“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
जब सवाल उठते हैं
और उत्तर थक जाते हैं तब शब्दों को भी नई नौकरी मिल जाती है
वे नारे बन जाते हैं और नारे भीड़ की तरह चलते हैं बिना यह पूछे कि जा कहाँ रहे हैं
मुकेश ,,,,,,,,,,
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