वह स्त्री हमेशा घर लौटने की जल्दी में रही
अब जब उसके बारे में सोचता हूँ, तो मुझे हमेशा घड़ी याद आती है।
उसकी कलाई में बँधी हुई वह पतली-सी घड़ी।
बहुत महँगी नहीं थी।
लेकिन वह उसे दिन में न जाने कितनी बार देखती थी।
बात करते हुए।
चाय पीते हुए।
सिनेमा देखते हुए।
यहाँ तक कि छुट्टी के दिनों में भी।
जैसे समय कहीं भागा जा रहा हो और उसे हर हाल में उसके पीछे पहुँचना हो।
पहले-पहल मुझे लगा था कि वह बहुत व्यवस्थित स्त्री है।
कुछ लोग होते हैं जिन्हें समय का मूल्य मालूम होता है।
वह भी वैसी ही लगी।
लेकिन धीरे-धीरे समझ में आया कि बात कुछ और थी।
वह हमेशा कहीं लौटने की जल्दी में रहती थी।
हालाँकि उसके लौटने की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं होती थी।
उसका घर अकेला था।
पति से वर्षों पहले अलगाव हो चुका था।
बच्चे दूसरे शहरों में बस चुके थे।
घर पहुँचकर भी उसे किसी का इंतज़ार नहीं करना होता था।
फिर भी शाम होते-होते उसके भीतर एक बेचैनी जन्म लेने लगती।
जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति उसे बुला रहा हो।
एक बार मैंने पूछा था—
"इतनी जल्दी किस बात की रहती है?"
वह हँसी थी।
"आदत है शायद।"
लेकिन मुझे लगा, यह केवल आदत नहीं थी।
कुछ आदतें दरअसल स्मृतियाँ होती हैं।
बस वे शरीर में बस जाती हैं।
कई वर्षों तक उसने अपना जीवन दूसरों के लिए जिया था।
सुबह बच्चों के टिफिन।
पति की फाइलें।
घर के काम।
रिश्तेदारों की ज़रूरतें।
किसी न किसी को हमेशा उसकी आवश्यकता रहती थी।
धीरे-धीरे उसने स्वयं को उसी आवश्यकता में पहचानना शुरू कर दिया।
फिर एक दिन सब बदल गया।
बच्चे बड़े हो गए।
पति दूर चला गया।
घर वही रहा, लेकिन उसकी ज़रूरत किसी को नहीं रही।
यहीं से उसकी समस्या शुरू हुई।
क्योंकि मनुष्य अनुपयोगी होने की भावना आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता।
वह आज़ाद थी।
लेकिन उस आज़ादी में उसे आनंद नहीं मिलता था।
उसे खालीपन मिलता था।
इसलिए उसने अपने लिए छोटे-छोटे नियम बना लिए।
छह बजे घर पहुँचना है।
रात नौ बजे तक सब काम निपटा लेने हैं।
सुबह ठीक छह बजे उठना है।
मानो जीवन अब भी किसी अदृश्य अनुशासन से बँधा हो।
एक दिन मैं उसके घर गया।
बरसात हो रही थी।
घर बेहद साफ़-सुथरा था।
इतना साफ़ कि थोड़ा उदास लगने लगे।
मेज़ पर दो कप रखे थे।
मैंने पूछा—
"कोई आने वाला है?"
वह कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—
"नहीं।"
उसके बाद उसने दूसरा कप उठाकर वापस अलमारी में रख दिया।
उस क्षण पहली बार मुझे उसके अकेलेपन का आकार दिखाई दिया।
वह उन लोगों में से नहीं थी जो रोते हैं।
न ही उन लोगों में जो शिकायत करते हैं।
उसने अपने दुःख को बहुत व्यवस्थित ढंग से रखा हुआ था।
बिल्कुल उसी घर की तरह।
हर वस्तु अपनी जगह पर।
हर भावना भी।
लेकिन कभी-कभी, बहुत दुर्लभ क्षणों में, वह व्यवस्था टूट जाती थी।
और तब उसके भीतर से एक अजीब वाक्य निकलता—
"तुम्हें नहीं लगता कि आदमी की ज़रूरत ख़त्म हो जाने से बड़ा कोई दुख नहीं होता?"
उसने यह बात एक शाम कही थी।
खिड़की से धूप उतर रही थी।
उसके चेहरे पर कोई नाटकीय उदासी नहीं थी।
बस थकान थी।
बहुत पुरानी थकान।
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं होते।
केवल उनके साथ बैठा जा सकता है।
वर्षों बाद जब मैं उससे आख़िरी बार मिला, तब भी उसकी कलाई में घड़ी थी।
वह अब भी समय देख रही थी।
लेकिन इस बार मुझे लगा, वह समय नहीं देख रही।
वह शायद उस जीवन को देख रही है जो बीत चुका है।
उन दोपहरों को,
जब बच्चे स्कूल से लौटते थे।
उन शामों को,
जब कोई उसके आने की प्रतीक्षा करता था।
उन दिनों को,
जब उसका घर केवल घर नहीं था—
किसी का संसार था।
हमने चाय पी।
कुछ साधारण बातें कीं।
फिर उसने अचानक कहा—
"अजीब है न... पूरी उम्र हम थोड़ा अकेला होने की इच्छा करते हैं।"
मैंने सिर हिलाया।
वह मुस्कुराई।
फिर बोली—
"और जब सचमुच अकेले हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि हम जिस शोर से भाग रहे थे, वही हमारी ज़िन्दगी थी।"
उसकी आँखें खिड़की के बाहर थीं।
शाम धीरे-धीरे उतर रही थी।
और उस क्षण मुझे लगा—
वह स्त्री कभी घर लौटने की जल्दी में नहीं रही थी।
वह दरअसल उस समय में लौटना चाहती थी
जब घर पहुँचने पर
कोई उसका इंतज़ार करता था।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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