तत्त्वमसि” महावाक्य का दार्शनिक स्वरूप
प्रथम
षट्क (अध्याय 1–6) : “त्वम्” पद का विस्तार
जीव
की समस्या से आत्मा की खोज तक
गीता
का प्रारम्भ ईश्वर से नहीं, जीव
से होता है। यह
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथ्य है।
प्रथम
अध्याय में अर्जुन विषादग्रस्त
है। वह मोह, शोक,
करुणा, भ्रम और कर्तव्य-विमूढ़ता से आक्रान्त है।
यह केवल अर्जुन की
अवस्था नहीं, अपितु समस्त मानवता की आध्यात्मिक स्थिति
का प्रतीक है।
इस प्रकार गीता का प्रथम
प्रश्न है—
“मैं
कौन हूँ?”
द्वितीय
अध्याय में भगवान् शरीर
और आत्मा का विवेक प्रस्तुत
करते हैं—
न जायते म्रियते वा कदाचित्।
यहाँ
जीव का वास्तविक स्वरूप
उद्घाटित होता है। मनुष्य
शरीर नहीं, आत्मा है।
तृतीय
अध्याय कर्मयोग द्वारा जीव की शुद्धि
का मार्ग बताता है।
चतुर्थ
अध्याय ज्ञानयोग द्वारा जीव को उसके
दिव्य मूल से परिचित
कराता है।
पंचम
अध्याय कर्म और संन्यास
के समन्वय से अन्तःकरण-शुद्धि
का विवेचन करता है।
षष्ठ
अध्याय ध्यानयोग द्वारा आत्म-साक्षात्कार का
उपाय बताता है।
इस सम्पूर्ण षट्क का केन्द्रबिन्दु
है—
अतः
प्रथम षट्क महावाक्य के
“त्वम्” पद का विस्तृत
भाष्य है।
“त्वम्”
का मनोवैज्ञानिक आयाम
प्रथम
षट्क में जीव को
तीन स्तरों पर समझाया गया
है—
- देहाभिमानी जीव
- साधक जीव
- आत्मस्वरूप जीव
अर्जुन
पहले स्तर का प्रतिनिधित्व
करता है।
कर्मयोग
दूसरे स्तर का।
ध्यानयोग
तीसरे स्तर का।
इस प्रकार प्रथम षट्क जीव की
आध्यात्मिक उत्क्रान्ति का विज्ञान प्रस्तुत
करता है।
द्वितीय
षट्क (अध्याय 7–12) : “तत्” पद का विस्तार
ब्रह्म
का विश्वात्मक स्वरूप
जब साधक अपने विषय
में कुछ जान लेता
है, तब अगला प्रश्न
उठता है—
“जिसकी
प्राप्ति करनी है, वह
परम सत्य क्या है?”
यहीं
से गीता का द्वितीय
षट्क प्रारम्भ होता है।
सप्तम
अध्याय में भगवान् अपनी
परा और अपरा प्रकृति
का विवेचन करते हैं।
अष्टम
अध्याय अक्षरब्रह्म की चर्चा करता
है।
नवम
अध्याय में भगवान् स्वयं
को सम्पूर्ण जगत् का आधार
बताते हैं—
मया
ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
दशम
अध्याय में विभूतियों का
वर्णन है।
एकादश
अध्याय में विश्वरूप का
दर्शन है।
द्वादश
अध्याय में उसी परम
सत्ता की भक्ति का
मार्ग है।
इस प्रकार द्वितीय षट्क का प्रश्न
है—
यह सम्पूर्ण भाग महावाक्य के
“तत्” पद का विस्तार
है।
“तत्”
का विश्वरूप
इस षट्क में ईश्वर
तीन रूपों में प्रकट होता
है—
1. निर्गुण
ब्रह्म
अक्षर,
अव्यक्त, अनादि।
2. सगुण
ईश्वर
भक्तों
का रक्षक, जगत् का नियन्ता।
3. विश्वरूप
समस्त
सृष्टि में व्याप्त विराट्
सत्ता।
इस प्रकार “तत्” केवल दार्शनिक
अवधारणा नहीं रह जाता,
बल्कि अनुभूत सत्य बन जाता
है।
तृतीय
षट्क (अध्याय 13–18) : “असि” पद का विस्तार
जीव
और ब्रह्म का सम्बन्ध
अब तक साधक स्वयं
को जान चुका है
(त्वम्) और परमात्मा को
भी जान चुका है
(तत्)।
अब अंतिम प्रश्न उठता है—
“दोनों
का सम्बन्ध क्या है?”
यहीं
से तृतीय षट्क प्रारम्भ होता
है।
तेरहवें
अध्याय में क्षेत्र और
क्षेत्रज्ञ का विवेक प्रस्तुत
है।
चतुर्दश
अध्याय त्रिगुणात्मक प्रकृति की विवेचना करता
है।
पन्द्रहवाँ
अध्याय जीव, जगत् और
पुरुषोत्तम के सम्बन्ध को
स्पष्ट करता है।
षोडश
अध्याय दैवी और आसुरी
सम्पत्तियों का विश्लेषण करता
है।
सप्तदश
अध्याय श्रद्धा की प्रकृति को
समझाता है।
अष्टादश
अध्याय सम्पूर्ण गीता का समन्वित
उपसंहार है।
“असि”
का रहस्य
“असि”
केवल व्याकरण का पद नहीं
है।
यह साधना का चरम बिन्दु
है।
जब जीव अपने सीमित
अहंकार को पार करता
है और परम सत्य
का अनुभव करता है, तब
“तत्त्वमसि” प्रत्यक्ष अनुभूति बन जाता है।
अद्वैत
इसे अभेद कहता है।
विशिष्टाद्वैत
इसे शरीर-शरीरी सम्बन्ध
कहता है।
द्वैत
इसे अनन्त आश्रितता कहता है।
किन्तु
तीनों ही मानते हैं
कि जीव का परम
लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है।
इस प्रकार तृतीय षट्क “असि” पद का
विस्तृत विवेचन है।
त्रिषट्क
और साधना की क्रमिक यात्रा
यदि
तीनों षट्कों को साधना की
दृष्टि से देखें तो
एक अद्भुत क्रम दिखाई देता
है—
|
षट्क |
महावाक्य-पद |
विषय |
|
1–6 |
त्वम् |
जीव
का स्वरूप |
|
7–12 |
तत् |
ब्रह्म
का स्वरूप |
|
13–18 |
असि |
जीव-ब्रह्म सम्बन्ध |
अर्थात्—
आत्मज्ञान
→ ब्रह्मज्ञान →
ब्रह्मसाक्षात्कार
यही
सम्पूर्ण गीता की आध्यात्मिक
संरचना है।
आलोचनात्मक
समीक्षा
यद्यपि
गीता में कहीं प्रत्यक्ष
रूप से यह नहीं
कहा गया कि उसके
अठारह अध्याय “तत्त्वमसि” महावाक्य के अनुसार विभाजित
हैं, तथापि विषयगत विश्लेषण से यह संरचना
अत्यन्त स्वाभाविक प्रतीत होती है।
प्रत्येक
अध्याय में जीव, ईश्वर
और साधना तीनों उपस्थित हैं, फिर भी
प्रमुख प्रवाह स्पष्ट है—
- प्रथम षट्क — आत्म-खोज
- द्वितीय षट्क — ईश्वर-खोज
- तृतीय षट्क — परम-एकत्व अथवा परम-सम्बन्ध
अतः
यह विभाजन केवल सम्प्रदायगत कल्पना
नहीं, बल्कि गीता की अन्तर्निहित
दार्शनिक रचना का संकेत
माना जा सकता है।
भगवद्गीता
के अठारह अध्यायों का त्रिषट्क-विभाजन
उपनिषदों के महावाक्य “तत्त्वमसि”
का क्रमिक विस्तार प्रतीत होता है। प्रथम
षट्क जीव के स्वरूप
का अनुसन्धान कर “त्वम्” का
विवेचन करता है; द्वितीय
षट्क परमात्मा के स्वरूप का
उद्घाटन कर “तत्” को
स्पष्ट करता है; और
तृतीय षट्क जीव तथा
ब्रह्म के सम्बन्ध का
प्रतिपादन कर “असि” का
रहस्य उद्घाटित करता है। इस
प्रकार सम्पूर्ण भगवद्गीता एक महावाक्यात्मक यात्रा
बन जाती है, जिसमें
अर्जुन का विषाद अन्ततः
ब्रह्मविद्या और मोक्ष में
परिणत होता है।
यह दृष्टिकोण केवल गीता की
अध्याय-रचना को समझने
का साधन नहीं, बल्कि
सम्पूर्ण वेदान्त-दर्शन को एक सूत्र
में बाँधने वाला व्याख्यात्मक प्रतिमान
भी है। इसी कारण
“तत्त्वमसि” के आलोक में
गीता का अध्ययन भारतीय
दार्शनिक परम्परा की सबसे गम्भीर
और सार्थक व्याख्याओं में गिना जाता
है।
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