गर्भोपनिषद् और वर्तमान विज्ञान : एक तुलनात्मक अध्ययन
गर्भोपनिषद्
भारतीय उपनिषद्-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थ है, जिसमें गर्भोत्पत्ति,
भ्रूण-विकास, शरीर-रचना, जीवात्मा
के प्रवेश तथा जन्म की
प्रक्रिया का वर्णन मिलता
है। आधुनिक विज्ञान, विशेषकर भ्रूण-विज्ञान (Embryology), भी गर्भस्थ शिशु
के विकास का अध्ययन करता
है। आश्चर्य की बात है
कि गर्भोपनिषद् के अनेक वर्णन
आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों से कुछ सीमा
तक साम्य रखते हैं, यद्यपि
दोनों का दृष्टिकोण भिन्न
है।
गर्भोपनिषद्
का कथन
गर्भोपनिषद्
के अनुसार—
- प्रथम रात्रि में गर्भ द्रवरूप होता है।
- सात दिनों में बुलबुले (कलल) जैसा बनता है।
- पन्द्रह दिनों में पिण्डाकार होता है।
- एक मास में कठोरता आती है।
- दूसरे मास में मस्तक का निर्माण होता है।
- तीसरे मास में हाथ-पैर बनते हैं।
- चौथे मास में अंग-प्रत्यंग स्पष्ट होते हैं।
- पाँचवें मास में चेतना विकसित होती है।
- छठे मास में बुद्धि का विकास आरम्भ होता है।
- सातवें मास में जीव अधिक सचेत होता है।
- नवें मास में जन्म होता है।
आधुनिक
विज्ञान क्या कहता है?
आधुनिक
भ्रूण-विज्ञान के अनुसार—
प्रथम
सप्ताह
निषेचन
(Fertilization) के बाद शुक्राणु और
डिम्बाणु मिलकर युग्मनज (Zygote) बनाते हैं। यह लगातार
विभाजित होकर कोशिकाओं का
समूह बनता है।
यह स्थिति गर्भोपनिषद् के "द्रवरूप" और "बुलबुले" जैसे वर्णन से
कुछ हद तक मेल
खाती प्रतीत होती है।
द्वितीय
से चतुर्थ सप्ताह
भ्रूण
गर्भाशय में स्थापित हो
जाता है। शरीर की
मूल संरचनाएँ बनने लगती हैं।
गर्भोपनिषद्
का "पिण्डाकार" वर्णन इस अवस्था से
कुछ साम्य रखता है।
द्वितीय
मास
विज्ञान
के अनुसार 5–8 सप्ताह के बीच सिर,
मस्तिष्क, आँखें और हृदय का
तीव्र विकास होता है।
गर्भोपनिषद्
भी दूसरे मास में मस्तक
के निर्माण की बात करता
है।
तृतीय
मास
हाथ,
पैर, उँगलियाँ और अन्य अंग
स्पष्ट होने लगते हैं।
यह गर्भोपनिषद् के तृतीय मास
वाले वर्णन से लगभग मेल
खाता है।
चतुर्थ
मास
शिशु
का शरीर अधिक स्पष्ट
और संतुलित हो जाता है।
यह भी उपनिषद् के
विवरण से साम्य रखता
है।
पंचम
से सप्तम मास
आधुनिक
विज्ञान के अनुसार इस
अवधि में—
- तंत्रिका तंत्र विकसित होता है।
- शिशु ध्वनियों पर प्रतिक्रिया देने लगता है।
- गति करने लगता है।
- नींद-जागरण के चक्र बनने लगते हैं।
गर्भोपनिषद्
इसे "चेतना" और "बुद्धि" के विकास के
रूप में व्यक्त करता
है।
अष्टम
और नवम मास
फेफड़े,
मस्तिष्क और अन्य अंग
पूर्णता की ओर बढ़ते
हैं तथा शिशु जन्म
के लिए तैयार होता
है।
यह भी उपनिषद् के
कथन से मेल खाता
है।
जहाँ
साम्य दिखाई देता है
गर्भोपनिषद्
और आधुनिक विज्ञान दोनों मानते हैं कि—
- गर्भस्थ विकास क्रमिक (Gradual) है।
- सिर का विकास प्रारम्भिक चरणों में होता है।
- हाथ-पैर बाद में विकसित होते हैं।
- मध्य महीनों में तंत्रिका-तंत्र का तीव्र विकास होता है।
- अन्तिम महीनों में जन्म की तैयारी होती है।
इस दृष्टि से गर्भोपनिषद् का
वर्णन प्राचीन भारत की सूक्ष्म
निरीक्षण-परम्परा का परिचायक माना
जा सकता है।
जहाँ
भिन्नता है
सबसे
बड़ा अन्तर चेतना और आत्मा के विषय में
है।
गर्भोपनिषद्
कहता
है कि—
- जीवात्मा गर्भ में प्रवेश करती है।
- वह पूर्वजन्मों को स्मरण करती है।
- सातवें महीने में ईश्वर से प्रार्थना करती है।
- जन्म के समय माया के कारण सब भूल जाती है।
आधुनिक
विज्ञान
वर्तमान
विज्ञान—
- आत्मा के अस्तित्व को न सिद्ध करता है, न असिद्ध।
- पूर्वजन्म-स्मृति को वैज्ञानिक तथ्य नहीं मानता।
- चेतना को मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र की क्रियाओं से जोड़कर देखता है।
अर्थात्
विज्ञान केवल उन बातों
पर चर्चा करता है जिन्हें
प्रयोग और परीक्षण द्वारा
सिद्ध किया जा सके।
गर्भसंस्कार
पर विज्ञान का दृष्टिकोण
गर्भोपनिषद्
और अन्य भारतीय ग्रन्थ
गर्भवती माता के— आहार,विचार,व्यवहार, संगीत, मन्त्र, आध्यात्मिक तावरण
पर बल देते हैं।
आधुनिक
शोध भी बताती है
कि— मातृ तनाव (Maternal Stress) ,पोषण ,हार्मोन
,ध्वनियाँ ,भावनात्मक वातावरण
गर्भस्थ
शिशु के विकास को
प्रभावित करते हैं।
हालाँकि
विज्ञान मन्त्रों के आध्यात्मिक प्रभाव
को सिद्ध नहीं करता, लेकिन
शांत संगीत, सकारात्मक वातावरण और मानसिक स्वास्थ्य
के लाभों को स्वीकार करता
है।
गर्भोपनिषद्
का उद्देश्य आधुनिक चिकित्सा-पुस्तक बनना नहीं था।
उसका लक्ष्य गर्भस्थ जीवन को आध्यात्मिक,
दार्शनिक और नैतिक दृष्टि
से समझाना था। फिर भी
भ्रूण-विकास के अनेक चरणों
का उसका वर्णन आश्चर्यजनक
रूप से आधुनिक भ्रूण-विज्ञान के कुछ निष्कर्षों
के निकट दिखाई देता
है।
जहाँ
आधुनिक विज्ञान शरीर, कोशिकाओं और जैविक प्रक्रियाओं
का अध्ययन करता है, वहीं
गर्भोपनिषद् शरीर के साथ-साथ जीवात्मा, कर्म,
चेतना और जन्म के
आध्यात्मिक अर्थ पर विचार
करता है। इस प्रकार
दोनों एक-दूसरे के
विरोधी नहीं, बल्कि मानव-जन्म को
देखने के दो भिन्न
आयाम प्रस्तुत करते हैं—एक
भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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