“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मरम्मत
मैं घर की मरम्मत करता रहा।
दीवारें रंगीं,
दरवाज़े बदले,
छत ठीक करवाई।
बस एक चीज़
मरम्मत के बाहर रह गई
वे रिश्ते,
जिनमें धीरे-धीरे
बारिश टपकने लगी थी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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