“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
हर समय में कुछ चेहरे होते हैं
जो देश को अपने जैसा दिखाना चाहते हैं
वे नक्शे बदलते नहीं वे अर्थ बदलते हैं
और धीरे-धीरे जो बहुमत होता है वह सच नहीं रहता वह सिर्फ़ गूँज बन जाता है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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