बरामदे अब नहीं होते...
आज के घरों में सब कुछ है—
लिफ़्ट है, इंटरकॉम है, वीडियो डोरफ़ोन है, पार्किंग है, सुरक्षा है...
बस बरामदे नहीं हैं।
और शायद इसी कारण घरों से कुछ बहुत ज़रूरी चीज़ भी चली गई है।
बरामदे होते तो इंतज़ार के लिए जगह होती।
किसी अपने के आने की राह देखते हुए घंटों बैठा जा सकता था।
बरामदे होते तो उन लोगों की भी बैठक होती जिन्हें घर के भीतर नहीं ले जाया जाता था, लेकिन जिनसे अपनापन था—दूधवाला, माली, पड़ोसी, राहगीर या कोई पुराना परिचित।
बरामदे होते तो सर्दियों की धूप सेंकी जाती, बरसात देखी जाती और शाम की हवा से बातें की जातीं।
बरामदे होते तो सड़क से गुज़रते लोगों से सलाम-दुआ हो जाती।
किसी के घर का हाल पूछने के लिए मोबाइल नहीं, बस नज़र भर काफ़ी होती।
बरामदे होते तो साइकिल और मोटरसाइकिल घर की निगरानी में खड़ी रहतीं।
वह सुकून बहुमंज़िला इमारतों की पार्किंग में कहाँ!
बरामदे होते तो सब्ज़ी वाले को आवाज़ देकर बुलाया जाता, वहीं बैठकर मोलभाव होता और दो बातें भी।
अब सामान तो घर आ जाता है,
पर बातचीत नहीं आती।
बरामदे होते तो बच्चे वहीं खेलते, झूला झूलते, हँसते-भागते।
माएँ निश्चिंत रहतीं और सहेलियों की महफ़िलें अपने आप सज जातीं।
सच कहूँ तो
बरामदा घर का हिस्सा कम, जीवन का हिस्सा ज़्यादा था।
वह घर और दुनिया के बीच की वह जगह थी
जहाँ रिश्ते साँस लेते थे।
आज घर बड़े हो गए हैं,
लेकिन शायद जीवन थोड़ा छोटा हो गया है।
कभी-कभी लगता है,
हमें नए घर नहीं चाहिए,
हमें अपने पुराने बरामदे वापस चाहिए।
मुकेश ,,,,,,,,,
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