दर्शन भाग–3 : चार्वाक दर्शन के मूल सूत्र, प्राथमिक स्रोत एवं ग्रंथों का आलोचनात्मक अध्ययन
दर्शन भाग–3 : चार्वाक दर्शन के मूल सूत्र, प्राथमिक स्रोत एवं ग्रंथों का आलोचनात्मक अध्ययन
किसी
भी दर्शन को समझने का
सबसे विश्वसनीय मार्ग उसके मूल ग्रंथ (Primary Sources) होते हैं। वे
हमें यह बताते हैं
कि उस दर्शन के
प्रवर्तकों ने स्वयं क्या
कहा था। परन्तु चार्वाक
दर्शन के अध्ययन में
सबसे बड़ी कठिनाई यही
है कि उसका कोई
भी मूल ग्रंथ पूर्ण
रूप में आज उपलब्ध
नहीं है।
इस
कारण चार्वाक दर्शन का पुनर्निर्माण विभिन्न
दार्शनिक ग्रंथों में उद्धृत सूत्रों,
विरोधी मतों द्वारा प्रस्तुत
विवरणों तथा आधुनिक विद्वानों
के आलोचनात्मक अध्ययन के आधार पर
किया जाता है।
इस
भाग का उद्देश्य चार्वाक
दर्शन के उपलब्ध स्रोतों
का प्रामाणिक परिचय देना तथा यह
स्पष्ट करना है कि
कौन-सा स्रोत प्राथमिक
है, कौन-सा द्वितीयक,
और उनकी ऐतिहासिक विश्वसनीयता
कितनी है।
क्या
चार्वाक का कोई मूल ग्रंथ उपलब्ध है?
इस प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर
है— नहीं।
आज तक चार्वाक दर्शन
का कोई पूर्ण एवं
प्रामाणिक मूल ग्रंथ उपलब्ध
नहीं हुआ है।
जो कुछ उपलब्ध है,
वह मुख्यतः—
- अन्य दर्शनों के उद्धरण, खण्डन-ग्रंथों के संदर्भ, कुछ स्वतंत्र रचनाओं, तथा आधुनिक पुनर्निर्माणों पर आधारित है।
यही
कारण है कि चार्वाक
दर्शन का अध्ययन अन्य
भारतीय दर्शनों की अपेक्षा अधिक
जटिल माना जाता है।
बृहस्पति
सूत्र (Bṛhaspati Sūtra)
स्थिति
- परम्परा में बृहस्पति सूत्र को चार्वाक दर्शन
का मूल ग्रंथ माना
जाता है।
किन्तु—
- इसका पूर्ण पाठ उपलब्ध नहीं है।
- किसी भी प्राचीन पुस्तकालय में इसकी सम्पूर्ण प्रति प्राप्त नहीं हुई।
- विभिन्न दार्शनिक ग्रंथों में केवल इसके उद्धरण मिलते हैं।
अतः
वर्तमान में इसे लुप्त
(Lost Text) माना जाता है।
लेखक - परम्परा— आचार्य बृहस्पति
किन्तु
विद्वानों में मतभेद हैं—
- क्या यह देवगुरु बृहस्पति हैं?, कोई ऐतिहासिक दार्शनिक?, या लोकायत परम्परा के प्रतीक?
इस विषय में निश्चित
ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
बृहस्पति
सूत्र के उद्धृत सिद्धांत
विभिन्न
ग्रंथों में चार्वाक के
नाम से जिन सिद्धांतों
का उल्लेख मिलता है, उनमें प्रमुख
हैं—
- प्रत्यक्ष ही प्रमाण है।, वेद प्रमाण नहीं हैं।
- आत्मा शरीर से भिन्न नहीं है।
- पुनर्जन्म नहीं है।
- ईश्वर सिद्ध नहीं है।
- कर्मफल का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।
- वर्तमान जीवन ही वास्तविक है।
इन सूत्रों का मूल पाठ
उपलब्ध नहीं होने से
उनके वास्तविक शब्दरूप पर मतभेद है।
तत्त्वोपप्लवसिंह
लेखक -जयराशि
भट्ट -(आठवीं–नौवीं शताब्दी ई.)
यह चार्वाक अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण
उपलब्ध ग्रंथ माना जाता है।
किन्तु
आधुनिक विद्वानों में यह विवाद
है कि—
- जयराशि भट्ट शुद्ध चार्वाक थे,
- या उग्र संशयवादी (Radical
Skeptic)।
इस ग्रंथ में प्रमाणों की
गहन समीक्षा मिलती है और अनेक
स्थापित दार्शनिक मान्यताओं की आलोचना की
गई है।
सर्वदर्शनसंग्रह
लेखक -माधवाचार्य
(विद्यारण्य) -(14वीं शताब्दी)
यह चार्वाक दर्शन का सबसे व्यवस्थित
विवरण प्रस्तुत करने वाला ग्रंथ
है।
इसकी
विशेषताएँ—
- चार्वाक को प्रथम दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- उसके प्रमुख सिद्धांतों का संक्षिप्त परिचय मिलता है।
- तत्पश्चात उनका आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है।
यद्यपि
यह विरोधी परम्परा का ग्रंथ है,
फिर भी चार्वाक अध्ययन
का सबसे अधिक उद्धृत
स्रोत यही है।
षड्दर्शनसमुच्चय
लेखक - आचार्य
हरिभद्रसूरि -(जैन परम्परा)
इस ग्रंथ में भारतीय दर्शनों
का संक्षिप्त परिचय मिलता है, जिसमें चार्वाक
का भी उल्लेख है।
सर्वसिद्धान्तसंग्रह
परम्परागत
रूप से यह ग्रंथ
आदि शंकराचार्य के नाम से
सम्बद्ध किया जाता है,
यद्यपि आधुनिक विद्वान इसके लेखकत्व पर
मतभेद रखते हैं।
चार्वाक
सम्बन्धी विवरण के कारण यह
अध्ययन की दृष्टि से
महत्वपूर्ण है।
न्याय
परम्परा में चार्वाक
चार्वाक
के अनेक सिद्धांत न्याय
ग्रंथों में उद्धृत मिलते
हैं।
विशेषतः—जयन्त भट्ट (न्यायमञ्जरी),उदयनाचार्य (न्यायकुसुमांजलि), वाचस्पति मिश्र, उद्योतकर
इन सभी ने चार्वाक
के प्रत्यक्षवाद और अनुमान-विरोध
की विस्तृत समीक्षा की है।
वेदान्त
परम्परा में चार्वाक
चार्वाक
का उल्लेख अनेक वेदान्त ग्रंथों
में मिलता है।
विशेषतः—
आदि शंकराचार्य (ब्रह्मसूत्रभाष्य में संदर्भ), वाचस्पति
मिश्र, विद्यारण्य
इनका
उद्देश्य चार्वाक सिद्धांतों का खण्डन करना
था, किन्तु इन्हीं ग्रंथों से चार्वाक के
अनेक विचार संरक्षित भी रहे।
बौद्ध एवं जैन स्रोत
चार्वाक
का उल्लेख अनेक बौद्ध तथा
जैन आचार्यों ने भी किया
है।
इनमें
प्रमुख हैं— शान्तरक्षित, कमलशील, हरिभद्रसूरि इन ग्रंथों में चार्वाक की
प्रमाणमीमांसा की आलोचना की
गई है।
आधुनिक
प्रकाशित शोध
आधुनिक
युग में चार्वाक पर
गंभीर अध्ययन करने वाले प्रमुख
विद्वान—
भारतीय
- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प्रो. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त, प्रो. एम. हिरियण्णा, देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय, प्रो. रामकृष्ण भट्टाचार्य, प्रो. दयाकृष्ण
विदेशी
- Karl
H. Potter, Eli Franco, Johannes Bronkhorst, Richard Garbe (भारतीय दर्शन पर प्रारम्भिक शोध), Franklin Edgerton
(संदर्भात्मक अध्ययन)
महत्वपूर्ण
प्रकाशित पुस्तकें
चार्वाक
अध्ययन के लिए निम्न
ग्रंथ विशेष रूप से उपयोगी
माने जाते हैं—
- Lokāyata:
A Study in Ancient Indian Materialism — Debiprasad Chattopadhyaya
- Studies
on the Cārvāka/Lokāyata — Ramkrishna Bhattacharya
- History
of Indian Philosophy — Surendranath Dasgupta
- Indian
Philosophy — Dr. S. Radhakrishnan
- Outlines
of Indian Philosophy — M. Hiriyanna
- Encyclopedia
of Indian Philosophies — Karl H. Potter (Editor)
अप्रकाशित
शोध
भारत
के अनेक विश्वविद्यालयों में
चार्वाक दर्शन पर पीएच.डी.
एवं एम.फिल. स्तर
के शोध हुए हैं।
मुख्य
शोध-विषय—
- चार्वाक की प्रमाणमीमांसा, भारतीय भौतिकवाद, लोकायत और आधुनिक विज्ञान, चार्वाक एवं नैतिक दर्शन, चार्वाक और समकालीन भौतिकवाद, चार्वाक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण, भारतीय नास्तिक दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन
इनमें
से अनेक शोधप्रबंध विश्वविद्यालय
पुस्तकालयों, शोध-संग्रहों तथा
डिजिटल अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।
चार्वाक
अध्ययन की स्रोत-समस्या
चार्वाक
दर्शन का अध्ययन करते
समय चार प्रमुख कठिनाइयाँ
सामने आती हैं—
(१)
मूल ग्रंथों का लुप्त होना।
(२)
अधिकांश सामग्री विरोधियों द्वारा लिखी गई है।
(३)
अनेक उद्धरणों की प्रामाणिकता विवादित है।
(४)
विभिन्न कालों में चार्वाक की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ की गई हैं।
इसी
कारण आधुनिक शोध में Textual Criticism और Source Criticism को अत्यधिक महत्व
दिया जाता है।
आज
चार्वाक का अध्ययन कैसे किया जाता है?
समकालीन
शोधकर्ता निम्न पद्धति अपनाते हैं—
- उपलब्ध सभी उद्धरणों का संग्रह।
- विभिन्न पाण्डुलिपियों की तुलना।
- विरोधी परम्पराओं का तुलनात्मक अध्ययन।
- भाषिक विश्लेषण।
- ऐतिहासिक सन्दर्भों का परीक्षण।
- आधुनिक दार्शनिक पुनर्व्याख्या।
इसी
प्रक्रिया से आज चार्वाक
दर्शन का अपेक्षाकृत विश्वसनीय
स्वरूप पुनर्निर्मित किया जा रहा
है।
चार्वाक
दर्शन का सबसे बड़ा
दुर्भाग्य यह है कि
उसके मूल ग्रंथ लगभग
पूर्णतः लुप्त हो चुके हैं।
परिणामस्वरूप आज हम उसे
मुख्यतः उसके आलोचकों के
माध्यम से जानते हैं।
फिर भी बृहस्पति परम्परा,
तत्त्वोपप्लवसिंह,
सर्वदर्शनसंग्रह,
न्याय, वेदान्त, बौद्ध और जैन साहित्य
में सुरक्षित उद्धरणों तथा आधुनिक विद्वानों
के आलोचनात्मक शोध के आधार
पर चार्वाक दर्शन की एक संगत
रूपरेखा निर्मित की जा सकती
है। इसलिए चार्वाक का अध्ययन केवल
दार्शनिक नहीं, बल्कि स्रोत-समालोचना और पाठ-आलोचना
का भी विषय है।
आज
के संदर्भ में विचारणीय प्रश्न
- क्या किसी दर्शन का निष्पक्ष अध्ययन उसके विरोधियों के लेखन के आधार पर किया जा सकता है?
- यदि भविष्य में बृहस्पति सूत्र की कोई प्रामाणिक पाण्डुलिपि मिल जाए, तो क्या चार्वाक की वर्तमान समझ बदल सकती है?
- क्या स्रोत-समालोचना के बिना प्राचीन दर्शन का इतिहास लिखा जा सकता है?
- क्या आधुनिक विद्वानों द्वारा पुनर्निर्मित चार्वाक वास्तव में मूल चार्वाक है?
- क्या चार्वाक का सबसे बड़ा योगदान उसके निष्कर्षों में है या उसके द्वारा उठाए गए प्रश्नों में?
मुकेश
श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन
आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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