महाभारत - अध्याय 1.1 महाभारत नाम का अर्थ और उसकी परंपरा
अध्याय 1.1
महाभारत नाम का अर्थ और उसकी परंपरा
प्रश्न की शुरुआत : “महाभारत” नाम आखिर कहता क्या है?
“महाभारत” शब्द को देखते ही सामान्यतः हमारे सामने एक विशाल युद्ध, कुरुक्षेत्र, पाण्डव और कौरव, श्रीकृष्ण और अठारह अक्षौहिणी सेनाओं का चित्र उभरता है। लेकिन शोध की दृष्टि से पहली सावधानी यही है कि महाभारत को उसके युद्ध से नहीं, उसके नाम से पढ़ना आरम्भ किया जाए।
क्योंकि किसी ग्रंथ का नाम केवल उसका परिचय नहीं देता; अनेक बार वह उस ग्रंथ की परंपरागत आत्म-समझ का संकेत भी होता है।
“महाभारत” दो पदों से बना है— महा + भारत
“महा” का सामान्य अर्थ है—बड़ा, महान, विस्तृत, श्रेष्ठ, गंभीर या असाधारण।
“भारत” के अर्थ-क्षेत्र में एक ओर भरतवंश, दूसरी ओर भरत नामक परंपरा, और आगे चलकर भारतवर्ष तथा उससे संबंधित सांस्कृतिक-सामाजिक संसार की धारणाएँ आती हैं।
इसलिए “महाभारत” का पहला सहज अर्थ होगा— महान भारत का आख्यान।
लेकिन यहीं रुक जाना पर्याप्त नहीं है।
क्योंकि स्वयं महाभारत की परंपरा इस नाम को केवल “भरतवंश की बड़ी कथा” के अर्थ में नहीं रखती। आदिपर्व के अनुक्रमणिका-प्रसंग में एक प्रसिद्ध आत्म-निर्वचन मिलता है—
महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते। निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
अर्थात् इसकी महत्ता और इसके “भार” के कारण इसे महाभारत कहा जाता है।
यहाँ “भार” को केवल भौतिक वजन समझना भूल होगी। परंपरागत व्याख्या में यह गौरव, गम्भीरता, अर्थ-भार और विषय-विस्तार की ओर संकेत करता है।
अर्थात्—
महाभारत केवल इसलिए “महा” नहीं है कि वह बहुत बड़ा है; वह इसलिए भी “महा” है कि वह बहुत कुछ वहन करता है। यही इस नाम का पहला गहरा संकेत है।
“भारत” : केवल एक राजा का नाम नहीं
“भारत” शब्द की दूसरी महत्वपूर्ण परत उस भरत से जुड़ती है जिसकी वंश-परंपरा महाभारत में प्रतिष्ठित है।
आदिपर्व में दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र की कथा आती है। वहाँ बालक को पहले सर्वदमन कहा गया है और बाद में वह भरत नाम से प्रसिद्ध होता है। उसके वंश से आगे चलकर भरतवंश की प्रतिष्ठा जुड़ती है। महाभारत की कथा स्वयं इस भरत-परंपरा को कुरुवंश और पाण्डव-कौरव की कथा से जोड़ती है।
इस प्रकार “भारत” का एक प्रमुख अर्थ है— भरत से सम्बद्ध वंश और उसकी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृति।
लेकिन यहाँ भी एक सूक्ष्म अंतर आवश्यक है।
यदि हम “महाभारत” का अर्थ केवल “राजा भरत की महान कथा” मान लें, तो हम ग्रंथ की वास्तविक सीमा को बहुत छोटा कर देंगे। स्वयं महाभारत में भरत की कथा उसके विशाल आख्यान-संसार का केवल एक अंश है।
अतः “भारत” यहाँ एक वंश-सूचक स्मृति भी है और एक सभ्यतागत आख्यान-क्षेत्र भी।
“भारत” से “महाभारत” तक : नाम में बढ़ती हुई व्यापकता
महाभारत की परंपरा में ग्रंथ के लिए जय, भारत और महाभारत—इन तीन नामों की चर्चा मिलती है।
आदिपर्व की आरम्भिक परंपरा “जय” के उद्घोष से जुड़ी हुई है—
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥
अर्थात् नारायण, नर और सरस्वती को प्रणाम करके “जय” का उच्चारण किया जाए।
आगे परंपरा में “भारत” और फिर “महाभारत” की संज्ञा आती है। एक प्रसिद्ध श्लोक कहता है—
चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम्। उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः॥
इस परंपरा में 24,000 श्लोकों की “भारतसंहिता” का उल्लेख मिलता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण पद्धतिगत सावधानी आवश्यक है।
इन नामों को देखकर तुरंत यह निष्कर्ष निकाल लेना कि पहले ठीक 8,800 श्लोकों का “जय” था, फिर ठीक 24,000 का “भारत”, और अंततः ठीक एक लाख श्लोकों का “महाभारत”—ऐतिहासिक तथ्य के रूप में पूरी तरह सिद्ध है, उचित नहीं होगा।
यह परंपरागत ग्रंथ-विकास की स्मृति है; आधुनिक अर्थ में प्रमाणित संपादकीय इतिहास नहीं।
फिर भी यह परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह हमें महाभारत को एक स्थिर, एक क्षण में निर्मित पुस्तक की तरह नहीं, बल्कि विकसित होते हुए ग्रंथ-समुदाय की तरह देखने का संकेत देती है।
“महा” केवल आकार का विशेषण नहीं
आज जब हम “महाभारत” कहते हैं तो “महा” का अर्थ प्रायः “बहुत बड़ा” लेते हैं।
यह अर्थ सही है, लेकिन अधूरा है।
ग्रंथ स्वयं अपने नाम का निर्वचन करते हुए कहता है— महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते।
यहाँ दो शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं— महत्त्व और भारवत्त्व।
“महत्त्व” केवल आकार नहीं, महानता और महत्व का संकेत करता है।
“भारवत्त्व” केवल वजन नहीं, वहनीयता, गंभीरता और अर्थ-भार की ओर संकेत करता है।
इस दृष्टि से “महाभारत” को इस प्रकार समझा जा सकता है—
जो आकार में विशाल है, विषय में गंभीर है और अर्थ में भारी है—वह महाभारत है।
और यह व्याख्या ग्रंथ की वास्तविक प्रकृति से मेल खाती दिखाई देती है।
क्योंकि एक ही ग्रंथ में— राजवंशों की वंशावलियाँ हैं, युद्ध है, राजनीति है, राज्यशास्त्र है, नीति है, परिवार है, विवाह है, स्त्री और पुरुष के संबंधों के प्रश्न हैं, वन और नगर हैं, तीर्थ और भूगोल हैं, मृत्यु और जीवन के प्रश्न हैं, कर्म और नियति हैं, योग है, सांख्य है, वेदान्तीय चिंतन है, भक्ति है, मोक्ष है, दान और यज्ञ हैं, लोकाचार है, और मनुष्य के भीतर उठने वाला धर्म-संकट है।
इसलिए “महा” यहाँ केवल विस्तार का नहीं, विषय-भार का भी संकेत है।
“भारत” की धारणा : वंश से भू-सांस्कृतिक संसार तक
महाभारत का अध्ययन करते समय “भारत” शब्द को केवल आधुनिक राष्ट्र-राज्य भारत के अर्थ में पढ़ना ऐतिहासिक रूप से सावधान दृष्टि नहीं होगी।
आधुनिक “भारत” एक संवैधानिक-राजनीतिक राष्ट्र है।
महाभारत का “भारत” इससे भिन्न ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अवधारणा है।
महाभारत के आख्यान में अनेक जनपद, नगर, नदियाँ, पर्वत, वन, तीर्थ और राजवंश आते हैं। इसका संसार केवल हस्तिनापुर या कुरुक्षेत्र तक सीमित नहीं है।
इसलिए “भारत” यहाँ धीरे-धीरे एक ऐसे सांस्कृतिक भूगोल का संकेत करने लगता है जिसमें अनेक समुदाय, राजवंश और प्रदेश एक साझा आख्यान में प्रवेश करते हैं।
यही कारण है कि “भारत” को केवल— “भरत राजा की संतान”
कहकर समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं।
यह शब्द एक ऐसी स्मृति-परंपरा का भी वाहक बन जाता है जिसमें विभिन्न राजवंश और भू-क्षेत्र एक व्यापक आख्यानात्मक संसार में संगठित होते हैं।
इस अर्थ में “महाभारत” केवल एक परिवार का इतिहास नहीं है।
वह एक ऐसे संसार का आख्यान है जिसमें परिवार से राज्य, राज्य से समाज और समाज से धर्म तक प्रश्न फैलते जाते हैं।
एक अत्यंत महत्वपूर्ण भेद : “भरत” और “भारतवर्ष”
यहाँ आधुनिक पाठक के लिए एक और सावधानी आवश्यक है।
“भरत”, “भारत”, “भारतवंश” और “भारतवर्ष”—इन शब्दों को हर स्थान पर एक ही अर्थ में रख देना उचित नहीं।
भरत व्यक्ति या वंशपरंपरा का संकेत कर सकता है।
भारत उस वंश से संबंधित आख्यान या परंपरा का नाम हो सकता है।
भारतवर्ष व्यापक भू-सांस्कृतिक अवधारणा की ओर संकेत कर सकता है।
लेकिन इन अर्थों का विकास एक ही क्षण में हुआ हो, ऐसा मानना आवश्यक नहीं।
शोध की दृष्टि से हमें प्रत्येक प्रयोग को उसके संदर्भ में देखना होगा।
यही इस अध्ययन की मूल पद्धति होगी— शब्द को उसके आज के अर्थ से नहीं, उसके अपने पाठ-संदर्भ से समझना।
महाभारत का नाम स्वयं उसके स्वरूप की ओर संकेत करता है
अब तक की चर्चा से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
यदि “महाभारत” केवल युद्ध का नाम होता, तो उसके नाम में युद्ध का संकेत अधिक प्रमुख होता।
यदि वह केवल भरतवंश की वंशावली होता, तो उसका अर्थ वहीं समाप्त हो जाता।
यदि वह केवल एक विशाल काव्य होता, तो “महा” केवल आकार का विशेषण होता।
लेकिन परंपरा इन तीनों सीमाओं को पार करती है।
भारत उसे वंश और सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ता है। महा उसे व्यापकता और महत्ता देता है। और भारवत्त्व उसके अर्थ-गौरव की ओर संकेत करता है।
इसलिए “महाभारत” नाम अपने भीतर ही एक बहुस्तरीय संकेत रखता है—
यह भारत की कथा है, पर केवल भारत की कथा नहीं;यह भरतवंश का आख्यान है, पर केवल वंशावली नहीं;यह विशाल ग्रंथ है, पर केवल विशालता इसका वैशिष्ट्य नहीं।
उसकी वास्तविक “महत्ता” उसके भीतर समाहित प्रश्नों के कारण है।
“महाभारत” : नाम से ही एक शोध-पद्धति क्यों निकलती है?
यहीं से हमारे शोध का पहला महत्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है। महाभारत को पढ़ते समय हमें तीन अतियों से बचना होगा।
पहली अति — केवल युद्ध मान लेना
यदि महाभारत = कुरुक्षेत्र युद्ध, तो महाभारत का बहुत बड़ा भाग अनावश्यक हो जाएगा।
तब शान्तिपर्व, अनुशासनपर्व, वनपर्व के दार्शनिक आख्यान, स्त्री-पात्रों के संघर्ष, राजधर्म, मोक्षधर्म, दानधर्म और असंख्य उपाख्यानों का अर्थ समझाना कठिन होगा।
दूसरी अति — केवल धार्मिक ग्रंथ मान लेना
तब उसके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संघर्षों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो पाएगा।
तीसरी अति — केवल ऐतिहासिक दस्तावेज मान लेना
तब उसके प्रतीकात्मक, दार्शनिक, नैतिक और आख्यानात्मक स्तर दब जाएंगे।
इसलिए अभी से एक सिद्धांत स्थापित करना आवश्यक है—
महाभारत को पहले उसके बहुस्तरीय स्वरूप में पढ़ना होगा; उसके बाद उसकी किसी एक श्रेणी पर विचार किया जा सकता है।
“महाभारत” और “भारत” के बीच का संबंध
महाभारत का नाम हमें एक और गहरी बात बताता है। भारत एक कथा-क्षेत्र है। महाभारत उस कथा-क्षेत्र का विस्तार है।
अर्थात् “महा” केवल बाहरी वृद्धि नहीं, अर्थ-क्षेत्र की वृद्धि भी है।
एक सीमित राजवंशीय कथा जब— मनुष्य के धर्म, राज्य के धर्म, परिवार के धर्म, युद्ध के धर्म, व्यक्ति के कर्तव्य, कर्म, नियति, मृत्यु, मोक्ष तक पहुँचती है, तब वह अपने मूल वंश-केंद्र से आगे निकल जाती है।
यही वह क्षण है जहाँ “भारत” “महाभारत” बनता है।
इस अर्थ में “महा” को केवल श्लोकों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
महाभारत : नाम के भीतर छिपा हुआ दार्शनिक संकेत
यदि इस नाम को दार्शनिक दृष्टि से पढ़ें तो “भार” शब्द अत्यंत अर्थपूर्ण हो जाता है।
मनुष्य का जीवन भी एक प्रकार का “भार” वहन करता है—
कर्तव्य का भार, संबंधों का भार, निर्णयों का भार, स्मृति का भार, अपराधबोध का भार, सत्ता का भार, प्रेम का भार और मृत्यु का भार।
महाभारत के पात्र इसी भार के भीतर निर्णय लेते हैं।
भीष्म के सामने प्रतिज्ञा का भार है।
धृतराष्ट्र के सामने पुत्र-मोह का भार है।
युधिष्ठिर के सामने धर्म का भार है।
अर्जुन के सामने संबंध और कर्तव्य का भार है।
कर्ण के सामने जन्म और निष्ठा का भार है।
द्रौपदी के सामने अपमान और न्याय का भार है।
कृष्ण के सामने युद्ध को धर्म की दिशा देने का प्रश्न है।
इसलिए “भारवत्त्व” को केवल ग्रंथ की विशालता के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं। यह हमें उस अस्तित्वगत भार की ओर भी देखने की अनुमति देता है जिसे महाभारत अपने पात्रों और पाठकों के सामने रखता है।
यही कारण है कि महाभारत का प्रश्न केवल— “क्या हुआ?” नहीं है।
उसका प्रश्न धीरे-धीरे बदल जाता है— “जब सब कुछ जटिल हो जाए, तब धर्म क्या है?”
और यहीं से अगले अध्यायों की भूमि तैयार होती है।
एक आवश्यक ऐतिहासिक सावधानी
यहाँ शोधकर्ता को परंपरा और इतिहास के बीच भेद बनाए रखना होगा।
महाभारत की परंपरा में “जय → भारत → महाभारत” का विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि आधुनिक अर्थ में तीन अलग-अलग लिखित संस्करण क्रमशः इतने-इतने श्लोकों के साथ निश्चित ऐतिहासिक तिथियों पर अस्तित्व में आए थे।
इसी प्रकार “महाभारत” नाम की पारंपरिक व्युत्पत्ति को आधुनिक भाषावैज्ञानिक व्युत्पत्ति के बराबर रखना भी उचित नहीं होगा।
हमें दो स्तरों को अलग रखना चाहिए— पारंपरिक निर्वचन और ऐतिहासिक-भाषावैज्ञानिक विश्लेषण।
दोनों का अपना महत्व है।
परंपरागत निर्वचन हमें बताता है कि भारतीय स्मृति ने इस ग्रंथ को स्वयं कैसे समझा।
ऐतिहासिक आलोचना हमें यह पूछने में सहायता करती है कि यह धारणा कब और किस प्रकार विकसित हुई।
इन दोनों को एक-दूसरे का शत्रु बनाने की आवश्यकता नहीं है।
इस उपाध्याय से प्राप्त प्रथम निष्कर्ष
“महाभारत” नाम को यदि उसकी पूरी परंपरा में देखा जाए तो उसके कम-से-कम चार स्तर सामने आते हैं—
पहला — वंशगत स्तर - भरत और भरतवंश की स्मृति।
दूसरा — सांस्कृतिक स्तर - भारत से संबंधित व्यापक आख्यान-संसार।
तीसरा — ग्रंथगत स्तर - विस्तार, विविध आख्यान और अनेक विषयों का समावेश।
चौथा — दार्शनिक स्तर- अर्थ-भार, धर्म-संकट और मानव-अस्तित्व की जटिलता।
इसलिए “महाभारत” को केवल— “भरतवंश का महान काव्य” कहना अपर्याप्त है।
अधिक सावधान कथन यह होगा—
महाभारत भरत-परंपरा से उद्भूत वह विशाल आख्यान-संसार है, जो अपने विस्तार में इतिहास, आख्यान, धर्म, नीति, दर्शन, राजनीति और मनुष्य के अस्तित्वगत प्रश्नों को एक ही ग्रंथीय संरचना में समेटता है।
और इसीलिए उसके नाम में आया हुआ “महा” केवल आकार का नहीं, अर्थ की व्यापकता का भी संकेत है।
आगे बढ़ने से पहले एक मूल प्रश्न
अब हमारे सामने एक स्वाभाविक प्रश्न खड़ा होता है—
यदि महाभारत की परंपरा स्वयं जय, भारत और महाभारत जैसे नामों की स्मृति रखती है, तो क्या इसका अर्थ यह है कि यह ग्रंथ समय के साथ विकसित हुआ?
यदि हाँ, तो उस विकास को किस प्रकार समझें?
क्या “जय” किसी मूल युद्ध-कथा का नाम था?
क्या “भारत” उसका विस्तृत रूप था?
क्या “महाभारत” उस परंपरा में जुड़ते गए आख्यानों, उपाख्यानों और दार्शनिक सामग्री का व्यापक रूप है?
या इन तीनों नामों का संबंध केवल ग्रंथ की परंपरागत आत्म-व्याख्या से है?
इन प्रश्नों का उत्तर अगले उपाध्याय— “जय → भारत → महाभारत : ग्रंथ के विस्तार की परंपरा”
में खोजा जाएगा।
निष्कर्ष
महाभारत के अध्ययन का पहला पाठ यह नहीं है कि कुरुक्षेत्र में क्या हुआ।
पहला पाठ यह है कि जिस ग्रंथ में हम उस युद्ध की कथा पढ़ रहे हैं, वह स्वयं को क्या मानता है।
“महाभारत” नाम हमें संकेत देता है कि यह केवल एक युद्ध-कथा नहीं है।
यह भारत की स्मृति है।
यह भरतवंश का आख्यान है।
यह एक विशाल ग्रंथ-संसार है।
और इससे भी अधिक—यह मानवीय धर्म-संकट का महाआख्यान है।
इसलिए इस शोध की पहली पद्धतिगत प्रतिज्ञा यही होगी—
महाभारत को उसकी कथा के आधार पर छोटा नहीं करेंगे, उसके आकार के आधार पर महान नहीं मानेंगे, और आधुनिक श्रेणियों के आधार पर पहले से परिभाषित नहीं करेंगे।
पहले उसे स्वयं बोलने देंगे।
क्योंकि संभवतः “महाभारत” का सबसे गहरा अर्थ उसके नाम में नहीं, बल्कि उस भार में छिपा है जिसे वह मनुष्य के सामने रखता है—
धर्म का भार। निर्णय का भार। इतिहास का भार। स्मृति का भार। और मनुष्य होने का भार।
यहीं से महाभारत का वास्तविक अध्ययन आरम्भ होता है।
— मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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