दर्शन - भाग–०१ | दर्शन क्या है? | प्रश्न का जन्म

  दर्शन -अध्याय–०१ | भाग–०१ | दर्शन क्या है? | प्रश्न का जन्म

मनुष्य ने बहुत कुछ बाद में सीखा। उसने पहले चलना सीखा, फिर शिकार करना, आग को बचाना, औज़ार बनाना, भाषा विकसित करना और समाज बनाना। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उसने अपने चारों ओर देखा और पहली बार पूछा—“यह सब क्या है?”

यह प्रश्न साधारण नहीं था। क्योंकि इस प्रश्न के साथ मनुष्य केवल संसार को नहीं देख रहा था; वह स्वयं को भी देखने लगा था। वह आकाश को देखता था, ऋतुओं का बदलना देखता था, जन्म और मृत्यु को देखता था, शरीर को बढ़ते और क्षीण होते देखता था। वह दुःख, सुख और भय का अनुभव करता था और फिर एक दिन उसके भीतर ऐसी दूरी उत्पन्न हुई जहाँ वह केवल जी नहीं रहा था—वह अपने जीने को देख भी रहा था।

यहीं से दर्शन की सम्भावना प्रारम्भ होती है।

दर्शन का पहला प्रश्न सम्भवतः यह नहीं था—“सत्य क्या है?” सत्य शब्द स्वयं एक व्यवस्थित दार्शनिक अवधारणा के रूप में बाद में विकसित हुआ होगा। पहला प्रश्न शायद इससे अधिक सरल था—“क्यों?” वर्षा क्यों होती है? मृत्यु क्यों आती है? दुःख क्यों है? मैं कौन हूँ? जो दिखाई देता है, क्या वही सम्पूर्ण है? और यदि मैं संसार को देख रहा हूँ, तो देखने वाला कौन है?

इन प्रश्नों का महत्व इस बात में नहीं है कि मनुष्य ने इनके उत्तर तुरन्त खोज लिए। महत्व इस बात में है कि उसने प्रश्न करना शुरू किया। दर्शन का जन्म सम्भवतः किसी एक निश्चित ग्रंथ, नगर या व्यक्ति के साथ नहीं हुआ। वह उस क्षण से जुड़ा है जब मनुष्य ने अपने अनुभव को बिना प्रश्न स्वीकार करने से इनकार किया।

दर्शन केवल ज्ञान नहीं है

दर्शन को सामान्यतः ज्ञान से जोड़कर देखा जाता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दर्शन सत्य को जानना चाहता है। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म अन्तर है। ज्ञान किसी वस्तु के बारे में सूचना हो सकता है; दर्शन पूछता है—ज्ञान क्या है?

मनुष्य जान सकता है कि सूर्य पूर्व से उदित होता दिखाई देता है। यह अनुभव है। वह यह भी जान सकता है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। यह वैज्ञानिक ज्ञान है। लेकिन दर्शन यहाँ एक और प्रश्न पूछ सकता है—“हम किसी बात को ज्ञान कैसे मानते हैं?”

यह प्रश्न ज्ञान के विषय से हटकर ज्ञान की प्रकृति पर चला जाता है। यहीं दर्शन प्रारम्भ होता है। इसीलिए दर्शन केवल ज्ञान का संग्रह नहीं है; वह ज्ञान की शर्तों पर भी विचार करता है।

एक व्यक्ति इतिहास, विज्ञान, भाषाओं और गणित का बहुत बड़ा ज्ञान रख सकता है और फिर भी कभी यह न पूछे कि “मैं जो जानता हूँ, उसे जानता कैसे हूँ?” दर्शन इस प्रश्न को जन्म देता है और मनुष्य को उसके अपने ज्ञान के सामने खड़ा कर देता है।

        दर्शन केवल संसार के बारे में विचार नहीं है; वह विचार करने की प्रक्रिया पर भी विचार है।

जिज्ञासा से व्यवस्थित विचार तक

मनुष्य जिज्ञासु है, लेकिन हर जिज्ञासा दर्शन नहीं है। एक बालक पूछ सकता है—“आकाश नीला क्यों है?” यह जिज्ञासा है। विज्ञान इस प्रश्न का उत्तर प्रकाश के प्रकीर्णन के माध्यम से दे सकता है। लेकिन जब प्रश्न बदलकर यह हो जाता है—“जो कुछ हमें दिखाई देता है, क्या वास्तविकता वही है?”—तो प्रश्न का क्षेत्र बदल जाता है।

अब प्रश्न किसी एक घटना की व्याख्या नहीं माँग रहा। वह दृश्य और वास्तविक के बीच सम्बन्ध पूछ रहा है। यहीं से दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न होता है।

इसलिए दर्शन जिज्ञासा का केवल विस्तार नहीं है; वह जिज्ञासा का गहन और व्यवस्थित रूप है। दर्शन प्रश्न पूछता है, लेकिन प्रश्नों को बिखरा हुआ नहीं छोड़ता। वह पूछता है—यह प्रश्न किस मूल समस्या से जुड़ा है? इसकी पूर्वधारणाएँ क्या हैं? इसके सम्भावित उत्तर कौन-कौन से हैं? और उन उत्तरों की तार्किक संगति क्या है?

यही कारण है कि दर्शन को केवल “सोचना” कह देना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य निरन्तर सोचता है। दर्शन उस सोच को आत्म-परीक्षण, तर्क और संरचना प्रदान करता है।

दर्शन का अस्तित्वगत स्वरूप

मनुष्य केवल जानना नहीं चाहता। वह यह भी जानना चाहता है कि उसे जीना कैसे चाहिए।

मनुष्य का प्रश्न केवल यह नहीं है कि संसार कैसे बना। वह यह भी पूछता है—“इस संसार में मेरा स्थान क्या है?” वह केवल यह नहीं पूछता कि मृत्यु क्या है; वह पूछता है—“मृत्यु के ज्ञान के साथ मुझे कैसे जीना चाहिए?” वह केवल यह नहीं पूछता कि दुःख क्यों होता है; वह पूछता है—“दुःख के बीच जीवन का अर्थ क्या है?”

इस स्तर पर दर्शन विज्ञान से भिन्न दिशा में जाता है। विज्ञान दुःख की जैविक, मनोवैज्ञानिक या सामाजिक कारण-व्यवस्था का अध्ययन कर सकता है। लेकिन दर्शन पूछ सकता है—“क्या दुःख केवल एक घटना है, या वह मनुष्य के अस्तित्व की समझ को बदलता है?”

यहाँ दर्शन मनुष्य के जीवन में प्रवेश करता है और उसका अस्तित्वगत स्वरूप प्रकट होता है।

क्या दर्शन दुःख से जन्मता है?

यह प्रश्न सरल नहीं है। अनेक दार्शनिक परम्पराएँ मनुष्य के दुःख को अपने मूल प्रश्न का केन्द्र बनाती हैं। बौद्ध दृष्टि में दुःख जीवन की मूल समस्या के रूप में सामने आता है। उपनिषदों में मनुष्य का प्रश्न सीमित और परिवर्तनशील अस्तित्व से उठकर परम वास्तविकता की खोज की ओर जाता है। यूनानी दर्शन में मनुष्य ने प्रकृति, परिवर्तन और सत्य के प्रश्नों पर विचार किया। आधुनिक अस्तित्ववादी दर्शन में अर्थहीनता, स्वतंत्रता, अकेलापन और मृत्यु के प्रश्न विशेष रूप से तीव्र हो उठते हैं।

इसलिए यह कहना सम्भव है कि दुःख दर्शन को जन्म देने वाली शक्तियों में से एक है।

लेकिन क्या दर्शन केवल दुःख से जन्मता है? शायद नहीं। मनुष्य कभी-कभी सुख के बीच भी प्रश्न करता है; कभी आश्चर्य से, कभी सौन्दर्य से, कभी मौन से, कभी मृत्यु को देखकर और कभी जन्म को देखकर।

इसलिए दर्शन के जन्म को किसी एक भाव से जोड़ना उचित नहीं होगा। दर्शन मनुष्य की उस स्थिति से जन्मता है जहाँ उसका अनुभव उसके लिए पर्याप्त नहीं रह जाता। वह अपने अनुभव के पार देखना चाहता है।

अनुभव और प्रश्न के बीच की दूरी

एक पशु भूख का अनुभव करता है। मनुष्य भी भूख का अनुभव करता है। लेकिन मनुष्य भूख के बाद पूछ सकता है—“भूख क्या है?”

वह अपने भय को देख सकता है और पूछ सकता है—“मैं भयभीत क्यों हूँ?” 

वह अपने विचारों को देख सकता है और पूछ सकता है—“क्या मैं अपने विचार हूँ?”

यहीं मनुष्य के भीतर एक विशेष क्षमता दिखाई देती है—अनुभव से एक कदम पीछे हटकर अनुभव को देखना।

दर्शन इसी दूरी को विचार में बदलता है। यह दूरी मनुष्य को अपने अनुभव का दास बने रहने से रोकती है, लेकिन यही दूरी उसे बेचैन भी करती है। जो व्यक्ति केवल जीता है, वह अनेक प्रश्नों से बचा रह सकता है। जो व्यक्ति अपने जीवन को देखने लगता है, वह अपने ही जीवन के सामने खड़ा हो जाता है।

दर्शन का जन्म इस असुविधा से भी जुड़ा है।

दर्शन मनुष्य को उसके अनुभव से बाहर नहीं ले जाता; वह उसे अपने अनुभव के भीतर अधिक गहराई से देखने के लिए बाध्य करता है।

अतः प्रारम्भिक रूप से दर्शन को इस प्रकार समझा जा सकता है—दर्शन मनुष्य की वह व्यवस्थित और आत्म-परीक्षणशील बौद्धिक यात्रा है, जिसमें वह अस्तित्व, सत्य, ज्ञान, चेतना, जीवन और अपने स्वयं के होने के मूल प्रश्नों पर विचार करता है।

लेकिन यह परिभाषा अभी पूर्ण नहीं है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न अभी शेष है—मनुष्य ने प्रश्न करना शुरू क्यों किया? क्या केवल जिज्ञासा के कारण? क्या प्रकृति के रहस्य के कारण? क्या मृत्यु के भय से? क्या दुःख के कारण? या क्या दर्शन स्वयं मनुष्य की चेतना की कोई अनिवार्य अवस्था है?

अगले भाग में हम दर्शन की परिभाषा के भीतर छिपे मूल तत्व—प्रश्न, तर्क, सत्य, अनुभव और आत्म-परीक्षण—का विश्लेषण करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव ,

(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र )

(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KE BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI )


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