“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
कभी-कभी लगता है
मैंने जीवन को जिया ही नहीं
बस उसके गुजरने की आवाज़ सुनी है
जैसे कोई यात्री खिड़की से बाहर देखता रहे
और दृश्य बदलते रहें
मगर वह कहीं पहुँचे ही नहीं बस चलता ही रहे।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment