महाभारत - अध्याय 1.3 महाभारत का आकार : एक ग्रंथ या विकसित होता हुआ ग्रंथ-संसार?

 अध्याय 1.3

महाभारत का आकार : एक ग्रंथ या विकसित होता हुआ ग्रंथ-संसार?

प्रश्न की शुरुआत : “महाभारत कितना बड़ा है?”

जब हम कहते हैं कि महाभारत संसार के सबसे बड़े महाकाव्यात्मक ग्रंथों में से एक है, तो सामान्यतः हमारे मन में उसकी प्रसिद्ध संख्या आती है— लगभग एक लाख श्लोक।

परंतु शोध की दृष्टि से यह उत्तर पर्याप्त नहीं है।

क्योंकि यहाँ पहला प्रश्न यह होना चाहिए— एक लाख श्लोक किस पाठ में?

और उससे भी पहले— हम “महाभारत” से किस पाठ को समझ रहे हैं?

यदि किसी आधुनिक पुस्तक की निश्चित मुद्रित प्रति हो, तो उसके पृष्ठों और शब्दों की संख्या बताना सरल है। लेकिन महाभारत का इतिहास किसी आधुनिक लेखक द्वारा एक समय में लिखी गई पुस्तक का इतिहास नहीं है।

यह एक दीर्घ पाठ-परंपरा है।

इसलिए “महाभारत का आकार” पूछना वास्तव में तीन प्रश्न पूछना है—

  1. परंपरा महाभारत के आकार के बारे में क्या कहती है?

  2. उपलब्ध पाठ हमें क्या बताते हैं?

  3. इन दोनों के बीच संबंध को कैसे समझा जाए?

यहीं से “महाभारत” एक पुस्तक से बढ़कर ग्रंथ-संसार दिखाई देने लगता है।

एक लाख श्लोक : परंपरा की प्रसिद्ध धारणा

महाभारत की प्रसिद्ध परंपरा उसे शतसाहस्री संहिता के रूप में देखती है।

“शतसाहस्री” अर्थात् लगभग एक लाख श्लोकों वाली संहिता।

आदिपर्व में स्वयं महाभारत के विस्तार और उसके महत्त्व की चर्चा आती है। परंपरा में यह भी कहा गया है कि देवताओं के सामने इसका भार किया गया और अन्य वेदों की तुलना में इसकी महत्ता को रूपकात्मक ढंग से व्यक्त किया गया।

प्रसिद्ध परंपरागत कथन है कि— भारत का भार उसके महत्त्व और भारवत्त्व के कारण है।

यहाँ “एक लाख” संख्या को केवल गणितीय सूचना की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।

यह महाभारत की विशालता का सांस्कृतिक प्रतीक भी है।

“एक लाख” का अर्थ : क्या ठीक 100,000 श्लोक?

यहाँ अत्यंत आवश्यक शोध-सावधानी है।

महाभारत की परंपरा में लगभग एक लाख श्लोकों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर उपलब्ध पांडुलिपि में ठीक 100,000 श्लोक ही हैं।

विभिन्न पाठ-परंपराओं में— श्लोकों की संख्या में अंतर है, पाठांतर हैं, कुछ अंश कहीं विस्तृत हैं, कहीं संक्षिप्त, कुछ स्थानों पर पाठ का क्रम भी भिन्न दिखाई देता है।

इसलिए “एक लाख” को एक परंपरागत आदर्श आकार की तरह समझना अधिक उचित है, न कि प्रत्येक पांडुलिपि पर लागू होने वाली गणितीय सीमा की तरह।

यह अंतर छोटा दिखाई देता है, लेकिन शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अठारह पर्व : विशालता की वास्तुकला

महाभारत की विशालता केवल श्लोकों की संख्या से नहीं बनती।

उसकी सबसे बड़ी संरचनात्मक विशेषता है— अठारह पर्व। 

परंपरागत रूप से महाभारत को निम्नलिखित अठारह पर्वों में विभाजित किया जाता है—

आदिपर्व, सभापर्व , वनपर्व , विराटपर्व, उद्योगपर्व, भीष्मपर्व, द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, सौप्तिकपर्व, स्त्रीपर्व, शांतिपर्व, अनुशासनपर्व, अश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व, स्वर्गारोहणिकपर्व

इन पर्वों को केवल अध्यायों की तरह पढ़ना महाभारत की वास्तु को छोटा कर देता है।

हर पर्व का अपना— समय, कथानक, भाव, दार्शनिक प्रश्न, राजनीतिक संदर्भ, और आख्यानात्मक कार्य है।

इसलिए महाभारत को समझना केवल “क्या हुआ?” पूछना नहीं है।

यह पूछना भी है— किस पर्व में कौन-सा प्रश्न केंद्र में आ रहा है और वह पूरे महाभारत के अर्थ को कैसे बदल रहा है?

आदिपर्व : कथा का बीज

आदिपर्व को केवल “आरम्भिक कहानी” कहना पर्याप्त नहीं।

यह महाभारत की वंशीय, ब्रह्माण्डीय और कथात्मक पृष्ठभूमि निर्मित करता है।

यहाँ— सृष्टि, वंश, देवता, ऋषि, राजा, भरत, कुरु, पाण्डु, धृतराष्ट्र, पाण्डव, कौरव आदि अनेक स्तर एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

अर्थात् कथा युद्ध से शुरू नहीं होती। युद्ध से बहुत पहले से एक संसार निर्मित किया जाता है।

सभापर्व : सत्ता का मंच

सभापर्व में कथा एक नए केंद्र में प्रवेश करती है— राज्य और सत्ता।  राजसूय, सभा, द्यूत और अपमान की घटनाएँ केवल कथानक नहीं हैं।

वे प्रश्न उठाती हैं— राज्य किसका? सत्ता की वैधता क्या? द्यूत की मर्यादा क्या? राजा की सीमा क्या? सभा में धर्म क्या? मौन रहने वाले की जिम्मेदारी क्या?

इस प्रकार महाभारत का आकार बढ़ते हुए राजनीतिक दर्शन को भी समाहित करने लगता है।

वनपर्व : कथा का सबसे बड़ा विस्तार

वनपर्व महाभारत की संरचना को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पाण्डव वन में हैं। 

यदि ग्रंथ केवल युद्ध की तैयारी होता, तो यहाँ कथा अपेक्षाकृत संक्षिप्त हो सकती थी।

लेकिन ऐसा नहीं होता। वनपर्व में— ऋषि आते हैं,  तीर्थ आते हैं, पुरानी कथाएँ आती हैं, उपाख्यान आते हैं, दर्शन आता है, नीति आती है, धर्म के उदाहरण आते हैं।

नल-दमयन्ती, सावित्री आदि कथाएँ केवल मुख्य कथा से विराम नहीं हैं। वे पाण्डवों की वर्तमान स्थिति को अन्य मानवीय परिस्थितियों से जोड़ती हैं।

अर्थात् वन महाभारत के लिए केवल भौगोलिक स्थान नहीं है। वह ज्ञान का विस्तार-क्षेत्र है।

युद्ध के पर्व : कथा का संकुचन और तीव्रता

भीष्मपर्व से युद्ध आरम्भ होता है। इसके बाद— द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व आदि में कथा की गति तीव्र हो जाती है।

यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास है।

युद्ध शुरू होते ही महाभारत का कथानक कई स्थानों पर अधिक तीव्र हो जाता है, लेकिन युद्ध के भीतर भी— वीरता, नीति, छल, प्रतिज्ञा, धर्म, कर्तव्य, मृत्यु के प्रश्न लगातार खुलते जाते हैं।

अर्थात् कथा का बाहरी आकार चाहे युद्ध की गति से आगे बढ़ रहा हो, उसका दार्शनिक भार बढ़ता जाता है।

9. भगवद्गीता : महाभारत के भीतर एक स्वतंत्र दार्शनिक ब्रह्माण्ड

भीष्मपर्व के भीतर भगवद्गीता का स्थान महाभारत की संरचना को समझने के लिए निर्णायक है।

कुरुक्षेत्र में युद्ध आरम्भ होने वाला है। अर्जुन अपने संबंधियों को सामने देखकर विषादग्रस्त होता है।

फिर एक प्रश्न उठता है— क्या मुझे युद्ध करना चाहिए?

यह प्रश्न कुछ ही क्षणों में बदल जाता है— आत्मा क्या है?, कर्म क्या है?, ज्ञान क्या है?,योग क्या है?, संन्यास क्या है?भक्ति क्या है? प्रकृति और पुरुष क्या हैं? ईश्वर क्या है? मोक्ष क्या है?

यानी महाभारत की कथात्मक संरचना के भीतर एक ऐसा दार्शनिक ग्रंथ प्रकट होता है जिसका प्रभाव पूरे भारतीय दर्शन पर पड़ा।

यह महाभारत की “विस्तार-क्षमता” का सर्वोत्तम उदाहरण है।

स्त्रीपर्व : विजय के बाद का शोक

युद्ध समाप्त हो गया।  लेकिन महाभारत समाप्त नहीं हुआ।

स्त्रीपर्व में युद्ध का वर्णन विजेताओं की दृष्टि से नहीं, बल्कि शोक करती हुई स्त्रियों की दृष्टि से सामने आता है।

यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

युद्ध में जिस घटना को “विजय” कहा गया था, वही अब— विधवापन, मातृत्व का शोक, पुत्र-वियोग, परिवार के विनाश के रूप में दिखाई देती है।

इससे महाभारत का आकार केवल भौतिक रूप से नहीं बढ़ता। उसकी नैतिक दृष्टि भी बहुआयामी होती है।

शान्तिपर्व : युद्ध के बाद दर्शन का महासागर

महाभारत की विशालता का सबसे बड़ा प्रमाण शायद शान्तिपर्व है। युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर के मन में प्रश्न उठता है— क्या यह विजय वास्तव में विजय है?

भीष्म शरशय्या पर हैं। अब युद्ध का आख्यान धीरे-धीरे धर्म के दार्शनिक विवेचन में बदल जाता है।

राजधर्म। आपद्धर्म। मोक्षधर्म। जीवन। मृत्यु। कर्तव्य। सत्य। दान। तप। आत्मज्ञान।

यहाँ महाभारत एक युद्ध-कथा से निकलकर लगभग एक धर्म-दर्शन-संहिता बन जाता है।

अनुशासनपर्व : धर्म का सूक्ष्म परीक्षण

अनुशासनपर्व शान्तिपर्व की चिंतनधारा को आगे बढ़ाता है। यहाँ धर्म के अनेक व्यावहारिक पक्षों पर चर्चा होती है।

दान, आचार, अहिंसा, कर्तव्य और जीवन-मूल्यों के प्रश्न आते हैं। इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है— महाभारत युद्ध के परिणाम को केवल राजनीतिक परिणाम के रूप में नहीं देखता।

वह युद्ध को धर्म की परीक्षा बनाता है।

अश्वमेधिक से स्वर्गारोहण तक : विजय से विरक्ति

अश्वमेधिकपर्व में राज्य की पुनर्स्थापना है। आश्रमवासिकपर्व में वृद्धावस्था और वनगमन है।

मौसलपर्व में यादववंश का विनाश है। महाप्रस्थानिकपर्व में पाण्डव राज्य छोड़ देते हैं।

स्वर्गारोहणिकपर्व में युधिष्ठिर की अंतिम यात्रा आती है।

यहाँ एक अत्यंत गहरी संरचनात्मक रेखा दिखाई देती है— 

राज्य प्राप्त हुआ → राज्य स्थापित हुआ → राज्य छोड़ा गया। और अंततः— विजय → वैराग्य → मृत्यु → अंतिम परीक्षा।

यदि महाभारत केवल राज्य प्राप्त करने की कथा होता, तो उसका अंत राज्याभिषेक पर होना चाहिए था।

लेकिन उसका अंत स्वर्गारोहण की ओर जाता है। इससे स्पष्ट है— महाभारत का अंतिम विषय सत्ता नहीं, सत्ता से परे मनुष्य का प्रश्न है।

महाभारत में केवल एक कथा नहीं है

अब हम उस प्रश्न पर लौटें जिससे इस उपाध्याय की शुरुआत हुई थी। क्या महाभारत एक ग्रंथ है? - हाँ।

लेकिन यह “एक कहानी” नहीं है। यह— कथाओं का एक संगठित ब्रह्माण्ड है।

इसमें मुख्य कथा है।  उसके भीतर उपकथाएँ हैं। उनके भीतर उदाहरण हैं। उनमें संवाद हैं। संवादों में दर्शन है।

दर्शन में पुनः कथाएँ हैं। यह संरचना आधुनिक उपन्यास की रैखिक संरचना से भिन्न है।

महाभारत को पढ़ना कई बार ऐसा है जैसे हम एक विशाल वृक्ष को देखें—

एक तना। अनेक शाखाएँ। असंख्य उपशाखाएँ। लेकिन जड़ एक ही कथा-संसार में।

कथा के भीतर कथा : एक “फ्रेम” नहीं, ज्ञान की पद्धति

महाभारत की कथा-शैली में कथाकारों की अनेक परतें मिलती हैं।

उग्रश्रवा सूत नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों को कथा सुनाते हैं।

उसके भीतर वैशम्पायन जनमेजय को कथा सुना रहे हैं।

और उस कथा के भीतर फिर अनेक ऋषि, राजा और पात्र अपनी-अपनी कथाएँ कहते हैं।

इसका परिणाम यह होता है कि पाठक को एक ही घटना कई दृष्टियों से देखने का अवसर मिलता है।

यह केवल साहित्यिक कौशल नहीं। यह एक प्रकार की ज्ञानमीमांसीय पद्धति है।

क्योंकि यदि एक घटना के अनेक कथन संभव हैं, तो पाठक को स्वयं विचार करना पड़ता है— 

सत्य किसमें है? किसकी दृष्टि सीमित है? कौन क्या छिपा रहा है? कौन किस परिस्थिति से बोल रहा है?

इस प्रकार महाभारत की संरचना स्वयं पाठक को विवेकशील पाठक बनाती है।

आकार का दूसरा अर्थ : विषयों की बहुलता

यदि महाभारत की विषय-सूची बनाई जाए तो उसका आकार और अधिक चौंकाने वाला दिखाई देगा।

यहाँ—  इतिहास- स्मृति है राजवंश, युद्ध, राज्य, भूगोल। आख्यान है राजाओं और ऋषियों की कथाएँ।

धर्म है - कर्तव्य और आचार।

दर्शन है - आत्मा, कर्म, मोक्ष, ब्रह्म, योग।

राजनीति है - राजधर्म, दण्डनीति, राज्यव्यवस्था।

समाज है - वर्ण, आश्रम, परिवार, विवाह, दान, सामाजिक संबंध।

मनोविज्ञान है - मोह, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, भय, अपराधबोध।

आध्यात्मिकता है - योग, तप, भक्ति, ज्ञान, मोक्ष।

इसलिए महाभारत को केवल “महाकाव्य” कहना उसके विषय-विस्तार को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं करता।

क्या इसे विश्वकोश कहना उचित है?

कभी-कभी महाभारत को “encyclopedic” अर्थात् विश्वकोशीय ग्रंथ कहा जाता है।

यह शब्द उपयोगी है, लेकिन सावधानी से। 

क्योंकि आधुनिक विश्वकोश में विषय अलग-अलग शीर्षकों में व्यवस्थित होते हैं।

महाभारत में ज्ञान कथा के भीतर जीवित है।

राजधर्म किसी सूखी परिभाषा के रूप में नहीं आता। वह युधिष्ठिर के संकट में आता है।

कर्म किसी शब्दकोशीय प्रविष्टि की तरह नहीं आता। वह अर्जुन के प्रश्न में आता है।

धर्म किसी एक नियम में समाप्त नहीं होता। वह भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृष्ण, युधिष्ठिर, द्रौपदी और अर्जुन के निर्णयों में संघर्ष करता है।

इसलिए महाभारत को— कथात्मक विश्वकोश कहना अधिक उपयुक्त होगा।

“ग्रंथ” और “ग्रंथ-संसार” में अंतर

अब इस अध्याय के शीर्षक का सबसे महत्वपूर्ण शब्द सामने आता है— ग्रंथ-संसार।

ग्रंथ वह है जिसे हम एक पाठ के रूप में पढ़ते हैं। ग्रंथ-संसार वह है जिसमें— अनेक कथाएँ, अनेक पात्र, अनेक काल, अनेक दृष्टियाँ, अनेक विचारधाराएँ, अनेक स्मृतियाँ एक साथ उपस्थित हों।

महाभारत इस दूसरे अर्थ में “ग्रंथ-संसार” है।

उसकी विशालता इसलिए है कि उसमें केवल लेखक का विचार नहीं, बल्कि परंपरा की अनेक आवाजें सुनाई देती हैं।

क्या इस कारण महाभारत असंगत हो जाता है?

एक आलोचक कह सकता है— यदि इसमें इतने सारे विषय हैं, इतनी सारी कथाएँ हैं, इतनी परतें हैं, तो क्या यह एक असंगत संग्रह नहीं?

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है। क्योंकि पहली दृष्टि में महाभारत में विरोधाभास दिखाई देते हैं।

एक जगह एक बात कही जाती है। दूसरी जगह दूसरी।

एक पात्र धर्म का एक अर्थ देता है। दूसरा पात्र उसी परिस्थिति में अलग निर्णय लेता है।

लेकिन शायद यही महाभारत की विशेषता है। यह जीवन को एक सूत्र में सरल नहीं करता।

यह दिखाता है कि धर्म परिस्थितियों में प्रवेश करते ही जटिल हो जाता है।

इसलिए महाभारत की बहुलता उसकी कमजोरी नहीं, उसके विषय—धर्म-संकट—के अनुकूल उसकी संरचनात्मक विशेषता भी हो सकती है।

“एक लाख” से अधिक महत्वपूर्ण है “बहु-दृष्टि”

यदि कोई पूछे— महाभारत कितना बड़ा है?

तो पहला उत्तर होगा— लगभग एक लाख श्लोक।

लेकिन शोधकर्ता को दूसरा उत्तर देना चाहिए— उससे भी बड़ा है उसका दृष्टिकोण।

क्योंकि एक ही घटना— अर्जुन की दृष्टि से अलग है, कृष्ण की दृष्टि से अलग, युधिष्ठिर की दृष्टि से अलग, द्रौपदी की दृष्टि से अलग, भीष्म की दृष्टि से अलग, कर्ण की दृष्टि से अलग, धृतराष्ट्र की दृष्टि से अलग।

महाभारत की वास्तविक विशालता उसके पृष्ठों में नहीं, दृष्टियों की संख्या में है।

पांडुलिपियाँ और पाठ-परंपरा : एक और जटिलता

महाभारत की विशालता को समझते समय हमें उसकी पांडुलिपि-परंपरा को भी ध्यान में रखना होगा।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में महाभारत की पांडुलिपियाँ अलग-अलग पाठ-परंपराओं में संरक्षित हुईं।

विशेष रूप से आधुनिक पाठालोचन में— उत्तरी पाठ-परंपरा, दक्षिणी पाठ-परंपरा

आदि के बीच पाठांतरों का अध्ययन किया गया है।

बीसवीं शताब्दी में पुणे स्थित भाण्डारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने महाभारत का प्रसिद्ध Critical Edition तैयार किया। अनेक पांडुलिपियों की तुलना करके संपादकों ने एक आलोचनात्मक पाठ निर्मित करने का प्रयास किया।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए— Critical Edition स्वयं “मूल महाभारत की पांडुलिपि” नहीं है।

यह उपलब्ध पांडुलिपियों की तुलना के आधार पर निर्मित एक आलोचनात्मक पुनर्निर्मित पाठ है।

इसलिए— पांडुलिपि और आलोचनात्मक संस्करण को समान नहीं समझना चाहिए।

 आलोचनात्मक संस्करण का महत्व

आलोचनात्मक संस्करण का महत्व इसलिए है कि वह हमें यह देखने की सुविधा देता है कि विभिन्न पांडुलिपियों में कौन-कौन से पाठांतर हैं।

यदि किसी श्लोक का एक रूप दक्षिणी पांडुलिपियों में है और दूसरा किसी उत्तरी परंपरा में, तो पाठालोचक उन सभी प्रमाणों की तुलना करता है।

इस प्रक्रिया से हमें महाभारत की पाठ-परंपरा की गतिशीलता समझ में आती है।

यह प्रश्न उठता है—

कौन-सा पाठ अधिक प्राचीन हो सकता है?

कौन-सा पाठ बाद की वृद्धि हो सकता है?

कौन-सा पाठ किसी क्षेत्रीय परंपरा का परिणाम है?

लेकिन यहाँ फिर सावधानी— आलोचनात्मक पुनर्निर्माण = व्यास द्वारा लिखी गई मूल प्रति की पुनर्प्राप्ति नहीं।

यह अंतर हमारे पूरे शोध में बार-बार ध्यान में रखना होगा।

महाभारत की विशालता : काल की भी विशालता

महाभारत केवल स्थान की दृष्टि से बड़ा नहीं है। वह काल की दृष्टि से भी विशाल है।

कथा के भीतर— प्राचीन वंश हैं, वर्तमान संघर्ष है, भविष्य की भविष्यवाणियाँ हैं, पूर्वजों की कथाएँ हैं, आने वाले कल की चर्चा है।

एक ही पाठ में अनेक काल-स्तर एक-दूसरे से जुड़े हैं।

यही कारण है कि महाभारत को केवल “एक समय में घटी घटना” की तरह पढ़ना कठिन हो जाता है।

वह एक स्मृति-काल निर्मित करता है।

महाभारत का आकार और उसका उद्देश्य

अब प्रश्न होना चाहिए— इतनी विशालता क्यों?

यदि केवल कथा कहनी थी, तो इतना विस्तार आवश्यक नहीं था।

इसका एक उत्तर यह हो सकता है— 

महाभारत कथा को केवल सुनाना नहीं चाहता; वह कथा के माध्यम से जीवन के अनेक प्रश्नों की परीक्षा करता है।

इसीलिए वह बार-बार मूल कथा से बाहर जाता है। वह फिर वापस लौटता है।

फिर किसी अन्य कथा में प्रवेश करता है। फिर कोई धर्मचर्चा आती है। फिर कथा आगे बढ़ती है। 

यह गति आकस्मिक अव्यवस्था नहीं है। यह महाभारत की शिक्षण-पद्धति का हिस्सा है।

 कथा → प्रश्न → उपाख्यान → उत्तर → नया प्रश्न

महाभारत की संरचना को एक सूत्र में रखें तो यह दिखाई देता है—कथा → प्रश्न → उपाख्यान → विचार → उत्तर → नया प्रश्न।

उदाहरण— युधिष्ठिर संकट में हैं। प्रश्न उठता है। कोई ऋषि पुरानी कथा सुनाता है।

उस कथा से धर्म का कोई पक्ष सामने आता है। लेकिन उत्तर पूर्ण नहीं होता।

नई परिस्थिति नया प्रश्न खड़ा करती है। इस प्रकार महाभारत अपने पाठक को अंतिम सरल उत्तर देने के बजाय चिंतन की यात्रा पर रखता है।

इसीलिए महाभारत “समाप्त” होकर भी समाप्त नहीं होता

अठारहवें पर्व तक पहुँचने पर कथा समाप्त होती है। लेकिन महाभारत के प्रश्न समाप्त नहीं होते।

युधिष्ठिर स्वर्गारोहण कर लेते हैं। फिर भी पाठक के भीतर प्रश्न बचता है—  

क्या धर्म वास्तव में विजयी हुआ?  यदि हुआ तो किस अर्थ में? अधर्मियों को इतना समय क्यों मिला?  कृष्ण ने इतने जटिल उपाय क्यों किए? कर्ण की त्रासदी का न्याय क्या है? भीष्म की प्रतिज्ञा धर्म थी या अधर्म का कारण? द्रौपदी के साथ जो हुआ उसका धर्मशास्त्रीय अर्थ क्या है?

यानी महाभारत का आकार अठारह पर्वों पर समाप्त होता है, लेकिन उसका अर्थ वहाँ समाप्त नहीं होता।

“ग्रंथ-संसार” की अंतिम पहचान

अब हम इस उपाध्याय के शीर्षक का उत्तर दे सकते हैं।

क्या महाभारत केवल एक ग्रंथ है? हाँ—पाठ के स्तर पर।

क्या वह केवल एक कथा है? नहीं।

क्या वह केवल एक युद्ध का वृत्तांत है? नहीं।

क्या वह केवल धर्मग्रंथ है? नहीं।

क्या वह केवल इतिहास है? इतना कहना भी अपर्याप्त होगा।

अधिक सटीक रूप में—

महाभारत एक विशाल ग्रंथ-संसार है, जिसमें एक केंद्रीय वंशीय-संघर्ष की कथा के भीतर भारतीय सभ्यता की अनेक स्मृतियाँ, कथाएँ, धार्मिक धारणाएँ, नैतिक समस्याएँ, राजनीतिक चिंताएँ और दार्शनिक प्रश्न समाहित होते गए हैं।

शोध के लिए पहली बड़ी पद्धतिगत स्थापना

इस उपाध्याय से हमारे शोध के लिए एक महत्वपूर्ण नियम निकलता है—

महाभारत की विशालता को उसकी कमजोरी का प्रमाण न मानें और उसकी विशालता को उसकी ऐतिहासिकता का स्वतः प्रमाण भी न मानें।

एक विशाल ग्रंथ इसलिए सत्य नहीं हो जाता कि वह विशाल है।

और किसी ग्रंथ में बाद की परतें होने से उसकी मूल कथा स्वतः असत्य नहीं हो जाती।

हमें प्रत्येक प्रश्न को उसके अपने प्रमाणों से जाँचना होगा।

अंतिम निष्कर्ष

महाभारत का आकार केवल उसकी श्लोक-संख्या का प्रश्न नहीं है।

“एक लाख श्लोक” उसकी बाहरी विशालता का संकेत है।

अठारह पर्व उसकी संरचनात्मक विशालता का।

उपाख्यान उसकी कथात्मक विशालता का।

दर्शन उसकी बौद्धिक विशालता का।

विभिन्न पाठ-परंपराएँ उसकी ऐतिहासिक विशालता का।

और धर्म-संकट उसकी मानवीय विशालता का।

इसलिए महाभारत को समझने के लिए हमें एक नई दृष्टि अपनानी होगी— यह एक पुस्तक नहीं जिसे एक बार में पढ़कर समाप्त कर दिया जाए।

यह एक ऐसा ग्रंथ-संसार है जिसमें प्रवेश करने के बाद पाठक को बार-बार अपनी दृष्टि बदलनी पड़ती है।

कभी वह इतिहास की ओर देखता है। कभी आख्यान की ओर। कभी धर्म की ओर। कभी दर्शन की ओर। कभी मनुष्य की ओर।

और अंततः— वह स्वयं की ओर लौट आता है। यही महाभारत की वास्तविक विशालता है।

अगले उपाध्याय की ओर

अब तक हमने देखा— महाभारत क्या है? उसका नाम क्या संकेत करता है? जय से भारत और भारत से महाभारत की विस्तार-परंपरा क्या बताती है? और उसका आकार केवल संख्या नहीं, बल्कि एक ग्रंथ-संसार की संरचना क्यों है?

अब अगला निर्णायक प्रश्न सामने है— 

यदि महाभारत में कथा, इतिहास, धर्म, नीति, दर्शन, राजनीति और आध्यात्मिकता सब साथ उपस्थित हैं, तो हम इसे आखिर किस श्रेणी में रखें?

क्या यह इतिहास है?  क्या यह महाकाव्य है?  क्या यह धर्मग्रंथ है? क्या यह आख्यान है? या ये सभी शब्द मिलकर भी इसकी प्रकृति को पूरी तरह व्यक्त नहीं करते?

यहीं से अगला उपाध्याय आरम्भ होगा— आख्यान, इतिहास, धर्म और दर्शन का सह-अस्तित्व

और इस उपाध्याय में पहली बार हमें महाभारत के भीतर “इतिहास” और “आख्यान”, तथा “धर्म” और “दर्शन” के संबंध को व्यवस्थित रूप से खोलना होगा।

— मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

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