“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
शोर बढ़ता जाता है
और मौन डरने लगता है
मगर मौन के भीतर ही अक्सर वे कहानियाँ रहती हैं जिन्हें सुना नहीं जाता
क्योंकि सुनने के लिए सहमति नहीं धैर्य चाहिए होता है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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