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Monday, 8 June 2026

प्रेम और बाजार

 

प्रेम और बाजार

बाज़ार ने कहा

"जो बिक नहीं सकता

उसका कोई मूल्य नहीं।"

फिर उसने

सपने बेचे।

उदासी बेची।

अकेलापन बेचा।

यहाँ तक कि

मुस्कुराहट भी बेच दी।

लेकिन प्रेम

हर बार

दुकान के पिछले दरवाज़े से निकल गया।

वह कभी

माँ के हाथ की रोटी में छिप जाता,

कभी

किसी मज़दूर की जेब में रखे

मुड़े-तुड़े ख़त में।

व्यापारियों ने बहुत खोजा।

मगर प्रेम

मुनाफ़े की भाषा

सीख ही नहीं पाया।

मुकेश ,,,,,,,,

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