घर बड़े हो गए, मुलाक़ातें छोटी हो गईं
एक समय था जब घरों में बरामदे होते थे।
बरामदे केवल ईंट, सीमेंट और छत का नाम नहीं थे।
वे घर का धड़कता हुआ दिल थे।
सुबह वहीं अख़बार पढ़ा जाता था।
दोपहर में वहीं चारपाई बिछती थी।
शाम को वहीं पड़ोसियों से हालचाल होता था।
और रात में वहीं बैठकर लोग अपने दुख-सुख बाँट लेते थे।
बरामदे में बैठा आदमी अकेला नहीं होता था।
वह घर में भी होता था और दुनिया में भी।
आज हमारे पास बालकनियाँ हैं,
लेकिन उनमें बरामदे वाली आत्मीयता नहीं है।
हमारे पास पार्किंग है,
लेकिन वहाँ साइकिल पर जमी धूल देखकर उसे पोंछ देने का मन नहीं करता।
हमारे पास मोबाइल हैं,
लेकिन पड़ोसी के दरवाज़े पर जाकर चाय पीने का समय नहीं है।
हमारे पास ऑनलाइन बाज़ार हैं,
लेकिन सब्ज़ी वाले से दो मिनट की बातचीत नहीं है।
हमारे पास सैकड़ों सम्पर्क हैं,
लेकिन मिलने-जुलने वाले लोग कम होते जा रहे हैं।
शायद समस्या यह नहीं कि बरामदे घरों से चले गए।
समस्या यह है कि
बरामदों के साथ-साथ हमारी ज़िंदगी से वह जगह भी चली गई, जहाँ बिना किसी काम के बैठा जा सकता था।
जहाँ बातचीत का कोई उद्देश्य नहीं होता था।
जहाँ रिश्ते बनाए नहीं जाते थे,
अपने आप बन जाते थे।
घर बड़े हो गए हैं।
कमरे बढ़ गए हैं।
सुविधाएँ बढ़ गई हैं।
लेकिन कहीं न कहीं
मुलाक़ातें छोटी हो गई हैं।
और शायद इसी कारण
यादें भी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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