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Monday, 1 June 2026

श्री ईशावास्योपनिषद् चालीसा (संस्कृत शब्द-संयोजन सहित)

 श्री ईशावास्योपनिषद् चालीसा (संस्कृत शब्द-संयोजन सहित)


ईशावास्योपनिषद् यजुर्वेद का अत्यन्त गूढ़ एवं प्रथम उपनिषद् माना जाता है, जिसे मुक्तिकोपनिषद् की परम्परा में अष्टोत्तरशतम् उपनिषदः (108 उपनिषदों) में प्रथम स्थान प्राप्त है। यह उपनिषद् समस्त वेदों एवं उपनिषदों के सार को संक्षेप में प्रकट करता है। इसमें ईश्वर-व्याप्त जगत, त्यागमय जीवन, निष्काम कर्म तथा आत्मज्ञान का उपदेश दिया गया है।

श्री ईशावास्योपनिषद् चालीसा

दोहा

ईशा वास्यमिदं जगत, सब में प्रभु का वास।
त्याग सहित भोगे सदा, मिटे जन्म का त्रास॥

कर्म करो निष्काम हो, चिपको फल आस।
ईश कृपा से जीव यह, पावे मोक्ष निवास॥

चौपाई

ईशावास्य प्रथम उपनिषद्, वेदों का सार महान।
अष्टोत्तरशतम् उपनिषदः में, प्रथम इसका ज्ञान॥

समस्त वेदों का सार यही है, उपनिषद् का मूल।
जो इसे जाने हृदय से, मिटे भव का शूल॥

ईश्वर से यह जगत भरा है, कण-कण उसका धाम।
भेदभाव जो मन में त्यागे, पावे परम विश्राम॥

त्यागपूर्वक भोग करो तुम, करो ममता भार।
जो कुछ मिला है प्रभु इच्छा, यही वेदान्त विचार॥

कर्म करो पर फल चाहो, यही धर्म महान।
निष्काम कर्म से ही मिलता, आत्मा का ज्ञान॥

आत्मा नित्य अमर अविनाशी, देह नश्वर रूप।
अविद्या से बंधा जीव है, ज्ञान से हो अनूप॥

सूर्य अग्नि जल वायु सब में, एक ही तत्त्व समाय।
नाम अनेक पर सत्य एक है, वेद यही बतलाय॥

जो इस ज्ञान को हृदय धरे, मिटे जन्म का रोग।
ईशावास्योपनिषद् से ही, मिले मोक्ष संयोग॥

 दोहा

अष्टोत्तरशतम् उपनिषदः, यह प्रथम विधान।
सब वेदों का सार यही, मोक्ष का प्रमाण॥

जो यह चालीसा प्रेम से, पढ़े सुने दिन-रात।
मुकेश ईश्वर के दास यह, कहे मिले शुभ साथ॥

 

मुकेश ईश्वर के दास कृत यह ईशावास्य चालीसा, जप-श्रवण से इसका जो करे, उसका निश्चय ही कल्याण होवे॥

 

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