दर्शन - अध्याय–०१ | भाग–०६ | दर्शन क्या है? | अपनी दृष्टि में दर्शन

 दर्शन - अध्याय–०१ | भाग–०६ | दर्शन क्या है? | अपनी दृष्टि में दर्शन

किसी दर्शन का अध्ययन करते समय सबसे पहली भूल यही होती है कि हम उसे अपनी पूर्वधारणाओं के आधार पर समझने लगते हैं। हम किसी दर्शन के कुछ वाक्य पढ़ते हैं, उन्हें अपने परिचित अर्थों में रखते हैं और फिर निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि वह दर्शन क्या कहता है। लेकिन दर्शन की वास्तविक समझ इतनी सरल नहीं होती।

किसी दर्शन को समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि वह दर्शन स्वयं किस प्रश्न से प्रारम्भ होता है।

यदि कोई व्यक्ति बौद्ध दर्शन को केवल “ईश्वर को न मानने वाला दर्शन” कहकर समझना चाहे, तो वह उसके मूल प्रश्न से दूर हो जाएगा। यदि कोई वेदान्त को केवल “आत्मा और ब्रह्म की बात करने वाला दर्शन” कहकर छोड़ दे, तो वह उसकी तत्त्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा की जटिलता को नहीं समझ पाएगा। यदि कोई न्याय दर्शन को केवल “तर्कशास्त्र” मान ले, तो वह उसके ज्ञान और प्रमाण सम्बन्धी व्यापक प्रश्नों को सीमित कर देगा।

इसलिए दर्शन को पहले उसकी अपनी दृष्टि में समझना होगा।

प्रत्येक दर्शन का अपना प्रश्न

दर्शन केवल उत्तरों का संग्रह नहीं है। प्रत्येक दर्शन के पीछे कुछ मूल प्रश्न होते हैं और उन्हीं प्रश्नों के आधार पर उसकी पूरी संरचना विकसित होती है।

किसी दर्शन का मूल प्रश्न वास्तविकता से जुड़ा हो सकता है।

किसी का ज्ञान से। किसी का दुःख से। किसी का आत्मा से। किसी का भाषा और प्रमाण से।

यह सम्भव है कि दो दर्शन एक ही शब्द का प्रयोग करें, लेकिन उनके लिए उस शब्द का अर्थ बिल्कुल अलग हो।

उदाहरण के लिए “आत्मा” शब्द विभिन्न परम्पराओं में समान अर्थ नहीं रखता। “चेतना”, “मुक्ति”, “ज्ञान”, “कर्म” और “वास्तविकता” जैसे शब्दों के साथ भी यही समस्या है।

इसलिए किसी दर्शन को समझने से पहले यह पूछना होगा— यह दर्शन इस शब्द का अर्थ क्या मानता है?

और उससे भी पहले— यह दर्शन इस शब्द की आवश्यकता क्यों अनुभव करता है?

यहीं से वास्तविक दार्शनिक अध्ययन प्रारम्भ होता है।

अपने मानदण्ड से दूसरे दर्शन का मूल्यांकन

मनुष्य स्वभावतः अपने परिचित विचारों को सामान्य मानता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष दार्शनिक या धार्मिक परम्परा में पला है, तो उसके लिए कुछ धारणाएँ स्वाभाविक हो सकती हैं। जब वह किसी दूसरे दर्शन से मिलता है, तो वह अनजाने में उसी पुराने ढाँचे से नए दर्शन को समझने लगता है।

यहीं से गलतफहमी पैदा होती है।

एक दर्शन में “ज्ञान” का अर्थ किसी विशेष प्रकार का प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है। दूसरे में वह तर्क और प्रमाण से जुड़ा हो सकता है। तीसरे में ज्ञान का अर्थ दुःख से मुक्ति की दिशा में परिवर्तन हो सकता है।

यदि हम इन सभी को एक ही अर्थ में रख दें, तो तुलना नहीं होगी—विचारों का विकृतिकरण होगा।

इसलिए किसी दर्शन की आलोचना करने से पहले उसे उसके अपने वैचारिक ढाँचे में समझना आवश्यक है।किसी दर्शन को पहले उसकी भाषा में समझना होगा; उसके बाद ही उसकी आलोचना की जा सकती है।

समझना और स्वीकार करना अलग हैं

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अन्तर है।

किसी दर्शन को समझना और उसे स्वीकार करना एक ही बात नहीं है।

हम किसी दर्शन के तर्क को समझ सकते हैं, उसके मूल सिद्धान्तों को सही रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं और फिर भी उससे असहमत हो सकते हैं।

वास्तव में गम्भीर आलोचना के लिए यह आवश्यक है।

यदि कोई व्यक्ति किसी सिद्धान्त को समझे बिना ही उसे गलत घोषित कर देता है, तो उसकी आलोचना केवल प्रतिक्रिया है।

लेकिन यदि वह पहले यह समझता है कि—

  • दर्शन का मूल प्रश्न क्या है, उसका तर्क क्या है, उसकी अवधारणाएँ किस अर्थ में प्रयुक्त हैं, और उसका निष्कर्ष किस आधार पर खड़ा है,

तब उसकी असहमति भी बौद्धिक रूप ग्रहण कर सकती है।

इस ग्रंथ की शोध-पद्धति का एक मूल सिद्धान्त यही होगा— पहले समझना, फिर जाँचना और उसके बाद मूल्यांकन करना।

परम्परा और आधुनिक दृष्टि

प्राचीन दर्शनों को पढ़ते समय एक दूसरी कठिनाई भी सामने आती है।

हम आधुनिक मनुष्य हैं।

हम विज्ञान, लोकतन्त्र, मनोविज्ञान और आधुनिक ज्ञान की भाषा से परिचित हैं। स्वाभाविक रूप से हम प्राचीन सिद्धान्तों को इन्हीं आधुनिक अवधारणाओं के माध्यम से समझना चाहते हैं।

यह प्रयास कभी-कभी उपयोगी हो सकता है।

लेकिन इसमें एक गंभीर खतरा भी है।

हम किसी प्राचीन दर्शन को आधुनिक विज्ञान का प्रारम्भिक रूप मान लें। हम किसी प्राचीन अवधारणा को आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली में रखकर कह दें कि “यह तो वही बात थी।”

यह दार्शनिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से अनुचित हो सकता है।

क्योंकि दो विचारों में समानता होना यह सिद्ध नहीं करता कि वे एक ही विचार हैं।

एक प्राचीन दर्शन ने “सूक्ष्म” शब्द का प्रयोग किया हो और आधुनिक विज्ञान ने “सूक्ष्म कण” की अवधारणा विकसित की हो—तो केवल शब्दगत या सतही समानता के आधार पर दोनों को एक नहीं माना जा सकता।

इसलिए इस ग्रंथ में प्राचीन दर्शन और आधुनिक विज्ञान के बीच वास्तविक वैचारिक संवाद की सम्भावना पर चर्चा की जाएगी, लेकिन कृत्रिम समानता स्थापित नहीं की जाएगी।

किसी दर्शन को उसकी अपनी दृष्टि में समझना केवल अकादमिक सावधानी नहीं है। यह बौद्धिक ईमानदारी की पहली शर्त है।

हम किसी दर्शन से सहमत हो सकते हैं या असहमत। उसे स्वीकार कर सकते हैं या अस्वीकार। लेकिन उससे पहले हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम वास्तव में उसी दर्शन से संवाद कर रहे हैं—या अपने मन में बनाए हुए उसके किसी सरल रूप से।

और यहीं से अगला प्रश्न उठता है।

यदि किसी दर्शन को उसकी अपनी भाषा और संदर्भ में समझना आवश्यक है, तो—

उस दर्शन की प्रामाणिक भाषा और मूल रूप तक पहुँचा कैसे जाए?

क्या बाद की लोकप्रिय व्याख्याएँ पर्याप्त हैं?

या हमें मूल ग्रंथों और प्राथमिक स्रोतों तक लौटना होगा?

अगले भाग में हम दर्शन और उसके मूल स्रोतों के सम्बन्ध पर विचार करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )


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