“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
एक दिन आख़िरी बार
एक दिन हम किसी से आख़िरी बार मिले थे।
न कोई संकेत था, न कोई विदाई।
वह दिन बाक़ी दिनों जैसा ही था।
बहुत बाद में समझ आया—
कुछ लोग जाते नहीं,
वे बस
एक दिन
लौटना बंद कर देते हैं।
— मुकेश
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