दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन भाग–11 — जीव, प्रमाता और त्रिपुटी : सीमित ज्ञाता का निर्माण
दर्शन — प्रत्यभिज्ञा दर्शन
भाग–11
— जीव, प्रमाता और त्रिपुटी : सीमित ज्ञाता का निर्माण
भाग–10
में हमने तीन मल—आणव, मायीय और कार्म—के माध्यम से
बन्धन की आन्तरिक संरचना
को समझा। अब प्रश्न थोड़ा
और सूक्ष्म है— वह कौन है जो बँधा हुआ है?
और यदि जीव सीमित
ज्ञाता है, तो— ज्ञाता,
ज्ञान और ज्ञेय की त्रिपुटी कहाँ
से आती है?
यहीं
से प्रत्यभिज्ञा दर्शन की प्रमाता-मीमांसा सामने आती है।
जीव
की समस्या
भारतीय
दर्शन में “जीव” शब्द
का प्रयोग लगभग सभी प्रमुख
परम्पराओं में मिलता है,
लेकिन उसका अर्थ समान
नहीं है।
कहीं
जीव— शरीर से अलग आत्मा है।
कहीं—
अनादि अनेक चेतन आत्माओं में से एक
है।
कहीं—
अविद्या से सीमित ब्रह्म है।
प्रत्यभिज्ञा
में जीव को समझने
के लिए हमें पहले
यह देखना होगा कि— जीव
कोई दूसरी मूल चेतना नहीं है।
उसकी
मूल सत्ता चेतन है। लेकिन उसकी
चेतना संकोचित रूप में अनुभव
होती है।
प्रमाता
क्या है? “प्रमाता” का अर्थ है—
जानने वाला। जो किसी वस्तु
को जानता है— वह प्रमाता।
जो जाना जाता है—
वह प्रमेय। जिसके माध्यम से जानना होता
है— वह प्रमाण।
इस प्रकार सामान्य ज्ञान-व्यवस्था में— प्रमाता → प्रमाण → प्रमेय का सम्बन्ध बनता
है।
लेकिन
प्रत्यभिज्ञा यहाँ एक कदम
और पीछे जाती है।
वह पूछती है—
इस
पूरी ज्ञान-व्यवस्था को प्रकाशित कौन कर रहा है? परम प्रमाता — शिव
प्रत्यभिज्ञा
का मूल उत्तर है—
परम प्रमाता शिव हैं। क्योंकि यदि ज्ञान का
प्रकाश स्वयं किसी चेतन सत्ता
में न हो, तो
प्रमाण और प्रमेय दोनों
जड़ रहेंगे।
अर्थात्—
प्रमाता केवल जानने वाला व्यक्ति नहीं; चेतना का मूल आधार है। सीमित जीव भी प्रमाता
है।
लेकिन
वह— सीमित प्रमाता है। शिव— परम प्रमाता हैं।
सीमित
प्रमाता कैसे बनता है?
अब पिछले तीन भागों की
बातें एक जगह जुड़ती
हैं।
माया
भेद का आधार देती
है। कञ्चुक शक्तियों को सीमित करते
हैं। मल आत्म-पहचान को
संकुचित करते हैं।
इसके
फलस्वरूप चेतना स्वयं को— सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, पूर्ण के रूप में
नहीं, बल्कि— “मैं यह सीमित व्यक्ति हूँ” के रूप में
अनुभव करती है। यही सीमित
प्रमाता है।
क्या
जीव केवल मन है? नहीं। मन स्वयं ज्ञेय है। हम कहते हैं— “मेरा
मन अशान्त है।”
यदि
मन को “मेरा” कहा
जा सकता है, तो
मन और उसे जानने
वाला पूर्णतः एक नहीं हो
सकते।
इसी
प्रकार— “मेरा शरीर” कहा जाता है।,
“मेरी
स्मृति” कहा जाता है।,
“मेरे
विचार” कहा जाता है।
इसलिए
शरीर, मन, विचार और
स्मृति— प्रमाता के उपकरण अथवा ज्ञेय पक्ष हो सकते हैं;
वे स्वयं अंतिम प्रमाता नहीं।
बुद्धि
भी अंतिम प्रमाता नहीं
बुद्धि
निर्णय करती है। लेकिन हम
बुद्धि के निर्णय को
भी जान सकते हैं।
कभी हम कहते हैं— “मुझे
लगा था कि मेरा निर्णय सही है, लेकिन बाद में समझ आया कि वह गलत था।” यहाँ निर्णय बदल
गया। लेकिन उस परिवर्तन को
जानने वाली चेतना बनी
रही। इसलिए बुद्धि भी— ज्ञेय हो सकती है।
अतः
परम प्रमाता की खोज हमें
मन और बुद्धि से
अधिक मूल चेतना की
ओर ले जाती है।
अहंकार
का प्रश्न अब सबसे कठिन
स्तर— अहंकार। अहंकार कहता है— “मैं
करता हूँ।” “मैं जानता हूँ।” “मैं भोगता हूँ।” यह प्रमाता के
अत्यन्त निकट दिखाई देता
है।
लेकिन
प्रत्यभिज्ञा के लिए अहंकार
और परम आत्मचेतना एक
नहीं। अहंकार सीमित व्यक्तित्व की पहचान है।
परम
चेतना— अहंता का मूल प्रकाश है।
इसलिए
अहंकार को अंतिम आत्मा
मानना आत्मस्वरूप को सीमित कर
देना होगा।
“अहम्”
और अहंकार में अन्तर -यह भेद अत्यन्त
महत्वपूर्ण है।
अहम्
— आत्मचेतना का मूल प्रकाश।
अहंकार — उस
प्रकाश का सीमित व्यक्तित्वगत
निर्धारण।
जब हम कहते हैं—
“मैं हूँ।” यह मूल आत्मबोध
है।
जब हम कहते हैं—
“मैं डॉक्टर हूँ।”, “मैं लेखक हूँ।”
, “मैं सफल हूँ।”, “मैं
असफल हूँ।” तो “मैं” किसी
विशेष पहचान से जुड़ गया।
यहीं से अहंकार की संरचना विकसित
होती है।
प्रमाता
और प्रमेय
अब एक बुनियादी द्वैत
सामने आता है— मैं
जानता हूँ। यह जाना जाता है।
यानी—
प्रमाता → प्रमेय लेकिन प्रत्यभिज्ञा पूछती है— क्या प्रमेय प्रमाता से पूर्णतः अलग है?
यदि
प्रमेय चेतना से सर्वथा बाहर
हो, तो वह चेतना
में प्रकाशित कैसे होगा?
और यदि वह चेतना
में प्रकाशित है, तो उसके
प्राकट्य का आधार क्या
है?
यहीं
आभासवाद फिर से प्रमाता-मीमांसा से जुड़ता है।
त्रिपुटी
क्या है?
सामान्य
अनुभव में तीन पक्ष
दिखाई देते हैं— ज्ञाता
— ज्ञान — ज्ञेय संस्कृत दार्शनिक भाषा में— प्रमाता
— प्रमाण/प्रमिति — प्रमेय
उदाहरण—
मैं पुस्तक पढ़ रहा हूँ।
मैं = ज्ञाता,
पढ़ने की
प्रक्रिया/ज्ञान = ज्ञान, पुस्तक = ज्ञेय यही त्रिपुटी है।
त्रिपुटी
स्वतन्त्र नहीं
प्रत्यभिज्ञा
के अनुसार यह त्रिपुटी परम
वास्तविकता का अन्तिम विभाजन
नहीं।
क्यों?
क्योंकि— ज्ञाता को भी चेतना
चाहिए। ज्ञान को भी चेतना
चाहिए। ज्ञेय का प्राकट्य भी
चेतना में होना चाहिए।
इसलिए
तीनों के पीछे— एक
ही प्रकाशमान चेतना कार्यरत है।
इसका
अर्थ क्या ज्ञाता और ज्ञेय एक ही वस्तु हैं? नहीं।
यहाँ
फिर सूक्ष्म भेद आवश्यक है।
व्यवहार में— ज्ञाता ≠ ज्ञेय। मैं पुस्तक नहीं
हूँ। मैं पेड़ नहीं हूँ।
मैं नदी नहीं हूँ।
लेकिन—
ज्ञाता और ज्ञेय दोनों का चेतन प्राकट्य एक ही परम प्रकाश पर निर्भर है।
इसलिए
प्रत्यभिज्ञा— व्यवहारगत भेद को नकारे बिना परम आधार की एकता स्थापित करती है।
ज्ञान
कहाँ घटित होता है?
अब एक और महत्वपूर्ण
प्रश्न। क्या ज्ञान बाहर से आकर
आत्मा में प्रवेश करता
है?
यदि
ऐसा हो तो चेतना
स्वयं जड़ पात्र जैसी
हो जाएगी। प्रत्यभिज्ञा की दृष्टि में
ज्ञान का मूल आधार
स्वयं चेतना है।
वस्तु
का रूप— चेतना में प्रकाशित होता है। इन्द्रियाँ केवल
उसके प्राकट्य की विशिष्ट परिस्थितियाँ
बनाती हैं।
मन उसे व्यवस्थित करता
है। बुद्धि निर्णय करती है।
लेकिन
इन सबको प्रकाशित करने
वाली सत्ता— चिति है।
ज्ञान
और चिति
इसलिए
प्रत्यभिज्ञा में ज्ञान को
केवल सूचना-संग्रह नहीं समझना चाहिए।
ज्ञान का मूल अर्थ है—
प्रकाश।
वस्तु
जानी गई क्योंकि वह
चेतना में प्रकाशित हुई।
इसीलिए— चिति
= प्रकाशमान चेतना
और—
ज्ञान = उस चेतना में किसी विशिष्ट वस्तु का प्राकट्य के रूप में
सम्बन्धित किए जा सकते
हैं।
ज्ञेय
का निर्माण कैसे होता है?
यहाँ
36 तत्त्वों का सिद्धान्त फिर
महत्वपूर्ण हो जाता है।
स्थूल वस्तु— महाभूतों से सम्बद्ध है।
उनसे
पहले— तन्मात्राएँ। फिर— मन, अहंकार, बुद्धि। और ऊपर— पुरुष,
कञ्चुक, माया।
इसलिए
किसी वस्तु को जानना केवल
आँख से उसे देख
लेना नहीं। उसके पीछे पूरा तत्त्वगत
ढाँचा सक्रिय है।
एक
उदाहरण — “वृक्ष”
मान
लीजिए सामने एक वृक्ष है।
आँख रूप ग्रहण करती है। मन उस
अनुभव को संगठित करता
है।
बुद्धि
निर्णय करती है— “यह
वृक्ष है।” स्मृति उसे पूर्व ज्ञान
से जोड़ती है। भाषा उसे “वृक्ष” नाम
देती है।
व्यक्ति
उससे सम्बन्धित अनुभव जोड़ता है। लेकिन इन सबके बीच
एक मूल तथ्य बना
रहता है— वृक्ष का सम्पूर्ण अनुभव चेतना में प्रकाशित है। यही प्रत्यभिज्ञा का
epistemic आधार है।
क्या
बाहरी वस्तु है या केवल ज्ञान? यहाँ प्रत्यभिज्ञा का
उत्तर बौद्ध विज्ञानवाद से अलग होता
है।
वह यह नहीं कहती
कि— केवल ज्ञान-क्षण हैं और बाहरी वस्तु की कोई स्थिति नहीं।
वह विश्व के तत्त्वगत प्राकट्य
को स्वीकार करती है। लेकिन साथ
ही यह भी कहती
है कि— वस्तु की परम स्वतन्त्रता नहीं।
इसलिए—
वस्तु है। लेकिन— वह चेतना से परम पृथक सत्ता नहीं है।
प्रत्यभिज्ञा
और अद्वैत वेदान्त का एक महत्वपूर्ण अन्तर
यहाँ
एक सावधानी आवश्यक है। दोनों परम्पराएँ चेतना की सर्वोच्चता स्वीकार
करती हैं।
लेकिन
उनकी विश्व-व्याख्या में सूक्ष्म अन्तर
है।
अद्वैत
वेदान्त में जगत को
मिथ्यात्व के सिद्धान्त से
समझाया जाता है।
प्रत्यभिज्ञा
में विश्व को शिव-शक्ति के वास्तविक आभास के रूप में
समझने की दिशा अधिक
स्पष्ट है।
इसलिए
प्रत्यभिज्ञा का अद्वैत— “संसार को
नकारो” पर आधारित नहीं।
बल्कि—
“संसार के भीतर शिव के प्रकाश को पहचानो” की दिशा में
जाता है।
प्रमाता की अवस्थाएँ
अब जीव की स्थिति
और सूक्ष्म होती है। प्रत्यभिज्ञा-त्रिक
परम्परा में सीमित चेतना
की विभिन्न अवस्थाओं को समझाने के
लिए— सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल जैसी श्रेणियाँ प्रयुक्त
होती हैं। इनका सम्बन्ध मल, कर्म, अनुभव
और ज्ञान की अवस्थाओं से
है। लेकिन इन्हें “तीन अलग आत्माएँ”
समझना गलत होगा।
ये—
बन्धन की अलग अवस्थाएँ हैं।
सकल - सकल
वह जीव है जो
व्यापक रूप से— ज्ञान,
कर्म, अनुभव और विषय-जगत के साथ सक्रिय
सम्बन्ध में है। वह संसार
में कर्म करता है।
भोग करता है। इच्छाएँ रखता है। विषयों को
जानता है। इसलिए सकल अवस्था में—
प्रमाता–प्रमाण–प्रमेय की त्रिपुटी अत्यन्त
सक्रिय रहती है।
प्रलयाकल
प्रलयाकल
अवस्था को केवल मृत्यु
या निद्रा के समान समझना
उचित नहीं।
यह जीव की ऐसी
स्थिति है जिसमें स्थूल
अनुभव की सक्रियता समाप्त
या संकुचित हो सकती है,
लेकिन मूल बन्धन समाप्त
नहीं होता। अर्थात्— विषय का लोप ≠ आत्मज्ञान।
यदि
जगत का अनुभव कुछ
समय के लिए न
हो, तो इससे यह
सिद्ध नहीं होता कि
जीव ने अपना परम
स्वरूप पहचान लिया।
यह अन्तर अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
विज्ञानाकल
-विज्ञानाकल
की चर्चा में ज्ञान का
पक्ष अधिक सूक्ष्म होता
है। यहाँ स्थूल कर्मात्मक सक्रियता की अपेक्षा चेतना
की एक विशिष्ट अवस्था
का प्रश्न सामने आता है।
लेकिन
अभी भी— पूर्ण शिवत्व की प्रत्यभिज्ञा नहीं हुई। इसलिए— ज्ञान
की सूक्ष्म अवस्था ≠ परम मुक्ति।
यही
आगे साधना और मोक्ष के
विवेचन में निर्णायक होगा।
क्यों
आवश्यक है यह भेद?
क्योंकि
मनुष्य अक्सर तीन अवस्थाओं को
मिला देता है— विषयों
का अभाव, मन की शान्ति, आत्मज्ञान
इन तीनों को एक मान
लेना दार्शनिक भूल होगी। कोई व्यक्ति
गहरी निद्रा में जा सकता
है। कुछ समय के लिए
विचारहीन हो सकता है।
ध्यान में विषयों का अनुभव अत्यन्त
सूक्ष्म हो सकता है।
लेकिन—
क्या उसने स्वयं को शिवरूप में पहचान लिया? यह अलग प्रश्न
है।
प्रत्यभिज्ञा
में मुक्ति की कसौटी - इसलिए मुक्ति की कसौटी केवल
यह नहीं—
मन
शांत है। न यह— विचार
नहीं हैं। न यह— कोई
अद्भुत अनुभव हुआ।
बल्कि
मूल प्रश्न है— क्या सीमित प्रमाता ने अपने परम चेतन स्वरूप को पहचान लिया?
यही
प्रत्यभिज्ञा की विशिष्ट दिशा
है।
त्रिपुटी
का अतिक्रमण
अब हम एक महत्वपूर्ण
दार्शनिक बिन्दु पर पहुँचते हैं।
मुक्ति
का अर्थ यह नहीं
कि ज्ञाता और ज्ञेय का
व्यवहारिक सम्बन्ध संसार में समाप्त हो
जाए।
मुक्त
व्यक्ति भी देखता है।
सुनता है। बोलता
है। कार्य करता है। लेकिन उसके
ज्ञान की अन्तर्दृष्टि बदल
जाती है।
वह जानता है— ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—तीनों का आधार एक ही चिति है।
यानी
त्रिपुटी व्यवहार में बनी रहती
है, लेकिन उसकी परम स्वतन्त्रता का भ्रम टूट जाता है।
यही
प्रत्यभिज्ञा का अद्वैत है
यहाँ
इस दर्शन का अद्वैत अपने
अत्यन्त परिपक्व रूप में दिखाई
देता है।
यह नहीं कहता— “ज्ञेय
को मिटा दो।”, यह नहीं कहता—
“ज्ञाता को मिटा दो।” - यह नहीं कहता—
“ज्ञान का अनुभव समाप्त कर दो।”
बल्कि
कहता है—त्रिपुटी के भीतर उस एक चिति को पहचानो जो तीनों को प्रकाशित कर रही है।
यही
प्रत्यभिज्ञा की दिशा है।
मध्वीय
द्वैत की निर्णायक आपत्ति
अब मध्वाचार्य की दृष्टि से
आपत्ति अधिक तीखी होगी।
यदि—
ज्ञाता और ज्ञेय दोनों चेतना के आभास हैं, तो क्या उनका
वास्तविक भेद केवल व्यवहारिक
रह जाएगा?
द्वैत
कहेगा— नहीं। ज्ञाता और ज्ञेय का
भेद वास्तविक है।
और जीव तथा ईश्वर
का भेद भी वास्तविक
है।
प्रत्यभिज्ञा
को अब यह स्पष्ट
करना होगा कि उसका
“अभेद”— भेद का निषेध है या भेद की परम स्वतंत्रता का निषेध?
यदि
दूसरा, तो दोनों दर्शनों
के बीच संवाद सम्भव
है। यदि पहला, तो द्वैत की
मूल आपत्ति बनी रहती है।
यही
प्रश्न आगे के तुलनात्मक
विवेचन में निर्णायक होगा।
इस
भाग का सूत्रात्मक सार
१.
शिवः परमप्रमाता। - शिव परम प्रमाता
हैं।
२.
जीवः संकुचितप्रमाता। - जीव संकुचित चेतना
के रूप में सीमित
प्रमाता है।
३.
अहंकारो न परमात्मा। - अहंकार परम आत्मा नहीं
है।
४.
प्रमाता–प्रमाण–प्रमेयत्रयं चितिप्रकाशाधीनम्।प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय—तीनों
चिति के प्रकाश पर
निर्भर हैं।
५.
त्रिपुटी व्यवहारतः भिन्ना, परमार्थतः चितिप्रकाशाधीना। त्रिपुटी व्यवहार में भिन्न है,
लेकिन परम आधार में
चिति पर निर्भर है।
६.
विषयाभावो न मोक्षः। विषयों का अभाव मोक्ष
नहीं है।
७.
ज्ञानावस्था न स्वतः प्रत्यभिज्ञा। ज्ञान की कोई विशेष
अवस्था अपने-आप प्रत्यभिज्ञा
नहीं है।
८.
प्रत्यभिज्ञा परमप्रमातृत्वस्य स्वस्वरूपबोधः। प्रत्यभिज्ञा अपने परम प्रमातृत्व
के स्वरूप का बोध है।
ये व्याख्यात्मक सूत्र-वाक्य हैं, मूल आचार्यों
के उद्धृत सूत्र नहीं।
मुख्य
निष्कर्ष
अब तक की यात्रा
में प्रत्यभिज्ञा दर्शन का बन्धन-सिद्धान्त
अधिक स्पष्ट हो गया है।
माया
ने भेद की भूमि
बनाई।
कञ्चुकों
ने अनन्त शक्तियों को सीमित किया।
मलों
ने सीमित आत्म-पहचान और
कर्मात्मक बन्धन को दृढ़ किया।
और अब उसी के
परिणामस्वरूप— परम प्रमाता → सीमित प्रमाता का अनुभव सामने
आया।
यह सीमित प्रमाता ही जीव है।
लेकिन उसका मूल चेतन आधार
नष्ट नहीं हुआ।
इसलिए
मुक्ति में कोई नई
आत्मा उत्पन्न नहीं होती। सीमित प्रमाता अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।
आज
के सन्दर्भ में विचारणीय प्रश्न
हम अपने शरीर, मन,
स्मृति, विचार, सामाजिक पहचान और जीवन-कथा
को “मैं” मानते हैं।
लेकिन
यदि ये सब किसी
न किसी स्तर पर
ज्ञेय हैं, तो— वह
कौन है जो इन सबके बदलने को जानता है?
और यदि वही चेतना
जाग्रत, स्वप्न, निद्रा, विचार, स्मृति और अनुभव—सभी
को प्रकाशित करती है, तो
क्या आत्म-पहचान वास्तव
में किसी वस्तु को
जानना है, या जानने
वाले को स्वयं पहचानना?
अगले
भाग की भूमिका
अब हम प्रत्यभिज्ञा दर्शन
के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण
और अक्सर गलत समझे जाने
वाले विषय में प्रवेश
करेंगे—शिव और शक्ति का सम्बन्ध तथा स्पन्द। अभी तक
हमने शक्ति को स्वातन्त्र्य और
विश्व-प्राकट्य के आधार के
रूप में देखा है;
अगले भाग में प्रश्न
होगा कि शिव यदि निष्क्रिय परम चेतना नहीं, बल्कि स्वातन्त्र्यपूर्ण चिति हैं, तो शक्ति उनसे अलग कैसे नहीं है? और स्पन्द को क्या वास्तव
में कोई भौतिक कम्पन
मानना चाहिए, या यह चेतना
की आत्म-गतिशीलता का
दार्शनिक सिद्धान्त है?
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KEE PERMMISSION KEE
BINA KAHEE BHEE ULLEKH KARNE KEE ANUMATI NAHEE HAI)
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