“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
आख़िरी बार
जीवन की सबसे गहरी उदासी
किसी के जाने में नहीं होती।
वह उस क्षण में होती है
जब वर्षों बाद याद आता है—
जिस दिन हम हँसकर अलग हुए थे,
वही हमारी
आख़िरी मुलाक़ात थी।
— मुकेश
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