“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
पेन्सिल
बचपन में
पेन्सिल छोटी होती जाती थी
और ज्ञान बढ़ता जाता था।
अब उम्र बढ़ती जाती है,
और लगता है
हम कितना कम जानते हैं।
— मुकेश
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