महाभारत - अध्याय 1.2 जय → भारत → महाभारत : ग्रंथ के विस्तार की परंपरा

 अध्याय 1.2

जय → भारत → महाभारत : ग्रंथ के विस्तार की परंपरा

1. प्रश्न : क्या महाभारत आरम्भ से ही “महाभारत” था?

महाभारत को आज हम जिस विशाल रूप में जानते हैं, वह लगभग एक लाख श्लोकों वाला, अठारह पर्वों में विभक्त, असंख्य आख्यानों, उपाख्यानों, संवादों, धर्मचर्चाओं, राजधर्म, मोक्षधर्म, नीति, तीर्थ, वंशावली, युद्ध और दर्शन से भरा हुआ ग्रंथ है।

लेकिन भारतीय परंपरा स्वयं हमें संकेत देती है कि इस विशाल ग्रंथ को उसकी वर्तमान व्यापकता में समझने से पहले उसके एक संक्षिप्ततर मूल आख्यान की कल्पना की जाती रही है।

यही वह स्थान है जहाँ तीन नाम सामने आते हैं— जय → भारत → महाभारत

इन तीनों को यदि केवल तीन पर्यायवाची नाम मान लिया जाए, तो इस परंपरा का गहरा अर्थ छूट जाता है।

और यदि इन्हें आधुनिक अर्थ में तीन निश्चित, स्वतंत्र, ऐतिहासिक संस्करण घोषित कर दिया जाए, तो भी हम प्रमाण से आगे निकल जाते हैं।

अतः अधिक सावधान दृष्टि यह होगी कि—

“जय → भारत → महाभारत” को महाभारत-परंपरा द्वारा अपने ही विकास और विस्तार को समझाने के लिए निर्मित अथवा संरक्षित एक पारंपरिक मॉडल के रूप में पढ़ा जाए।

यह मॉडल हमें बताता है कि एक मूल विजय/युद्ध-केंद्रित आख्यान किस प्रकार क्रमशः वंश, समाज, धर्म और अंततः व्यापक मानव-अनुभव के विश्वकोशीय आख्यान में परिवर्तित होता हुआ समझा गया।

“जय” — आरम्भिक केंद्र : विजय की कथा

महाभारत की आरम्भिक परंपरा “जय” के उद्घोष से जुड़ी है—

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥

अर्थात् नारायण, नर और सरस्वती को प्रणाम करके “जय” का उच्चारण किया जाए। यह श्लोक आज महाभारत-पाठ की परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है।

यहाँ “जय” शब्द का सामान्य अर्थ है— विजय। 

लेकिन प्रश्न है—किसकी विजय?

यदि हम केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध को देखें तो उत्तर सरल प्रतीत होगा—पाण्डवों की विजय।

लेकिन महाभारत के भीतर “विजय” का प्रश्न इतना सरल नहीं है।

कुरुक्षेत्र के अंत में विजेता कौन है? 

पाण्डव? - हाँ।

लेकिन क्या वे वास्तव में विजयी हैं?

उनके पुत्र मारे जा चुके हैं।
उनके प्रियजन मारे जा चुके हैं।
कुरुवंश लगभग नष्ट हो चुका है।
युधिष्ठिर स्वयं विजय के बाद भी शोक और अपराधबोध से भर जाते हैं।

तब “जय” का अर्थ बदलने लगता है। वह केवल युद्ध की विजय नहीं रह जाता।

वह एक गहरा प्रश्न बन जाता है— विजय क्या है?

और शायद यही वह बिंदु है जहाँ एक छोटी युद्ध-कथा आगे चलकर महाभारत बन सकती है।

“जय” का दूसरा अर्थ : धर्म की विजय?

महाभारत की पूरी कथा को देखें तो संघर्ष केवल दो सेनाओं के बीच नहीं है।

यह संघर्ष है— 

धर्म और अधर्म के बीच, कर्तव्य और मोह के बीच, सत्य और सुविधा के बीच, व्यक्ति और व्यवस्था के बीच, प्रतिज्ञा और परिणाम के बीच, न्याय और प्रतिशोध के बीच।

इसलिए “जय” को एक दार्शनिक संकेत की तरह भी पढ़ा जा सकता है— अंततः किसकी विजय होती है?

यदि उत्तर केवल “पाण्डवों की” है, तो महाभारत का दार्शनिक विस्तार समझ में नहीं आता।

लेकिन यदि प्रश्न हो— धर्म की विजय कैसे होती है, और धर्म स्वयं इतना जटिल क्यों हो जाता है?

तो महाभारत का विशाल संसार खुलने लगता है।

इस दृष्टि से “जय” महाभारत का सबसे छोटा नाम होते हुए भी उसके भीतर छिपे सबसे बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है।

“जय” से “भारत” : कथा का विस्तार

परंपरा में इसके बाद “भारत” की संज्ञा आती है। आदिपर्व की परंपरा में 24,000 श्लोकों वाली भारतसंहिता का उल्लेख मिलता है— चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम्। उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः॥

अर्थात् उपाख्यानों को छोड़कर 24,000 श्लोकों की भारतसंहिता की परंपरा का उल्लेख किया गया है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।

“जय” जहाँ एक मूल संघर्ष या विजय-केंद्रित आख्यान की ओर संकेत करता है, वहीं “भारत” एक वंश और व्यापक कथा-संसार की ओर बढ़ता है।

अब कथा केवल— “कौन जीता?” तक सीमित नहीं रहती।

अब प्रश्न उठते हैं— यह संघर्ष क्यों हुआ?  पाण्डव और कौरव कौन थे? उनका वंश क्या था? उनके पूर्वज कौन थे? राज्य की व्यवस्था कैसी थी? कुरुवंश की उत्पत्ति कैसे हुई? दुष्यन्त और शकुन्तला कौन थे? भरत कौन था? भीष्म की प्रतिज्ञा का क्या अर्थ था?

अर्थात् मूल युद्ध-कथा के चारों ओर पूर्वकथा निर्मित होने लगती है। 

यही “जय” से “भारत” की दिशा में पहला बड़ा परिवर्तन है।

“भारत” : युद्ध के पीछे का मनुष्य

“जय” में केंद्र युद्ध है।

“भारत” में केंद्र वह मानव-संसार बनने लगता है जिसने युद्ध को जन्म दिया।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

क्योंकि कोई भी युद्ध अचानक उत्पन्न नहीं होता।

उसके पीछे— पीढ़ियाँ होती हैं, वंश होते हैं, विवाह होते हैं, संधियाँ होती हैं, प्रतिज्ञाएँ होती हैं, उत्तराधिकार के प्रश्न होते हैं, सत्ता-संघर्ष होते हैं, व्यक्तिगत अहंकार होते हैं,  अपमान होते हैं, भय होते हैं, और निर्णयों की एक लंबी श्रृंखला होती है।

महाभारत का विस्तार इसी मानवीय पृष्ठभूमि को कथा में वापस लाता है।

इसलिए “भारत” को केवल “जय का बड़ा संस्करण” कहना पर्याप्त नहीं।

यह युद्ध को उसकी पूर्वपीठिका से जोड़ने वाला आख्यानात्मक विस्तार है।

भरत की कथा क्यों महत्वपूर्ण है?

यहाँ एक अत्यंत रोचक प्रश्न उठता है—

यदि मुख्य कथा पाण्डव-कौरव संघर्ष है, तो फिर दुष्यन्त-शकुन्तला और भरत की कथा क्यों?

क्योंकि “भारत” नाम स्वयं भरत-परंपरा से जुड़ता है।  भरत की कथा मुख्य युद्ध से बहुत पहले की है।

इससे महाभारत अपने वर्तमान संघर्ष को एक दीर्घ वंशीय समय में रखता है।

अर्थात्— कुरुक्षेत्र केवल एक दिन की घटना नहीं है। उसके पीछे स्मृति है। उसके पीछे वंश है। उसके पीछे पीढ़ियाँ हैं।

और उसके पीछे मनुष्य द्वारा बार-बार दोहराए जाने वाले सत्ता, संबंध और धर्म के प्रश्न हैं।

इस प्रकार “भारत” नाम स्वयं कथा को तात्कालिक युद्ध से दीर्घ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृति में ले जाता है।

“भारत” से “महाभारत” : दूसरा और अधिक बड़ा विस्तार

अब तीसरा चरण आता है— भारत → महाभारत,  यहाँ केवल वंश-कथा का विस्तार नहीं होता।

यहाँ पूरा धर्म-सांस्कृतिक विश्व कथा में प्रवेश करने लगता है।

महाभारत के वर्तमान स्वरूप में हमें मिलते हैं— सृष्टि-विचार, देवताओं की कथाएँ, ऋषियों के संवाद, तीर्थ-माहात्म्य, दानधर्म, राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म, योग, सांख्य, ब्रह्मविद्या, आत्मा और मृत्यु पर चिंतन, नीति, सामाजिक व्यवस्था ,विवाह और परिवार, युद्धनीति, राज्यशास्त्र, लोकाचार, तपस्या, भक्ति, कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष।

अब यह केवल भारतवंश की कथा नहीं रह जाती।

यह एक ऐसा ग्रंथ बन जाता है जिसमें भारतीय चिंतन की अनेक धाराएँ एक विशाल आख्यानात्मक शरीर के भीतर प्रवेश करती हैं।

यहीं “भारत” वास्तव में “महाभारत” बनता है।

“महा” का अर्थ : केवल बड़ा नहीं

यहाँ पिछले अध्याय की बात पुनः स्मरण करनी चाहिए। “महा” को केवल “बहुत बड़ा” समझना महाभारत के स्वरूप को छोटा कर देता है।

महाभारत स्वयं अपने नाम का निर्वचन करते हुए कहता है— महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते।

अर्थात् इसकी महत्ता और भारवत्ता के कारण यह महाभारत कहलाता है।

इसलिए “महा” में दो बातें साथ आती हैं— विस्तार और अर्थ-भार।

भारत से महाभारत की यात्रा का वास्तविक अर्थ यही है— कथा बढ़ी ही नहीं; कथा का अर्थ-क्षेत्र भी बढ़ा।

उपाख्यानों का प्रवेश : विस्तार की सबसे बड़ी कुंजी

महाभारत की वर्तमान संरचना को समझने के लिए “उपाख्यान” अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है।

यदि कोई ग्रंथ केवल मुख्य युद्ध-कथा होता, तो उसकी संरचना अपेक्षाकृत सीधी होती।

लेकिन महाभारत में कथा के भीतर दूसरी कथा आती है।

फिर उस कथा में कोई ऋषि किसी पुराने राजा की कथा सुनाता है।

उसमें कोई अन्य पात्र कोई और उदाहरण देता है।

इस प्रकार— कथा → उपाख्यान → उपाख्यान के भीतर कथा → संवाद → पुनः मूल कथा

का एक विशाल तंत्र निर्मित होता है। यह महाभारत की विशिष्ट संरचनात्मक पहचान है।

उदाहरण के लिए वनपर्व में पाण्डवों के वनवास के दौरान अनेक ऋषि और कथाएँ आती हैं।

युधिष्ठिर के प्रश्नों के उत्तर में प्राचीन आख्यान सुनाए जाते हैं। नल-दमयन्ती की कथा आती है। सावित्री की कथा आती है। रामोपाख्यान आता है। मार्कण्डेय के संवाद आते हैं।

इन कथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है।

वे मूल कथा के पात्रों के सामने जीवन की वैकल्पिक स्थितियाँ और धर्म के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

इसलिए उपाख्यान महाभारत को बड़ा करने का मात्र साहित्यिक उपकरण नहीं है।

वह ज्ञान के विस्तार का उपकरण है।

“जय” से “महाभारत” : कथा से ज्ञान-संहिता तक

अब इस क्रम को एक सरल सूत्र में समझ सकते हैं— 

जय - क्या हुआ?

भारत - यह क्यों हुआ? इसके पीछे कौन-सा वंश, कौन-सा समाज और कौन-सी सत्ता थी?

महाभारत - मनुष्य ऐसी परिस्थितियों में क्या करे? धर्म क्या है? सत्ता क्या है? जीवन क्या है? मृत्यु क्या है? मुक्ति क्या है?

इस प्रकार—

जय = घटना का केंद्र
भारत = वंश और समाज का विस्तार
महाभारत = मानव और धर्म के प्रश्नों का विस्तार

यह पारंपरिक क्रम की एक अत्यंत उपयोगी दार्शनिक व्याख्या हो सकती है।

लेकिन क्या यह सचमुच तीन ऐतिहासिक संस्करण थे?

अब शोध की दृष्टि से सबसे कठिन प्रश्न।

क्या वास्तव में—

  1. पहले “जय” नाम का एक छोटा ग्रंथ था,

  2. फिर “भारत” नाम का 24,000 श्लोकों वाला ग्रंथ बना,

  3. और फिर “महाभारत” नाम का लगभग एक लाख श्लोकों वाला ग्रंथ?

भारतीय परंपरा इस दिशा में संकेत देती है।

लेकिन आधुनिक ऐतिहासिक शोध के लिए यह प्रश्न अधिक जटिल है।

क्योंकि हमारे पास “जय” की कोई स्वतंत्र प्राचीन पांडुलिपि उपलब्ध नहीं है जिसे हम निश्चित रूप से उस मूल ग्रंथ के रूप में सामने रख सकें।

इसी प्रकार 24,000 श्लोकों वाली “भारतसंहिता” का उल्लेख हमें परंपरा में मिलता है, परंतु उसके स्वतंत्र ऐतिहासिक पाठ का उपलब्ध होना अलग प्रश्न है।

इसलिए शोध की दृष्टि से तीन बातों को अलग रखना आवश्यक है— 

परंपरागत स्मृति - परंपरा कहती है कि ग्रंथ का क्रमशः विस्तार हुआ।

पाठीय संरचना - वर्तमान महाभारत में अनेक स्तरों और विविध प्रकार की सामग्री के प्रमाण दिखाई देते हैं।

ऐतिहासिक पुनर्निर्माण - आधुनिक शोध यह निर्धारित करने का प्रयास करता है कि इन स्तरों का निर्माण, संकलन और प्रसार किस ऐतिहासिक प्रक्रिया से हुआ।

इन तीनों को समान मान लेना उचित नहीं।

परंपरा को अस्वीकार करना भी उतना ही गलत है

यहाँ एक दूसरी अति से भी बचना होगा।

यदि आधुनिक आलोचना यह कहे— 

“चूँकि हमें मूल जय की पांडुलिपि नहीं मिली, इसलिए जय → भारत → महाभारत की परंपरा निरर्थक है।”

तो यह भी सही पद्धति नहीं होगी।

क्यों? - क्योंकि किसी परंपरा का महत्व केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे पास उसकी मूल पांडुलिपि बची है या नहीं।

परंपरा स्वयं एक ऐतिहासिक साक्ष्य है।

वह बताती है कि भारतीय स्मृति ने अपने सबसे बड़े आख्यान को कैसे समझा

इसलिए— जय → भारत → महाभारत को प्रमाणित आधुनिक संपादकीय इतिहास न मानते हुए भी, इसे महाभारत की पारंपरिक आत्म-व्याख्या के रूप में अत्यंत गंभीरता से लेना चाहिए।

यही संतुलित पद्धति होगी।

“जय” का आकार छोटा, प्रश्न बड़ा

यहाँ एक दार्शनिक विरोधाभास दिखाई देता है।

यदि “जय” मूलतः युद्ध-विजय की कथा थी, तो उसका आकार छोटा हो सकता है।

लेकिन उसमें प्रश्न बहुत बड़ा था— धर्म की विजय कैसे होती है?

जैसे-जैसे इस प्रश्न का उत्तर खोजा गया, कथा फैलती गई। क्योंकि धर्म का उत्तर देने के लिए केवल युद्ध बताना पर्याप्त नहीं था।

धर्म को समझाने के लिए चाहिए— परिवार, राज्य, समाज,  इतिहास, व्यक्ति, संबंध, कर्तव्य, मृत्यु, कर्म, परिणाम।

इस प्रकार संभव है कि परंपरा में “विस्तार” केवल साहित्यिक वृद्धि नहीं, बल्कि प्रश्न की गहराई के कारण कथा का विस्तार भी हो।

यह महाभारत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।

भगवद्गीता : विस्तार का निर्णायक उदाहरण

इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए भगवद्गीता अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण है। कुरुक्षेत्र का युद्ध होने वाला है।

अर्जुन मोहग्रस्त है।

यदि कथा केवल युद्ध का वृत्तांत होती, तो कुछ श्लोकों में अर्जुन की स्थिति और युद्ध का आरम्भ बताया जा सकता था।

लेकिन महाभारत यहाँ रुकता है। अर्जुन पूछता है— मेरा कर्तव्य क्या है?

और इस छोटे-से प्रश्न से— आत्मा, कर्म, ज्ञान, योग, संन्यास, प्रकृति, पुरुष, ईश्वर, भक्ति, लोकसंग्रह  जैसे प्रश्न खुल जाते हैं।

अर्थात् एक युद्ध-क्षण से दर्शन का विराट संसार निकलता है।

यही “जय से महाभारत” की प्रकृति को समझने का अत्यंत सुंदर उदाहरण है।

कथा छोटी थी। प्रश्न बड़ा था। और प्रश्न बड़ा हुआ तो ग्रंथ का अर्थ-क्षेत्र भी विशाल हुआ।

शान्तिपर्व : युद्ध के बाद भी कथा समाप्त क्यों नहीं होती?

यदि महाभारत केवल युद्ध की कथा होता, तो दुर्योधन की मृत्यु के साथ कथा का अंत लगभग स्वाभाविक होता।

लेकिन महाभारत का सबसे बड़ा विस्तार युद्ध के बाद दिखाई देता है।

भीष्म शरशय्या पर हैं। युधिष्ठिर विजयी हैं। लेकिन युधिष्ठिर प्रसन्न नहीं हैं।

अब प्रश्न है— राजा कैसे शासन करे?

फिर— धर्म क्या है?

फिर— आपत्ति में धर्म क्या है?

फिर— मोक्ष क्या है?

और यहाँ से शान्तिपर्व तथा अनुशासनपर्व का विराट चिंतन खुलता है। यह बताता है कि महाभारत का वास्तविक विषय युद्ध से बड़ा है।

युद्ध केवल वह घटना है जिसने उन प्रश्नों को विस्फोटित किया।

इसलिए “विस्तार” को केवल जोड़ना न समझें

महाभारत के विकास को इस प्रकार समझना बहुत सरल होगा— 

मूल कथा थी → फिर उसमें दूसरी कथाएँ जोड़ दी गईं → फिर और कथाएँ जोड़ दी गईं।

लेकिन यह दृष्टि महाभारत की संरचनात्मक बुद्धिमत्ता को कम कर देती है।

अधिक गहरी दृष्टि यह पूछेगी— 

इन कथाओं को किस प्रश्न के कारण जोड़ा गया?

नल-दमयन्ती क्यों?  सावित्री क्यों? रामोपाख्यान क्यों? विदुरनीति क्यों? सनत्सुजातीय क्यों? भगवद्गीता क्यों?

मोक्षधर्म क्यों? इन सभी को एक साथ देखने पर पता चलता है कि महाभारत अपने मुख्य संघर्ष को मानवीय जीवन के अनेक आयामों से जोड़ता है।

इसलिए उपाख्यान महाभारत के लिए “अतिरिक्त सामग्री” नहीं हैं। वे उसके विचार-विस्तार के अंग हैं।

“भारत” से “विश्व” की ओर

एक और परिवर्तन यहाँ दिखाई देता है। “भारत” का केंद्र भरतवंश है। लेकिन “महाभारत” में प्रश्न केवल भरतवंश के नहीं रहते।

वहाँ पूछा जाता है— मनुष्य का धर्म क्या है?  राजा का धर्म क्या है? स्त्री की स्थिति क्या है? मृत्यु के बाद क्या? कर्म का परिणाम क्या? मोक्ष क्या? सत्य क्या? अहिंसा और युद्ध का संबंध क्या?  दान क्या? तप क्या? योग क्या?

ये प्रश्न किसी एक वंश तक सीमित नहीं हैं।

इस प्रकार— भारत की कथा मानव की कथा बन जाती है। यही “महाभारत” की महत्ता है।

एक सावधानी : “बाद में जोड़ा गया” = “महत्त्वहीन” नहीं

आधुनिक पाठालोचन में किसी अंश को अपेक्षाकृत बाद की परत मान लेने पर कभी-कभी एक मानसिक समस्या उत्पन्न होती है— “यदि यह बाद में जुड़ा, तो यह मूल नहीं है; अतः कम महत्वपूर्ण है।”

यह निष्कर्ष आवश्यक नहीं।

किसी ग्रंथ की परंपरा में बाद में जुड़ी सामग्री भी उस परंपरा की बौद्धिक यात्रा का महत्वपूर्ण प्रमाण हो सकती है।

यदि महाभारत में किसी काल में मोक्ष, योग, राजधर्म या तीर्थ संबंधी सामग्री विस्तृत हुई, तो वह हमें उस काल की चिंतन-प्रवृत्तियों के बारे में बताती है।

इसलिए हमें दो प्रश्न अलग रखने चाहिए— क्या यह अंश प्रारंभिक है?

और क्या यह अंश महाभारत की परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है?

दोनों प्रश्नों के उत्तर एक जैसे होना आवश्यक नहीं।

“जय → भारत → महाभारत” को एक चेतना-विस्तार के रूप में पढ़ना

यदि इस क्रम को दार्शनिक रूप में देखें तो एक अत्यंत सुंदर संरचना सामने आती है—

जय - घटना- 

भारत - घटना के पीछे का समाज और वंश - 

महाभारत - घटना के भीतर छिपा धर्म और मानव-अस्तित्व

इसलिए यह केवल ग्रंथ का आकार बढ़ने की कहानी नहीं है।

यह दृष्टि के विस्तार की कहानी है।

पहले मनुष्य पूछता है— कौन जीता?

फिर पूछता है— युद्ध क्यों हुआ?

फिर पूछता है— ऐसा समाज क्यों बना?

और अंततः पूछता है— मनुष्य को ऐसी परिस्थितियों में करना क्या चाहिए?

यही वह बिंदु है जहाँ महाभारत इतिहास-स्मृति से दर्शन की ओर बढ़ता है।

“जय” और “धर्म” का संबंध 

यहाँ महाभारत की एक प्रसिद्ध पंक्ति को स्मरण करना उपयोगी है— यतो धर्मस्ततो जयः।

अर्थ— जहाँ धर्म है, वहीं जय है।

अब यदि “जय” को महाभारत की प्रारंभिक संज्ञा के रूप में और “धर्म” को उसके केंद्रीय प्रश्न के रूप में साथ रखें, तो एक गहरा संबंध दिखाई देता है।

“जय” का प्रश्न अंततः “धर्म” के प्रश्न से जुड़ जाता है।

लेकिन महाभारत का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि वह धर्म को सरल नहीं बनाता।

यदि धर्म सरल होता तो— द्रोण का धर्म क्या था?  भीष्म का धर्म क्या था?  कर्ण का धर्म क्या था? युधिष्ठिर का धर्म क्या था? अर्जुन का धर्म क्या था? कृष्ण का धर्म क्या था? द्रौपदी के लिए धर्म क्या था?

यही जटिलता “जय” को एक साधारण विजय-कथा से निकालकर धर्म-संकट के महाआख्यान में बदल देती है।

एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक पठन

“जय → भारत → महाभारत” को हम तीन चरणों के रूप में पढ़ सकते हैं—

प्रथम चरण : संघर्ष - जय - मनुष्य संघर्ष करता है।

द्वितीय चरण : स्मृति - भारत - वह संघर्ष को अपने वंश, समाज और इतिहास की स्मृति में रखता है।

तृतीय चरण : विवेक - महाभारत - वह संघर्ष से धर्म, नीति, दर्शन और जीवन के प्रश्न निकालता है।

इस अर्थ में महाभारत केवल युद्ध को याद नहीं करता।

वह युद्ध से अर्थ निकालने का प्रयास करता है।  और शायद यही कारण है कि वह केवल युद्ध का आख्यान न रहकर सभ्यता का बौद्धिक दस्तावेज बन जाता है।

क्या “जय” सचमुच केवल 8,800 श्लोक था?

परंपरा में “जय” से संबंधित 8,800 श्लोकों की प्रसिद्ध संख्या मिलती है। यह संख्या महाभारत के विकास की पारंपरिक व्याख्या में महत्वपूर्ण है।

लेकिन शोध की दृष्टि से इसे सावधानी से ग्रहण करना चाहिए।

हमें यह नहीं कहना चाहिए— “निश्चित रूप से इतना ही मूल ग्रंथ था।”

अधिक उचित कथन होगा— परंपरा एक अपेक्षाकृत संक्षिप्त ‘जय’ की स्मृति रखती है और उसके बाद ‘भारत’ तथा ‘महाभारत’ के क्रमशः विस्तृत रूपों की कल्पना करती है।

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि हमारा उद्देश्य परंपरा को नकारना नहीं, बल्कि उसके कथन की प्रकृति को ठीक-ठीक पहचानना है।

23. तीन नामों की एक तुलनात्मक सारणी

नाममुख्य संकेतकथा का केंद्रव्यापक अर्थ
जयविजयसंघर्ष/युद्धधर्म की विजय का प्रश्न
भारतभरत/भरतवंशवंश और संघर्ष की पृष्ठभूमिसामाजिक-राजनीतिक स्मृति
महाभारतमहत्त्व + भारवत्त्वसम्पूर्ण मानव-संसारधर्म, दर्शन, नीति और अस्तित्व

यह तालिका ऐतिहासिक संस्करणों की कठोर पुनर्रचना नहीं है। यह परंपरागत विकास की व्याख्यात्मक संरचना है।

इस परंपरा का सबसे बड़ा महत्व

अब हम उस बिंदु पर पहुँचते हैं जहाँ “जय → भारत → महाभारत” की परंपरा हमारे पूरे शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह हमें सिखाती है कि महाभारत को एक स्थिर वस्तु की तरह पढ़ना उचित नहीं।  यह एक परंपरा है।

और परंपरा का अर्थ केवल पुराने शब्दों को सुरक्षित रखना नहीं।

परंपरा का अर्थ है— स्मृति का निरंतर पुनर्पाठ।

एक पीढ़ी युद्ध को याद करती है। दूसरी उसके पीछे की कथा खोजती है। तीसरी उसमें धर्म का प्रश्न देखती है।

चौथी उसमें दर्शन खोजती है।

और अंततः एक विशाल ग्रंथ बन जाता है जिसमें अनेक युगों की बौद्धिक स्मृति एक-दूसरे पर आरोपित होती दिखाई देती है।

यही कारण है कि महाभारत को केवल उसके “मूल” की खोज में सीमित करना भी जोखिमपूर्ण है।

क्योंकि— 

महाभारत केवल जो कभी कहा गया था वह नहीं है; महाभारत वह भी है जिसे भारतीय परंपरा ने सदियों तक इस कथा के माध्यम से कहना आवश्यक समझा।

लेकिन शोधकर्ता की सीमा कहाँ होगी?

यहाँ हमारे शोध की एक कठोर सीमा निर्धारित करनी आवश्यक है।

हम किसी भी अंश को केवल इसलिए “मूल” नहीं मानेंगे कि वह परंपरा में है।

और किसी अंश को केवल इसलिए “बाद का” कहकर अस्वीकार भी नहीं करेंगे कि उसकी भाषा या विषय किसी अन्य काल की ओर संकेत करता है।

हर अंश के लिए अलग-अलग प्रश्न होंगे—

  1. वह पाठ में कहाँ है?

  2. उसका कथन-स्तर क्या है?

  3. उसकी भाषा कैसी है?

  4. उसका विषय क्या है?

  5. उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि क्या है?

  6. क्या उसके समानांतर अन्य भारतीय ग्रंथों में सामग्री मिलती है?

  7. पांडुलिपि-परंपरा क्या बताती है?

  8. आधुनिक पाठालोचन उसकी स्थिति को कैसे देखता है?

  9. और सबसे महत्वपूर्ण—महाभारत की समग्र संरचना में उसका कार्य क्या है?

इस पद्धति से हम न अंध-परंपरावादी होंगे, न अंध-आलोचनावादी।

निष्कर्ष : “जय” से “महाभारत” तक

अब “जय → भारत → महाभारत” को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है— 

जय संघर्ष की स्मृति है; भारत उस संघर्ष को वंश और समाज में स्थापित करता है; और महाभारत उस संघर्ष से मनुष्य, धर्म, सत्ता, कर्म, नियति और मोक्ष के सार्वभौम प्रश्न निकालता है।

लेकिन यह बात फिर दोहराना आवश्यक है कि यह एक व्याख्यात्मक मॉडल है, न कि बिना शेष प्रमाण के आधुनिक अर्थ में प्रमाणित तीन क्रमिक संस्करणों का इतिहास।

इसलिए हमारा निष्कर्ष होगा— 

“जय → भारत → महाभारत” को महाभारत के परंपरागत आत्म-विकास की स्मृति के रूप में पढ़ना चाहिए।

यह स्मृति हमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य बताती है—

महाभारत की विशालता आकस्मिक नहीं है।

वह एक ऐसे मूल प्रश्न के चारों ओर बढ़ती हुई कथा-परंपरा है जो लगातार अधिक व्यापक होता गया।

आरम्भ में प्रश्न था— जय किसकी होगी?

फिर प्रश्न हुआ— यह युद्ध क्यों हुआ?

फिर— यह वंश और समाज ऐसा कैसे बना?

फिर— धर्म क्या है?

और अंततः— मनुष्य को जीवन, कर्म, सत्ता, मृत्यु और नियति के बीच कैसे जीना चाहिए?

यही वह यात्रा है जो— जय से भारत और भारत से महाभारत तक पहुँचती है।

और इसीलिए “महाभारत” को केवल एक विशाल युद्ध-कथा कहना उसके विकास की पूरी परंपरा को न देख पाना है।

महाभारत का वास्तविक विस्तार श्लोकों की संख्या में जितना है, उससे कहीं अधिक प्रश्नों की संख्या और गहराई में है।

अगले उपाध्याय की भूमिका

अब एक और प्रश्न सामने आता है। 

यदि महाभारत वास्तव में क्रमशः विस्तृत हुआ, तो उसका वर्तमान आकार कितना है?

अठारह पर्वों की संरचना कैसे बनी?

एक लाख श्लोकों की प्रसिद्ध धारणा कहाँ से आती है?

क्या सभी पांडुलिपियों में वही पाठ है?

क्या महाभारत की विशालता को केवल “एक लाख श्लोक” कह देना पर्याप्त है?

इन प्रश्नों का परीक्षण अगले उपाध्याय में होगा—

महाभारत का आकार : एक ग्रंथ या विकसित होता हुआ ग्रंथ-संसार?

यहीं से हम “महाभारत कितना बड़ा है?” से आगे बढ़कर यह पूछेंगे— “महाभारत जैसा विशाल क्यों है?”

— मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

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