन्न संस्करण (recensions) उपलब्ध हैं, इसलिए अध्यायों और मंत्रों की संख्या सभी संस्करणों में समान नहीं मिलती।
सबसे प्रामाणिक परम्परा के अनुसार यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है और इसके दो मुख्य खण्ड (पूर्वखण्ड और उत्तरखण्ड) माने जाते हैं। प्रत्येक खण्ड में चार-चार अध्याय हैं, अर्थात् कुल 8 अध्याय हैं।
संरचना
| खण्ड | अध्याय |
|---|---|
| पूर्वखण्ड | 4 अध्याय |
| उत्तरखण्ड | 4 अध्याय |
| कुल | 8 अध्याय |
मंत्र / श्लोक संख्या
इस उपनिषद् के विभिन्न मुद्रित संस्करणों में मंत्र-संख्या में कुछ भिन्नता मिलती है। गीता प्रेस के उपनिषद्-अंक तथा कई पारम्परिक संस्करणों में इसे अपेक्षाकृत लघु उपनिषद् माना गया है और इसमें लगभग 140–150 के आसपास मंत्र/श्लोक प्राप्त होते हैं। विभिन्न सम्पादनों में यह संख्या कुछ आगे-पीछे हो सकती है।
एक अन्य परम्परा में इसे महानारायणोपनिषद् के अथर्ववैदिक (Tripadvibhuti-prefixed) रूप से भी जोड़ा जाता है, जहाँ अध्याय-विभाजन भिन्न मिलता है।
विषयवस्तु के अनुसार 8 अध्यायों का संक्षिप्त स्वरूप
- नारायण परब्रह्म का निरूपण
- सृष्टि की उत्पत्ति
- ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र आदि की नारायण से उत्पत्ति
- प्रणव (ॐ) और अष्टाक्षरी मन्त्र का माहात्म्य
- त्रिपाद-विभूति का वर्णन
- वैकुण्ठ और परमधाम का स्वरूप
- जीव, माया और मोक्ष
- नारायण-सायुज्य एवं उपसंहार
Mukesh
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