“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
घर लौटना
उम्र के एक पड़ाव पर
सफ़र ख़त्म नहीं होते,
बस बदल जाते हैं।
फिर आदमी
दुनिया देखने नहीं,
अपने भीतर लौटने निकलता है।
— मुकेश
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