महाभारत - अध्याय 1.4 आख्यान, इतिहास, धर्म और दर्शन का सह-अस्तित्व
अध्याय 1.4
आख्यान, इतिहास, धर्म और दर्शन का सह-अस्तित्व
एक ग्रंथ—इतने सारे रूप?
महाभारत को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात विस्मित करती है, वह उसका आकार नहीं, बल्कि उसका स्वरूप है।
एक ही ग्रंथ में हमें युद्ध की कथा मिलती है और उसके साथ वंशावली भी। राजाओं और राज्यों का वर्णन मिलता है तो ऋषियों के संवाद भी। राजनीतिक संघर्ष है तो धर्म का प्रश्न भी। युद्धनीति है तो मोक्ष का विवेचन भी। कथा है तो दर्शन भी।
तब स्वाभाविक प्रश्न उठता है— आखिर महाभारत है क्या?
क्या यह इतिहास है? क्या यह महाकाव्य है? क्या यह धर्मग्रंथ है? क्या यह आख्यान-संग्रह है? क्या यह दर्शनग्रंथ है?
या फिर इनमें से प्रत्येक शब्द महाभारत के केवल एक पक्ष को पकड़ता है, जबकि उसका वास्तविक स्वरूप इन सबके सह-अस्तित्व में है?
यही प्रश्न इस उपाध्याय का केंद्र है।
आधुनिक श्रेणियों की सीमा
आधुनिक अकादमिक जगत में हम ज्ञान को अलग-अलग विषयों में बाँटते हैं— इतिहास, साहित्य, धर्म, दर्शन, राजनीति, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान।
इस विभाजन से अध्ययन सुविधाजनक होता है।
लेकिन प्राचीन भारतीय ग्रंथों को पढ़ते समय यही विभाजन कभी-कभी बाधा भी बन जाता है।
क्योंकि महाभारत किसी आधुनिक विश्वविद्यालय की तरह यह नहीं कहता— “यह अध्याय इतिहास का है।” “यह भाग दर्शन का है।” “यहाँ से धर्मशास्त्र आरम्भ होता है।”
वहाँ ये सभी तत्व एक ही कथा-प्रवाह में प्रवेश करते हैं।
उदाहरण के लिए अर्जुन का युद्ध-संकट लें। वह एक राजनीतिक परिस्थिति है। उसी क्षण वह नैतिक समस्या बन जाता है। फिर दार्शनिक प्रश्न बनता है। फिर आध्यात्मिक प्रश्न। और अंततः योग का मार्ग सामने आता है।
अर्थात् एक ही घटना— इतिहास → नैतिकता → दर्शन → अध्यात्म की यात्रा कर सकती है।
आख्यान : महाभारत की पहली भाषा
महाभारत मूलतः कहानी कहता है।
लेकिन यहाँ “कहानी” शब्द को आधुनिक अर्थ में काल्पनिक कथा का पर्याय नहीं मानना चाहिए।
आख्यान का अर्थ है— किसी घटना, व्यक्ति, वंश या परिस्थिति को कथा के रूप में प्रस्तुत करना।
महाभारत का ज्ञान बड़ी मात्रा में आख्यानात्मक है।
भीष्म की कथा कही जाती है। कर्ण की कथा कही जाती है। द्रौपदी की कथा कही जाती है। विदुर की कथा कही जाती है। नल और दमयन्ती की कथा कही जाती है। सावित्री की कथा कही जाती है।
इन कथाओं के माध्यम से जीवन के प्रश्न सामने आते हैं।
इसलिए महाभारत में कथा केवल मनोरंजन का साधन नहीं। कथा स्वयं ज्ञान का माध्यम है।
कथा और सत्य का संबंध
आधुनिक मन में एक सामान्य धारणा होती है— तथ्य = सत्य, कथा = कल्पना
लेकिन यह विभाजन सार्वभौमिक नहीं है।
कथा के माध्यम से भी किसी समाज की नैतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृति संरक्षित हो सकती है।
किसी कथा का प्रत्येक विवरण आधुनिक अर्थ में ऐतिहासिक रूप से सत्यापित हो या न हो, इससे यह आवश्यक नहीं कि उस कथा का कोई सांस्कृतिक सत्य न हो।
उदाहरण के लिए महाभारत में द्यूतसभा का प्रसंग केवल यह पूछने के लिए महत्वपूर्ण नहीं कि वास्तव में ऐसा कोई द्यूत हुआ था या नहीं।
वह यह भी पूछता है— सत्ता के सामने धर्म कहाँ खड़ा होता है? सभा में मौन रहने की जिम्मेदारी क्या है? स्त्री की गरिमा का संरक्षण किसका दायित्व है? कानून और न्याय में क्या अंतर है?
इस प्रकार आख्यान मानवीय सत्य का वाहक बन सकता है।
इतिहास : महाभारत स्वयं को क्या कहता है?
महाभारत की भारतीय परंपरा में एक महत्वपूर्ण आत्म-पहचान है— इतिहास।
यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि आधुनिक हिंदी में “इतिहास” का सामान्य अर्थ है— अतीत में वास्तव में घटी घटनाओं का प्रमाणाधारित क्रमबद्ध अध्ययन।
लेकिन प्राचीन भारतीय संदर्भ में “इतिहास” का अर्थ और कार्य अधिक व्यापक था।
प्रसिद्ध सूत्र है— धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम्। पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥
अर्थात् पूर्ववृत्त कथाओं के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपदेश जिस प्रकार जुड़ा हो, उसे इतिहास कहा जाता है। यह परिभाषा अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्योंकि यहाँ इतिहास केवल— “क्या हुआ?” नहीं है।
वह साथ ही पूछता है— “उससे मनुष्य को क्या समझना चाहिए?”
यही भारतीय इतिहास-बोध और आधुनिक historiography के बीच एक मूलभूत अंतर की ओर संकेत करता है।
“इतिहास” का उद्देश्य : स्मरण से शिक्षा तक
यदि “इतिहास” में पूर्ववृत्त कथा के साथ धर्मार्थकाममोक्ष का उपदेश जुड़ा है, तो उसका उद्देश्य केवल अतीत को सुरक्षित रखना नहीं है।
उसका उद्देश्य है— अतीत के माध्यम से वर्तमान मनुष्य को शिक्षित करना।
महाभारत में यही दिखाई देता है। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल अतीत की घटना नहीं रहता।
वह प्रश्न बन जाता है— सत्ता मिलने पर मनुष्य क्या करेगा? मोह में पड़कर मनुष्य क्या खो सकता है? धर्म और स्वार्थ के संघर्ष में निर्णय कैसे होगा? विजय की कीमत क्या होगी?
इस प्रकार इतिहास नैतिक स्मृति बन जाता है।
धर्म : महाभारत का केंद्रीय ताना-बाना
महाभारत में धर्म कोई अलग अध्याय भर नहीं है। धर्म लगभग प्रत्येक प्रमुख निर्णय के भीतर उपस्थित है।
युधिष्ठिर का प्रश्न धर्म है। भीष्म की प्रतिज्ञा धर्म से जुड़ी है। अर्जुन का विषाद धर्म-संकट है। द्रौपदी का प्रश्न धर्म-संकट है। कर्ण की निष्ठा धर्म-संकट है। विदुर की नीति धर्म का विवेक है।
कृष्ण की रणनीति धर्म की जटिलता को सामने लाती है।
इसलिए महाभारत को समझना है तो धर्म को केवल धार्मिक आचार के अर्थ में नहीं पढ़ा जा सकता।
यहाँ धर्म का अर्थ कई बार है— कर्तव्य, न्याय, व्यवस्था, आचार, स्वधर्म, राजधर्म, आपद्धर्म, सत्य, लोकहित, और परिस्थिति में उचित आचरण।
धर्म कोई सरल नियम-पुस्तिका नहीं
यदि महाभारत धर्म को सरल नियमों की सूची मानता, तो उसकी कथा बहुत आसान होती।
लेकिन महाभारत बार-बार ऐसी स्थितियाँ बनाता है जहाँ— दो धर्म टकराते हैं।
उदाहरण— अर्जुन के सामने— क्षत्रिय-धर्म और स्वजन के प्रति करुणा टकराते हैं।
युधिष्ठिर के सामने— सत्य और युद्ध की रणनीति टकराते हैं।
भीष्म के सामने— प्रतिज्ञा और राजवंश का व्यापक हित टकराता है।
कर्ण के सामने— मित्र-निष्ठा और जन्मगत सत्य टकराते हैं।
यही कारण है कि महाभारत में धर्म कई बार सूक्ष्म हो जाता है।
यही आगे चलकर हमारे शोध का एक केंद्रीय सूत्र बनेगा— धर्मः सूक्ष्मः।
दर्शन : कथा के भीतर विचार
महाभारत दर्शन को अलग-अलग सिद्धांतों की सूखी सूची के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।
वह दर्शन को जीवन की समस्या से जन्म देता है।
अर्जुन का प्रश्न → भगवद्गीता।
युधिष्ठिर का संकट → शान्तिपर्व।
नचिकेता-सदृश प्रश्नों के अनेक रूप → आत्मा, मृत्यु और मोक्ष की चर्चाएँ।
सनत्सुजातीय → आत्मज्ञान और मृत्यु-विवेचन।
मोक्षधर्म → मुक्ति और ब्रह्मविद्या के विविध विमर्श।
इस प्रकार महाभारत में दर्शन का प्रवेश किसी अकादमिक जिज्ञासा से नहीं, बल्कि अस्तित्वगत संकट से होता है।
यह इसकी विशिष्टता है।
भगवद्गीता : दर्शन और आख्यान का अद्भुत संयोग
भगवद्गीता को महाभारत से अलग करके पढ़ना आज सामान्य है। लेकिन उसकी मूल स्थिति को देखें तो वह एक अत्यंत विशिष्ट परिस्थिति में जन्म लेती है।
स्थान— कुरुक्षेत्र। समय— युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले। - स्थिति— अर्जुन का विषाद।
प्रश्न— कर्तव्य क्या है?
और उत्तर में विकसित होता है— कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग, प्रकृति, पुरुष, ईश्वर, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, गुण, संन्यास, मोक्ष।
यह उदाहरण दिखाता है कि महाभारत में दर्शन कथा के बाहर नहीं, कथा के भीतर पैदा होता है।
राजनीति और दर्शन का सह-अस्तित्व
महाभारत को केवल धार्मिक ग्रंथ मानने पर उसका राजनीतिक पक्ष दब जाता है।
हस्तिनापुर का उत्तराधिकार। राजसूय। द्यूत। वनवास। संधि-प्रयास। कृष्ण का शान्तिदूत बनना। युद्ध।
राज्य की पुनर्स्थापना। ये सभी घटनाएँ सत्ता और राजनीति से जुड़ी हैं।
लेकिन महाभारत राजनीति को भी नैतिक प्रश्न से अलग नहीं करता।
राजा केवल शक्तिशाली होना पर्याप्त नहीं। उसे— राजधर्म का पालन करना है।
इस प्रकार महाभारत में राजनीति और धर्म का संबंध एक मूल प्रश्न बन जाता है— सत्ता को धर्म से कैसे नियंत्रित किया जाए?
समाज : महाभारत का अदृश्य पात्र
महाभारत के पात्र अकेले नहीं हैं। वे एक सामाजिक व्यवस्था में जीते हैं। वर्ण। आश्रम। कुल। वंश। विवाह। उत्तराधिकार। गुरु-शिष्य संबंध। राजा और प्रजा। स्त्री और परिवार।
इन सबके बीच व्यक्ति निर्णय करता है।
इसलिए महाभारत को केवल व्यक्तिगत नैतिकता के ग्रंथ की तरह पढ़ना भी पर्याप्त नहीं।
यह पूछना होगा— व्यक्ति और सामाजिक व्यवस्था के बीच संघर्ष होने पर धर्म किसका पक्ष लेता है?
कर्ण का जीवन इस प्रश्न का अत्यंत तीखा उदाहरण है।
मनोविज्ञान : पात्र केवल “अच्छे” और “बुरे” नहींमहाभारत की एक और विशेषता यह है कि उसके पात्र एकरेखीय नहीं हैं।
दुर्योधन केवल “दुष्ट” नहीं है। उसमें महत्वाकांक्षा है। असुरक्षा है। अहंकार है। प्रतिस्पर्धा है। अपमान की अनुभूति है।
कर्ण में दानशीलता है, परंतु कटुता भी।
भीष्म महान प्रतिज्ञावान हैं, लेकिन उनकी प्रतिज्ञा के परिणामों पर प्रश्न उठते हैं।
युधिष्ठिर धर्मप्रिय हैं, लेकिन द्यूत में उनकी दुर्बलता सामने आती है।
अर्जुन महान योद्धा हैं, लेकिन युद्ध के सामने उनका मन टूटता है।
कृष्ण धर्म के पक्ष में हैं, लेकिन उनकी रणनीतियाँ सरल नैतिकता की कसौटी पर हमेशा सहज नहीं बैठतीं।
इसलिए महाभारत का मनुष्य मिश्रित मनुष्य है।
यही उसकी आधुनिक प्रासंगिकता का एक बड़ा कारण है।
धर्म और दर्शन का संबंध
धर्म और दर्शन को भी अलग-अलग खानों में रखना महाभारत के लिए कठिन है।
धर्म पूछता है— मुझे क्या करना चाहिए?
दर्शन पूछता है— मैं कौन हूँ? सत्य क्या है? जगत क्या है?
महाभारत दोनों को जोड़ देता है। अर्जुन का प्रश्न पहले है— मुझे युद्ध करना चाहिए या नहीं?
लेकिन उसका समाधान केवल नैतिक आदेश से नहीं मिलता। उसे आत्मा समझाई जाती है। कर्म समझाया जाता है। योग समझाया जाता है।
अर्थात्— कर्तव्य के प्रश्न का उत्तर अस्तित्व की समझ से जोड़ा जाता है।
यही भगवद्गीता की मूल शक्ति है।
आख्यान और दर्शन का संबंध
महाभारत की एक असाधारण विशेषता यह है कि वह दर्शन को केवल तर्क से नहीं, उदाहरण से भी समझाता है।
यदि कोई धर्म का सिद्धांत बताया जाता है, तो उसके साथ किसी राजा, ऋषि या सामान्य मनुष्य की कथा दी जा सकती है।
इसका कारण स्पष्ट है— सिद्धांत बुद्धि को संबोधित करता है; कथा अनुभव को।
महाभारत दोनों को साथ रखता है। इसलिए उसकी शिक्षण-पद्धति— तत्त्व + कथा + अनुभव + प्रश्न का सम्मिलित रूप है।
क्या महाभारत धर्मग्रंथ है?
इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना होगा। महाभारत में विशाल धार्मिक और आध्यात्मिक सामग्री है।
उसमें— देवताओं की स्तुतियाँ, यज्ञ, तप, तीर्थ, दान, व्रत, धर्म, मोक्ष, योग, भक्ति सब मिलते हैं।
इस अर्थ में इसका धार्मिक चरित्र स्पष्ट है। लेकिन इसे केवल धर्मग्रंथ कह देना पर्याप्त नहीं।
क्योंकि महाभारत में राजनीति, युद्ध, मनोविज्ञान, राज्यशास्त्र, सामाजिक संघर्ष और मानवीय दुर्बलता का भी उतना ही गहरा संसार है।
इसलिए— महाभारत धार्मिक है, पर केवल धार्मिक नहीं।
क्या महाभारत दर्शनग्रंथ है?
इसी प्रकार महाभारत में गहरा दर्शन है। भगवद्गीता अकेली इसका प्रमाण है।
इसके अतिरिक्त मोक्षधर्म, सांख्य, योग, आत्मविद्या और ब्रह्मविचार से संबंधित अनेक चर्चाएँ हैं।
लेकिन यदि इसे केवल दर्शनग्रंथ कहा जाए तो उसकी कथा, पात्र और सामाजिक संसार गायब हो जाएगा।
इसलिए— महाभारत दार्शनिक है, पर केवल दर्शनग्रंथ नहीं।
क्या महाभारत इतिहास है?
भारतीय परंपरा में इसका इतिहास-स्वरूप महत्वपूर्ण है।
लेकिन आधुनिक इतिहासलेखन की कसौटी पर किसी भी प्राचीन आख्यान को पढ़ते समय हमें अलग-अलग प्रमाणों की जाँच करनी होगी।
पुरातत्त्व। पाठालोचन। भाषा। वंशपरंपरा। भौगोलिक संकेत। अन्य साहित्यिक स्रोत।
इन सबको अलग-अलग देखना होगा। इसलिए अभी हमारा निष्कर्ष यह नहीं होना चाहिए— “महाभारत का प्रत्येक विवरण ऐतिहासिक तथ्य है।”
और यह भी नहीं— “क्योंकि इसमें आख्यान और धार्मिक सामग्री है, इसलिए यह इतिहास नहीं है।”
अधिक वैज्ञानिक स्थिति होगी—
महाभारत में इतिहास-बोध, ऐतिहासिक स्मृति और आख्यानात्मक संरचना—तीनों की उपस्थिति की जाँच करनी होगी।
चारों को साथ रखकर देखें
अब चारों शब्दों को एक साथ रखिए—
| आयाम | मूल प्रश्न |
|---|---|
| आख्यान | क्या हुआ? |
| इतिहास | पूर्ववृत्त को कैसे स्मरण और अर्थ दिया गया? |
| धर्म | ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए? |
| दर्शन | सत्य, आत्मा, कर्म और जीवन का मूल स्वरूप क्या है? |
महाभारत की शक्ति यह है कि वह इन प्रश्नों को अलग-अलग नहीं रखता। वह एक ही घटना से चारों प्रश्न उत्पन्न कर देता है।
कुरुक्षेत्र : चारों आयामों का एक बिंदु
कुरुक्षेत्र इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।
आख्यान पूछता है— युद्ध कैसे हुआ?
इतिहास पूछता है— कुरुवंश और इस संघर्ष की स्मृति कैसे संरक्षित हुई?
धर्म पूछता है— अर्जुन का कर्तव्य क्या है?
दर्शन पूछता है— आत्मा, कर्म और मृत्यु का वास्तविक स्वरूप क्या है?
एक ही स्थान। एक ही क्षण। चार अलग प्रश्न। यही महाभारत की संरचनात्मक शक्ति है।
इसलिए महाभारत को “मिश्रित ग्रंथ” कहना पर्याप्त नहीं
कभी-कभी हम कह देते हैं— “महाभारत में इतिहास भी है, धर्म भी है, दर्शन भी है, इसलिए यह मिश्रित ग्रंथ है।”
लेकिन “मिश्रित” शब्द समस्या को हल नहीं करता। क्योंकि यहाँ ये तत्व केवल एक साथ रखे हुए नहीं हैं।
वे एक-दूसरे को उत्पन्न करते हैं। कथा धर्म का प्रश्न पैदा करती है। धर्म दर्शन का प्रश्न पैदा करता है।
दर्शन फिर कथा के पात्र के निर्णय को प्रभावित करता है। उस निर्णय से इतिहास बदलता है।
इतिहास फिर नई नैतिक समस्या पैदा करता है। अर्थात् संरचना रैखिक नहीं है।
यह एक परस्पर संबद्ध चक्र है।
महाभारत का विशिष्ट बौद्धिक ढाँचा
इसे एक सूत्र में इस प्रकार रख सकते हैं— घटना → कथा → प्रश्न → धर्म → दर्शन → निर्णय → परिणाम → नई कथा
कुरुक्षेत्र हुआ। उसकी कथा कही गई। अर्जुन ने प्रश्न किया। धर्म का विवेचन हुआ। दर्शन सामने आया। अर्जुन ने निर्णय लिया। युद्ध हुआ। परिणाम आया।
फिर युधिष्ठिर ने नया प्रश्न किया। और कथा फिर दर्शन की ओर बढ़ गई।
यही महाभारत की आंतरिक गति है।
आधुनिक पाठक के लिए इसका महत्व
आज हम अक्सर किसी ग्रंथ को पहले वर्गीकृत करते हैं और फिर पढ़ते हैं।
यदि हमें बताया जाए— “यह इतिहास है।” तो हम तथ्य खोजते हैं।
यदि कहा जाए— “यह धर्मग्रंथ है।” तो हम उपदेश खोजते हैं।
यदि कहा जाए— “यह महाकाव्य है।” तो हम साहित्य खोजते हैं।
लेकिन महाभारत के साथ यह तरीका उलटा होना चाहिए।
हमें पहले पूछना चाहिए— ग्रंथ स्वयं किस प्रकार काम करता है?
फिर उसकी श्रेणी पर विचार करना चाहिए। यह इस शोध की एक महत्वपूर्ण पद्धतिगत प्रतिज्ञा होगी।
एक आवश्यक भेद : “सत्य” के अनेक स्तर
महाभारत के अध्ययन में “सत्य” शब्द को भी सावधानी से प्रयोग करना होगा।
किसी घटना का— ऐतिहासिक सत्य एक प्रश्न है।
कथा का— सांस्कृतिक सत्य दूसरा।
पात्र के व्यवहार का— मनोवैज्ञानिक सत्य तीसरा।
उससे निकले प्रश्न का— दार्शनिक सत्य चौथा।
और धर्म के स्तर पर— नैतिक सत्य पाँचवाँ।
महाभारत की शक्ति यह है कि एक ही कथा इन सभी स्तरों पर अर्थवान हो सकती है।
इसलिए यदि कोई कहे— “यह घटना पुरातात्त्विक रूप से सिद्ध नहीं है, इसलिए इसका कोई सत्य नहीं।”
तो यह निष्कर्ष बहुत जल्दबाजी होगा।
उसी प्रकार यदि कोई कहे— “यह परंपरा में है, इसलिए प्रत्येक विवरण ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है।”
यह भी उतना ही जल्दबाजी वाला निष्कर्ष होगा।
इस सह-अस्तित्व को कैसे पढ़ें?
इस अध्याय से हमारे शोध के लिए एक स्पष्ट पद्धति निकलती है।
जब भी महाभारत का कोई प्रसंग सामने आए, हम कम-से-कम चार प्रश्न पूछेंगे—
1. आख्यानात्मक प्रश्न - यह कथा क्या कह रही है?
2. ऐतिहासिक प्रश्न - इसमें कौन-सी ऐतिहासिक स्मृति या सामाजिक परिस्थिति प्रतिबिंबित हो सकती है?
3. धर्मगत प्रश्न - पात्र के सामने कर्तव्य का संकट क्या है?
4. दार्शनिक प्रश्न - यह प्रसंग मनुष्य, आत्मा, कर्म, सत्य या अस्तित्व के बारे में क्या पूछता है?
इस चार-स्तरीय पठन से महाभारत को किसी एक आयाम में सीमित करने से बचा जा सकता है।
महाभारत का केंद्रीय स्वरूप : “जीवन का आख्यान”
अब तक की चर्चा के आधार पर महाभारत को एक संक्षिप्त वाक्य में परिभाषित करना हो तो शायद सबसे सुरक्षित कथन होगा—
महाभारत एक विशाल आख्यानात्मक परंपरा है, जिसमें अतीत की स्मृति के माध्यम से धर्म, राजनीति, समाज, दर्शन और मानव-अस्तित्व के प्रश्नों की परीक्षा की जाती है।
यह परिभाषा उसे केवल इतिहास नहीं बनाती। केवल धर्मग्रंथ नहीं बनाती। केवल दर्शनग्रंथ नहीं बनाती। केवल महाकाव्य भी नहीं बनाती।
बल्कि इन सभी को एक बड़े मानवीय आख्यान के भीतर रखती है।
लेकिन क्या यह सब एक साथ संभव है? यही महाभारत की सबसे बड़ी चुनौती है।
आधुनिक दृष्टि कह सकती है— इतिहास और मिथक अलग हैं। तथ्य और कथा अलग हैं। धर्म और राजनीति अलग हैं। दर्शन और साहित्य अलग हैं।
महाभारत मानो कहता है— मानव जीवन में ये सब अलग-अलग कहाँ हैं?
राजा का निर्णय राजनीतिक भी है और नैतिक भी।
युद्ध ऐतिहासिक भी हो सकता है और धार्मिक प्रश्न भी बन सकता है।
मृत्यु जैविक घटना भी है और दार्शनिक प्रश्न भी।
परिवार सामाजिक संस्था भी है और मनोवैज्ञानिक संघर्ष भी।
यही कारण है कि महाभारत की बहुस्तरीयता वास्तव में उसके विषय—मानव जीवन की जटिलता—के अनुरूप है।
इस उपाध्याय का केंद्रीय निष्कर्ष
अब हम प्रारम्भिक प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।
क्या महाभारत इतिहास है?
— उसमें इतिहास-बोध और पूर्ववृत्त की परंपरा है; लेकिन आधुनिक इतिहास की संपूर्ण परिभाषा उसमें आरोपित नहीं की जा सकती।
क्या वह आख्यान है?
— निस्संदेह; आख्यान उसकी प्रमुख अभिव्यक्ति है।
क्या वह धर्मग्रंथ है?
— उसमें विशाल धर्म और आध्यात्मिक विमर्श है; लेकिन उसे केवल धर्मग्रंथ कहना सीमित होगा।
क्या वह दर्शन है?
— उसमें गंभीर दार्शनिक चिंतन है; लेकिन दर्शन भी उसके व्यापक आख्यान-संसार का एक अंग है।
इसलिए सबसे संतुलित निष्कर्ष है—
महाभारत किसी एक विधा में बंद होने वाला ग्रंथ नहीं है। उसकी विशिष्टता ही इस बात में है कि आख्यान, इतिहास-बोध, धर्म और दर्शन उसमें अलग-अलग कमरों की तरह नहीं, बल्कि एक ही जीवित संसार के परस्पर जुड़े हुए आयामों की तरह उपस्थित हैं।
आगे की ओर : क्या फिर इसे “महाकाव्य” कहना उचित है?
अब एक और कठिन प्रश्न सामने आता है।
यदि महाभारत को आधुनिक अर्थ में केवल “Epic” कहा जाए, तो क्या हम उसके इतिहास-बोध को खो देंगे?
यदि “धर्मग्रंथ” कहें, तो क्या उसका राजनीतिक और मानवीय संसार छूट जाएगा?
यदि “इतिहास” कहें, तो क्या आख्यानात्मक और दार्शनिक संरचना दब जाएगी?
यदि “मिथक” कहें, तो क्या भारतीय “इतिहास” की आत्म-समझ को गलत ढंग से समझेंगे?
यहीं से अगले उपाध्याय का प्रश्न जन्म लेता है—
महाभारत को एक ही श्रेणी में रखा जा सकता है?
वहाँ हमें “महाकाव्य”, “इतिहास”, “मिथक”, “धर्मग्रंथ” और आधुनिक अकादमिक श्रेणियों की सीमाओं को सीधे परखा होगा।
और शायद वहाँ पहली बार यह प्रश्न पूरी तीक्ष्णता से सामने आएगा—
समस्या महाभारत की श्रेणी में है, या हमारी श्रेणियों की सीमा में?
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