दर्शन भाग–2 : चार्वाक दर्शन के मूल सिद्धांत

 दर्शन भाग–2 : चार्वाक दर्शन के मूल सिद्धांत

प्रत्येक दर्शन का वास्तविक स्वरूप उसके मूल सिद्धांतों में निहित होता है। चार्वाक दर्शन के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ प्रचलित हैं। सामान्यतः इसे केवल भोगवाद, नास्तिकता अथवा वेद-विरोध तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि इसका मूल उद्देश्य ज्ञान के आधार, प्रमाण की विश्वसनीयता तथा अनुभव की सीमा पर विचार करना था।

चार्वाक दर्शन की अधिकांश सामग्री उसके विरोधी दार्शनिकों के ग्रंथों से प्राप्त होती है। अतः इसके प्रत्येक सिद्धांत का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उपलब्ध विवरण मूल चार्वाक साहित्य तथा उसके आलोचकों की व्याख्याओं का सम्मिलित परिणाम है।

इस भाग में चार्वाक दर्शन के प्रमुख सिद्धांतों का क्रमबद्ध परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है। अगले भाग में इन्हीं सिद्धांतों के मूल स्रोतों, सूत्रों और ग्रंथों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।

प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण (प्रत्यक्षप्रमाणवाद)

चार्वाक दर्शन का सबसे प्रसिद्ध और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत हैप्रत्यक्षमेव प्रमाणम्।

अर्थात् प्रत्यक्ष अनुभव ही ज्ञान का वास्तविक प्रमाण है।

मनुष्य अपनी इन्द्रियों द्वारा जिस वस्तु का अनुभव करता है, वही ज्ञान का सबसे विश्वसनीय आधार है। दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, रस और गन्धइन पाँच इन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभव को चार्वाक प्राथमिक सत्य मानता है।

यदि कोई वस्तु प्रत्यक्ष नहीं है, तो उसके अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं है।

इसी सिद्धांत के कारण चार्वाक ने ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, नरक तथा अदृश्य शक्तियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाए।

अनुमान का निषेध

भारतीय दर्शन में न्याय, वेदान्त, सांख्य, बौद्ध और जैन दर्शन अनुमान को महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानते हैं।

चार्वाक इस विषय में सावधानी बरतता है।

उसका तर्क है

धुआँ देखकर आग का अनुमान अनेक बार सही हो सकता है, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक धुआँ आग से ही उत्पन्न हो। अनुमान की सफलता पूर्व अनुभव पर निर्भर करती है; इसलिए वह निश्चित ज्ञान नहीं दे सकता।

कुछ आधुनिक विद्वानों का मत है कि चार्वाक ने व्यावहारिक अनुमान (लौकिक अनुमान) को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया, बल्कि दार्शनिक निष्कर्षों के आधार के रूप में अनुमान का विरोध किया।

यह मत आज भी शोध का विषय है।

शब्द-प्रमाण का निषेध

चार्वाक वेदों सहित किसी भी ग्रंथ को स्वतः प्रमाण नहीं मानता।

उसका मत है कि

  • कोई भी ग्रंथ मनुष्यों द्वारा लिखा गया हो सकता है।
  • किसी कथन की सत्यता केवल इसलिए स्वीकार नहीं की जा सकती कि वह किसी प्रतिष्ठित ग्रंथ में लिखा है।
  • प्रत्येक कथन की परीक्षा अनुभव और तर्क से होनी चाहिए।

इसी कारण चार्वाक वेदों की अपौरुषेयता को स्वीकार नहीं करता।

ईश्वर का निषेध

चार्वाक दर्शन में ईश्वर की आवश्यकता स्वीकार नहीं की जाती।

मुख्य तर्क

  • ईश्वर प्रत्यक्ष नहीं है।
  • उसका अनुभव सार्वभौमिक नहीं है।
  • जगत की व्याख्या भौतिक कारणों से भी सम्भव है।
  • जहाँ प्राकृतिक कारण पर्याप्त हों, वहाँ अलौकिक कारण स्वीकार करना आवश्यक नहीं।

चार्वाक का उद्देश्य ईश्वर का भावनात्मक विरोध नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व के प्रमाण की माँग करना है।

 

आत्मा का निषेध

चार्वाक के अनुसार आत्मा कोई स्वतंत्र, शाश्वत सत्ता नहीं है।

जिसे हम आत्मा कहते हैं, वह वास्तव में चेतन शरीर ही है।

शरीर के नष्ट होने पर चेतना भी समाप्त हो जाती है।

अतः शरीर से पृथक आत्मा का अस्तित्व स्वीकार करने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।

चेतना की उत्पत्ति

चार्वाक दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि चेतना पदार्थ से उत्पन्न होती है।

जैसे

  • अनेक पदार्थों के संयोग से मदिरा में मादकता उत्पन्न होती है,
  • उसी प्रकार पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के विशेष संयोजन से चेतना उत्पन्न होती है।

यह विचार आधुनिक भाषा में उद्भववाद (Emergentism) से कुछ सीमा तक तुलनीय माना जाता है, यद्यपि दोनों पूर्णतः समान नहीं हैं।

चार तत्वों का सिद्धांत

चार्वाक केवल चार महाभूत स्वीकार करता हैपृथ्वी, जल, अग्नि वायु

आकाश को वह स्वतंत्र तत्व नहीं मानता, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता।

सभी भौतिक वस्तुएँ इन्हीं चार तत्वों से निर्मित मानी जाती हैं।

पुनर्जन्म का निषेध

चार्वाक पूछता हैयदि पुनर्जन्म होता है, तो उसका प्रत्यक्ष प्रमाण कहाँ है?

किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजन्म का प्रत्यक्ष स्मरण सामान्यतः नहीं होता।

अतः पुनर्जन्म को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

कर्मफल सिद्धांत का निषेध

चार्वाक के अनुसार कर्म और उसके अदृश्य फल का सिद्धांत प्रत्यक्ष अनुभव से सिद्ध नहीं होता।

मनुष्य अपने कर्मों के तत्काल परिणाम देख सकता है, परन्तु अगले जन्मों में मिलने वाले फल का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इसी कारण अदृश्य कर्मफल की अवधारणा स्वीकार नहीं की जाती।

मोक्ष का निषेध

चार्वाक के अनुसार

जब आत्मा ही पृथक सत्ता नहीं है, तब मोक्ष का प्रश्न भी उत्पन्न नहीं होता।

मृत्यु के बाद शरीर पंचभूतों में विलीन हो जाता है।

अतः जीवन का उद्देश्य किसी अदृश्य लोक की प्राप्ति नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन का यथार्थ अनुभव है।

सुख का सिद्धांत

चार्वाक दर्शन को प्रायः केवल भोगवाद कहा जाता है।

किन्तु यह समझना आवश्यक है कि सुख की खोज मानव स्वभाव का स्वाभाविक भाग है।

चार्वाक के अनुसार

  • वर्तमान जीवन ही उपलब्ध है।
  • इसलिए जीवन को दुःख और निरर्थक तपस्या में नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • मनुष्य को विवेकपूर्वक जीवन का उपभोग करना चाहिए।

यद्यपि "ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" वाली उक्ति प्रसिद्ध है, परन्तु अनेक आधुनिक विद्वान इसके मूल चार्वाक होने पर प्रश्न उठाते हैं।

 

धर्म और यज्ञ की समीक्षा

चार्वाक ने वैदिक यज्ञों, कर्मकाण्डों और पुरोहितवाद की आलोचना की।

उसका तर्क था कि

यदि यज्ञ से स्वर्ग प्राप्त होता है, तो उसका प्रत्यक्ष प्रमाण कहाँ है?

यदि बलि दिया गया पशु स्वर्ग जाता है, तो मनुष्य अपने प्रियजनों की बलि क्यों नहीं देता?

इस प्रकार चार्वाक ने धार्मिक कर्मकाण्डों की तार्किक समीक्षा की।

जीवन-दृष्टि

चार्वाक के अनुसार

  • यह जीवन वास्तविक है।
  • वर्तमान ही अनुभव का क्षेत्र है।
  • मनुष्य को भय और अन्धविश्वास से मुक्त होकर जीना चाहिए।
  • सत्य की परीक्षा अनुभव से होनी चाहिए।

 चार्वाक दर्शन की प्रमुख विशेषताएँ

  • प्रत्यक्ष अनुभव पर बल।
  • तर्कशील दृष्टिकोण।
  • धार्मिक प्रामाण्य की समीक्षा।
  • ईश्वर, आत्मा और पुनर्जन्म पर प्रश्न।
  • भौतिक जगत की स्वीकृति।
  • अनुभव-आधारित जीवन-दृष्टि।
  • स्वतंत्र चिन्तन को प्रोत्साहन।

इन सिद्धांतों पर भारतीय दर्शनों की प्रतिक्रिया

चार्वाक के प्रत्यक्षवाद ने अन्य दर्शनों को अपने सिद्धांत अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया।

  • न्याय ने अनुमान की आवश्यकता सिद्ध की।
  • वेदान्त ने आत्मा और ब्रह्म के पक्ष में तर्क विकसित किए।
  • मीमांसा ने वेद-प्रामाण्य का विस्तार किया।
  • बौद्ध और जैन दर्शन ने प्रमाणमीमांसा को और अधिक विकसित किया।

इस प्रकार चार्वाक भारतीय दार्शनिक परम्परा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक चुनौती के रूप में उपस्थित हुआ।

निष्कर्ष

चार्वाक दर्शन के मूल सिद्धांतों का केन्द्र प्रत्यक्ष अनुभव, तर्क और इस जीवन की वास्तविकता है। यद्यपि उसके अनेक निष्कर्ष भारतीय आस्तिक दर्शनों से भिन्न हैं, फिर भी उसने ज्ञान, प्रमाण और सत्य की परीक्षा के लिए ऐसे प्रश्न उठाए जिन्होंने सम्पूर्ण भारतीय दर्शन को अधिक तर्कसंगत और व्यवस्थित बनने के लिए प्रेरित किया। इसलिए चार्वाक का महत्व उसके निष्कर्षों से अधिक उसकी प्रश्नाकुलता और बौद्धिक साहस में निहित है।

 

आज के संदर्भ में विचारणीय प्रश्न

  1. क्या केवल प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सम्पूर्ण ज्ञान की रचना सम्भव है?
  2. क्या अनुमान के बिना विज्ञान का विकास सम्भव होता?
  3. क्या धार्मिक आस्था और तार्किक परीक्षण साथ-साथ चल सकते हैं?
  4. क्या चेतना केवल पदार्थ का गुण है, या उससे अधिक कुछ?
  5. क्या आधुनिक भौतिकवाद और चार्वाक दर्शन वास्तव में एक ही विचारधारा हैं?
  6. क्या चार्वाक का उद्देश्य केवल धर्म-विरोध था, या ज्ञान की नई पद्धति प्रस्तुत करना?
  7. क्या आज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी सीमा तक चार्वाक के प्रत्यक्षवाद से प्रभावित प्रतीत होता है?

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI.)

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