वह पुरुष हमेशा किसी और जीवन की तैयारी में रहा
अब जब उसके बारे में सोचता हूँ,
तो मुझे हमेशा उसकी डायरी याद आती है। वह छोटी-सी काली डायरी, जिसे वह हर वर्ष बदल देता था। उसके पहले पन्ने पर हमेशा कुछ योजनाएँ लिखी होती थीं— "इस वर्ष नियमित लेखन।" "इस वर्ष स्वास्थ्य पर ध्यान।" "इस वर्ष अनावश्यक लोगों से दूरी।" "इस वर्ष सचमुच जीवन जीना।" अजीब बात है, कुछ लोग जीवन नहीं जीते, वे जीवन की तैयारी करते रहते हैं। वह उन्हीं लोगों में से था। पहली नज़र में वह अत्यन्त संतुलित और विचारशील व्यक्ति लगता। उसकी बातें सुनकर लगता कि वह स्वयं को बहुत अच्छी तरह समझता है। उसे साहित्य से प्रेम था, संगीत से भी। राजनीति पर भी राय रखता था और दर्शन पर भी। वह देर तक सुन सकता था, लेकिन उससे भी अधिक देर तक बोल सकता था। विशेषकर अपने बारे में। हालाँकि वह ऐसा कभी स्वीकार नहीं करता। उसकी भाषा में एक प्रकार की विनम्रता थी, लेकिन वह विनम्रता कई बार एक बहुत परिष्कृत आत्मकेन्द्रिकता का रूप लगती थी। वह अपने दुखों का वर्णन इस तरह करता था कि सामने वाला प्रभावित हुए बिना न रहे। उसने जीवन में सचमुच संघर्ष किए थे। लेकिन समय के साथ उसने उन संघर्षों को अपनी पहचान बना लिया था। मानो उसके भीतर एक गुप्त भय था कि यदि उसके दुःख उससे छिन गए, तो वह स्वयं कौन रह जाएगा। एक बार उसने मुझसे कहा था— "लोग मुझे समझते नहीं हैं।" यह वाक्य वह अक्सर कहता था। इतनी बार कि धीरे-धीरे मुझे लगने लगा, शायद उसे समझे जाने से अधिक यह विश्वास प्रिय है कि उसे कोई समझ नहीं सकता। क्योंकि कुछ लोग अपनी जटिलता से प्रेम करने लगते हैं। वह भी शायद ऐसा ही था। उसके जीवन में कई स्त्रियाँ आईं। कुछ उससे प्रेम करती थीं। कुछ उसकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित थीं। कुछ उसकी उदासी से। उदासी आकर्षक हो सकती है, विशेषकर तब जब वह अच्छी भाषा में व्यक्त की जाए। लेकिन उसके साथ एक विचित्र समस्या थी। वह प्रेम चाहता था, पर प्रेम की वास्तविकता नहीं। उसे वह क्षण बहुत प्रिय था जब कोई स्त्री पहली बार उसकी ओर झुकती है। जब बातचीत में एक विशेष गर्माहट आ जाती है। जब संदेशों की प्रतीक्षा होने लगती है। जब दोनों को लगता है कि कुछ असाधारण शुरू होने वाला है। लेकिन जैसे ही सम्बन्ध अपने सामान्य मानवीय रूप में आने लगता—दिनचर्या, अपेक्षाएँ, जिम्मेदारियाँ, छोटी शिकायतें—वह बेचैन हो उठता। उसे लगने लगता कि कुछ मर रहा है। वास्तव में कुछ मरता नहीं था। केवल आकर्षण धीरे-धीरे सम्बन्ध में बदल रहा होता था। लेकिन उसे परिवर्तन स्वीकार नहीं था। वह आरम्भ से प्रेम करता था। स्थायित्व से नहीं। एक शाम हम साथ बैठे थे। बारिश हो रही थी। उसने अचानक कहा— "समस्या यह है कि लोग बदल जाते हैं।" मैंने पूछा— "और तुम?" वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर मुस्कुराया। "मैं भी।" लेकिन मुझे लगा, सच इससे थोड़ा अलग था। लोग बदल जाते थे। वह नहीं। कम-से-कम भीतर से नहीं। उसकी उम्र बढ़ती रही, लेकिन उसके भीतर का युवक लगभग वैसा ही बना रहा— थोड़ा आहत, थोड़ा महत्वाकांक्षी, थोड़ा असन्तुष्ट, और बहुत अधिक प्रतीक्षारत। वह हमेशा किसी बड़े क्षण की प्रतीक्षा में रहता। किसी ऐसी सफलता की जो अभी आनी थी। किसी ऐसी पुस्तक की जो अभी लिखी जानी थी। किसी ऐसे प्रेम की जो अभी मिलना था। किसी ऐसे जीवन की जो अभी शुरू होना था। और इसी प्रतीक्षा में उसके जीवन के कई अच्छे वर्ष निकल गए। कई बार मुझे लगता था, वह वर्तमान से लगभग असहज था। वर्तमान उसके लिए कभी पर्याप्त नहीं था। वह या तो अतीत में रहता था या भविष्य में। आज उसके पास जो था, वह उसे साधारण लगता। जो खो गया था, वह अद्भुत लगता। और जो अभी मिला नहीं था, वह लगभग पवित्र। शायद इसी कारण उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की उदासी रहती थी। वह गहरी त्रासदी की उदासी नहीं थी। वह उस व्यक्ति की उदासी थी जो लगातार किसी दूसरे किनारे को देख रहा हो। एक बार बहुत वर्षों बाद मैं उससे मिला। उसके बाल अब सफेद हो चुके थे। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं। लेकिन उसकी मेज़ पर एक नई डायरी रखी थी। मैंने हँसकर पूछा— "इस बार क्या योजनाएँ हैं?" उसने भी हँसते हुए डायरी मेरी ओर बढ़ा दी। पहले पन्ने पर लिखा था— "अब सचमुच जीना है।" मैंने कुछ नहीं कहा। वह भी चुप रहा। खिड़की के बाहर शाम उतर रही थी। काफी देर बाद उसने धीरे से पूछा— "तुम्हें कभी लगता है कि असली जीवन कहीं पीछे छूट गया?" मैंने उसकी ओर देखा। और पहली बार मुझे लगा कि वह जीवन भर असफल नहीं रहा था। उसकी असली त्रासदी कुछ और थी। वह जीवन को हमेशा एक आने वाली घटना समझता रहा। जबकि जीवन हर बार उसके सामने बैठा था— एक मित्र की तरह, एक स्त्री की तरह, एक बरसाती शाम की तरह, एक अधूरी बातचीत की तरह। लेकिन वह उसे पहचान नहीं पाया। क्योंकि वह हमेशा उस अगले अध्याय की प्रतीक्षा में था जिसे वह "वास्तविक जीवन" कहता था। और इस प्रतीक्षा में कई बार पूरी किताब पढ़ी जा चुकी होती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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