“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मैंने कई आँखों को देखा है
जो सिर्फ़ एक बिंदु को देखना सीख चुकी थीं
वे तेज़ थीं सटीक थीं पर उनमें वह चुप्पी नहीं थी जो चारों ओर फैली दुनिया से आती है
जैसे देखने की क्षमता कम होकर सिर्फ़ पकड़ने की क्षमता बन गई हो
मुकेश ,,,,,,,,,,
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