“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
घड़ी
दीवार पर टँगी घड़ी
सालों से चल रही है।
बदल गए घर,
बदल गए लोग,
बदल गईं आदतें।
पर उसे क्या पता
वह समय नहीं,
हमको गुज़रते देख रही है।
— मुकेश
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