“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
मुझे डर लक्ष्य से नहीं
उस एकाग्रता से लगता है जो देखने की जगह सिर्फ़ चुनना सिखाती है
क्योंकि चुनते-चुनते बहुत कुछ अनदेखा रह जाता है
और जो अनदेखा रह जाता है वही धीरे-धीरे जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न बन जाता है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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