एक दिन आख़िरी बार हुआ था
एक दिन आख़िरी बार
हम गली में खेले थे।
लेकिन उस दिन हमें पता नहीं था
कि वह आख़िरी बार है।
एक दिन आख़िरी बार
माँ ने स्कूल जाते हुए
पीछे से आवाज़ दी थी।
एक दिन आख़िरी बार
हमने अपने पुराने घर का दरवाज़ा बंद किया था।
एक दिन आख़िरी बार
किसी दोस्त के साथ घंटों बैठे थे।
एक दिन आख़िरी बार
पिता के साथ बाज़ार गए थे।
एक दिन आख़िरी बार
किसी ने हमारा नाम
उस पुराने अपनापे से पुकारा था।
लेकिन जीवन की अजीब बात यह है कि
जब कुछ आख़िरी बार होता है,
तब वह अपने ऊपर
"आख़िरी" लिखा हुआ नहीं लाता।
वह एक साधारण दिन की तरह आता है,
और चुपचाप चला जाता है।
बहुत बाद में,
कई वर्षों बाद,
किसी शाम अचानक याद आता है—
"अरे, वह तो आख़िरी बार था।"
तब समझ में आता है कि
जीवन बड़े घटनाक्रमों से नहीं,
ऐसे ही अनदेखे विदाओं से बना है।
हम हर दिन कुछ न कुछ खो रहे होते हैं,
और हर दिन कुछ न कुछ
हमारी स्मृति बन रहा होता है।
इसलिए शायद
हर मुलाक़ात को थोड़ा ध्यान से जीना चाहिए।
कौन जाने,
जो आज बिल्कुल साधारण लग रहा है,
वही कल
हमारी सबसे कीमती याद बन जाए।
जीवन में सबसे गहरी उदासी अक्सर किसी घटना की नहीं, किसी "आख़िरी बार" की होती है—जिसे हम उस समय पहचान नहीं पाए।
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